भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 592, कुल 610 में से

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पृष्ठ 592

'सुगमासुगमयोरसुगमदुर्बलत्वं कल्पनागौरवम्, दृष्टजातीयमपेक्ष्यादृष्ट- जातीयं दुःखेन प्रमीयते, स्वल्पमपेक्ष्य च बह्विति अखिलजनानुभवसिद्धमेतत् । दर्शितं च विविच्येदमीश्वराभिसन्धौ । यथा—नैयायिकादिकं प्रति क्षित्यादिषु प्रतिकार्यं कर्तॄणां भिन्नानामभ्युपगमापादके, यथा च सौगतं प्रति प्रत्येकं कारणानां समर्थानामेकसमानदेशकालानामनेकनीलादिव्यक्त्युत्पादापादके चेति दूषणानुकूलमिदम् । तद्व्यतिरेकेण कल्पनालाघवं साधनानुकूलम् । प्रामाणिकाव्यवहार्यत्वमसमाधेयजातीयमनौचित्यं वैयात्यनामकम् । तस्य भेदाः प्रश्नवैयात्यादयः । प्रश्नविषयमप्रमिण्वतां प्रति प्रश्नानौचित्यं प्रश्न- सुबोध और दुर्बोध के मध्य दुर्बोध की दुर्बलता कल्पना-गौरव है। दृष्टजातीय की अपेक्षा अदृष्टजातीय तथा स्वल्प की अपेक्षा बहु पदार्थ दुःख से जाना जाता है—यह सर्वसाधारण के अनुभव से सिद्ध है। इस कल्पना-गौरव का उदाहरण 'ईश्वराभिसन्धि' नामक ग्रन्थ में विवेचनपूर्वक दिखाया गया है। जैसे—नैयायिक द्वारा कार्यत्व-हेतु से क्षित्यादि में कर्तृजन्यत्व का साधन करने पर, 'क्षित्यादि कार्य अनेक होने से अनेक कर्ताओं की सिद्धि क्यों नहीं होती ?' वादी की इस आपत्ति की निवृत्ति कल्पना-गौरवरूप तर्क से होती है। इसी प्रकार बौद्धमत में 'प्रत्येक समर्थ (फलोपधायक), अनेक और समान देश-कालवाले कारणों का प्रत्येक, अनेक नीलादि-कार्यकारित्व क्यों न हो ?'- इस शंका की निवृत्ति कल्पना-गौरवरूप तर्क से होती है। कल्पना-गौरव प्रतिवादी द्वारा कथित दूषण के अनुकूल है और उसका अभावरूप कल्पना-लाघव स्वपक्ष के साधन के अनुकूल है। 'प्रामाणिकों के व्यवहार का अविषय तथा समाधान के लिए अयोग्य' अनौचित्य है और अनौचित्य का ही नाम 'वैयात्य' है। अनौचित्य के भेद प्रश्न, वैयात्य आदि हैं। जो पण्डित प्रश्न के विषय को ही नहीं मानते, उनके प्रति उस 'विषय में विशेष के ज्ञानार्थ प्रश्न करना प्रश्नानौचित्य है। जैसे—प्रमाणव्यवहारी नैयायिक आदि के प्रति यदि बौद्ध यह प्रश्न करे कि 'आप जगत् को अवस्तु (असत्) तो मानते ही हैं, १. अर्थात् जहाँ उपस्थितिकृत, शरीरकृत या सम्बन्धकृत लाघव हो, वहीं सुगम है और तदन्य असुगम है। असुगम की दुर्बलता का अर्थ है, प्रमाणापरिच्छेद्यता; कारण प्रमाता स्वभावतः लघु अर्थ का ही ग्रहण करता है। एवञ्च 'इदमस्माद् गुरु', 'इदमस्मात् लघु' इत्याकारक प्रतीतिसिद्ध स्वरूपसम्बन्ध-विशेष ही गौरव-लाघव हैं।

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