खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 593, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] अप्रसङ्गात्मक तर्क का निरूपण ५७१ वैयात्यम् । यथा—अवस्तुनि विधिनिषेधयोः किमिच्छसीति पृच्छति प्रमाणव्यव- हारिणां सौगते । अत एवात्र अनौचित्यापरनामकं वैयात्यं परस्य दोषं मनसि कृत्वैके ब्रुवते—'अत्र सहृदयानां मूकतैवौचिता' इति । अपरे च—'न ह्यप्रतीते देवदत्तादौ स किं गौरः कृष्णो वेति वैयात्यं विना प्रश्नः स्यादि'ति । यदि च इदमनौचित्यं नाम दोषो नाभ्युपेयते, तदानीमर्थान्तरेण प्रकृतमर्थं निरस्य अर्थान्तरस्यार्थान्तरेण परिहारात् तत्परम्परामालम्बितुकामः केन दोषेण अर्थान्तरपरिहाराभासत्ववादिनी अर्थान्तरेणैव तत्परिहरणमनुचितमित्यतोऽन्येन जीयेत । अर्थान्तरनिग्रहतायां विप्रतिपन्नोऽपि प्रश्नपरम्परामालम्ब्य स्वभङ्गभयात् कथावसानमनिच्छन्तं कथं जयेत ? न चानवस्थया जयतीति वाच्यम् ; यावदुत्तरमर्थान्तरेण परिहरणे प्रश्ना- न्तरेण वा द्वयोरप्यनवस्थासाम्यात् । परन्तु उस असत्त्व को भावरूप या अभावरूप मानते हैं ?' तो वह प्रश्नानौचित्य है । अतएव पर के ऐसे प्रश्न में प्रश्न-वैयात्य नामक दोष मानकर एक आचार्य ने कहा है—'ऐसे प्रश्न पर सहृदय पण्डितों के लिए मौन ही उचित है।' दूसरे आचार्य ने कहा है कि "अज्ञात देवदत्त के विषय में देवदत्त कृष्ण है या गौर ?' यह प्रश्न धृष्टता के सिवा और कुछ नहीं।" यदि अनौचित्य को दोष न मानें, तो प्रतिवादी का किसी भी प्रकार निग्रह न हो सकेगा । देखिये, वादी कहता है—'शब्दोऽनित्यः कृतकत्वात् ।' प्रतिवादी इसका अर्थान्तर से यों परिहार करता है—'शब्द विभु होने से उसे कृतक कहना अज्ञान है।' इस पर वादी कहेगा—'यह परिहार 'अर्थान्तर' होने से उचित नहीं है।' इस पर प्रतिवादी भी चुप न रहेगा और 'फिर वह 'अर्थान्तर ही क्या है ?' इस प्रकार प्रश्नों की परम्परा चलाता ही रहेगा । अर्थात् 'अर्थान्तर' होने से परिहार को 'आभास' कहनेवाले के प्रति 'पुनः अर्थान्तर से ही परिहार अनुचित है' इस प्रकार अनौचित्य के उद्भावन से ही उक्त प्रतिवादी निगृहीत हो सकता है । किञ्च— जो स्वयं अर्थान्तर को निग्रहस्थान नहीं मानते, वे यदि पराजय के भय से प्रश्न- परम्परा का अवलम्बनकर शास्त्रार्थ की समाप्ति ही न चाहें, तो अनौचित्य से अन्य किस निग्रह से आप उन्हें परास्त करेंगे ? तस्मात् अनौचित्य अवश्य मानना चाहिए । प्रश्न—स्वपराजय के भय से प्रश्न-परम्परा का अवलम्बन करनेवाले पुरुष को अनवस्था से ही पराजित कर सकते हैं । उत्तर—अनवस्था ही क्या है, ऐसा प्रश्न होने से प्रश्न और उत्तर दोनों पक्षों में अनवस्था समान है ।