भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 594

'दोषं व्यक्तिविवेकेऽमुं कविलोकविलोचने । काव्यमीमांसिषु प्राप्तमहिमा महिमाऽऽदृत ॥' ननु कथमत्र प्रामाणिकाव्यवहार्यत्वमिति पृष्टेन यदि मूकत्वमालम्ब्य तथात्वं वादिनि न व्युत्पाद्यते, तदानीमप्रतिभाऽऽपतेत् । अथ तथात्वं व्युत्पाद्यते प्रश्ना- र्थादेः प्रमाणाविषयत्वमुपन्यस्य, तदाऽत्यन्तासद्व्यवहार्यता स्वीकृतैव स्यादिति चेत् । अत्र ब्रूमते--मूकतैवात्र विजयायेति । न चाप्रतिमैवं प्रसज्येत; उत्तरस्या- ऽप्रतिपत्तिरुत्तरार्हस्येति तल्लक्षणात् । यदि चायं नियमो वादिना इष्यते, यद्भ्रान्त्यैन तेन व्यवहर्तव्यमनुवादा- दन्यत्रेति; तदा मध्यस्थोद्भाव्यत्वमस्य दोषस्योपन्यस्यताम् । मध्यस्थेन ह्यपभ्रंशभाषयाऽपि यथा वादिप्रबोधनं क्रियते, तथा यद्यप्रमाणमवलम्ब्यापि क्रियते, तदा को दोषस्तस्य स्यात्, तत्र विषये तथैव तेन वादिबोधनस्य शक्य-

काव्यतत्त्वविवेचक पण्डितों में अत्यन्त समादृत आलंकारिक महिम भट्ट ने कविजनों के नेत्र-तुल्य 'व्यक्तिविवेक' नामक अपने ग्रन्थ में ध्वनिकार प्रभृति आद्य आचार्यों के इस कथन का उल्लेख करते हुए कि 'अनौचित्यादृ ते नान्यद् रसभङ्गस्य कारणम्' (रसभंग का कारण अनौचित्य के सिवा और कुछ भी नहीं है । सभी रसभंजक दोषों में अनौचित्य अनुस्यूत ही रहता है ), इस दोष का आदर किया है । प्रश्न--'अनौचित्य प्रामाणिकों द्वारा अव्यवहार्य कैसे हैं ?' ऐसा प्रश्न होने पर यदि मूकता का अवलम्बन कर वादी के प्रति अनौचित्य की अव्यवहार्यता का प्रतिपादन न किया जाय, तो 'अप्रतिभा' नामक निग्रह होगा । तदर्थ यदि अनौचित्य में प्रमाणा- विषयत्व का प्रतिपादनकर 'अनौचित्य की प्रामाणिक अव्यवहार्यता' का प्रतिपादन किया जाय, तो अत्यन्त असत् वस्तु में भी आपने व्यवहार्यता मान ली, कारण 'अनौचित्यं प्रामाणिकाव्यवहार्यम्, प्रमाणाविषयत्वात्' इस प्रकार शब्द-व्यवहार का विषय वह हो ही गया । उत्तर--अनौचित्य अव्यवहार्य कैसे है, इस प्रश्न में मूकता ही विजय का हेतु है । वहाँ मूकत्व के अवलम्बन में भी अप्रतिभा नहीं होती, कारण 'उत्तर-योग्य प्रश्न की अप्रतिपत्ति' ही अप्रतिभा है, अनौचित्य तो उत्तरार्ह ही नहीं है । यदि वादी इस नियम को स्वीकार करता हो कि 'अनुवाद से अन्यत्र मैं भ्रान्ति से व्यवहार नहीं करूँगा' तो मध्यस्थ को ही वहाँ अनौचित्य का उद्भावन करना चाहिए । मध्यस्थ जैसे अपभ्रंश शब्दों से ( जो कि निरर्थक निग्रहस्थान से निग्रह के