भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] अप्रसङ्गात्मक तर्क का निरूपण ५६६ ननु बलवदेककोटिकः संशय एवोत्सर्गः, तत्कथं तर्कः स्यादिति चेन्न । उत्सर्गस्य सम्भावनायाः स्वार्थस्थित्यनुकूलतयाऽवलम्ब्यत्वात् ; संशयस्य त्वनेव- म्भावात् , उत्सर्गस्यैककोटिनिष्ठत्वात् संशयस्य च कोटिद्वयावगाहित्वात् । एतेन संशयस्यैवैका बलवती या कोटिः सैवोत्सर्ग इति निरस्तम् । निर्णयोऽपि संशयस्यैव वस्तुनियतकारणजत्वरूपबलवती कोटिः स्यात् । स्यादप्येवं यद्युत्सर्गवन्निर्णयेऽपि संशयस्यानुस्फूर्तिः स्यादिति चेन्न । उत्सर्गोदाहरणे उत्सर्गमाद्रियमाणैः संशयोच्छेदानुमतेरेव बाधाभावं सहकारिण- मपेक्ष्य उत्सर्गेणार्थैक्याभाव एव प्रमाणीभवनात् । तस्माद्यथा अनवस्थादयो बाधाद् दूषणत्वं त्यजन्तस्तदभावे दूषणानि भवन्ति तथोत्सर्गेऽपि तथैवेति । प्रश्न—हम उत्सर्ग को 'प्रायशः ज्ञानं प्रमैव स्यात्' इत्याकारक बलवान् एक- कोटिवाला सम्भावनारूप सन्देह ही मान लेंगे । उसको तर्क क्यों माना जाय ? उत्तर—तथाकथित सम्भावनारूप उत्सर्ग स्वप्रयोजन ( ज्ञान-प्रामाण्य ) की सत्ता के साधनार्थ माना जाता है, पर संशय उभयकोटिक होने से उक्त प्रयोजन का साधन नहीं हो सकता । इसी तरह उत्सर्ग एककोटिक होता है, जब कि सन्देह कोटि- द्वयावगाही हुआ करता है । अतः उत्सर्ग सन्देह नहीं, किन्तु तर्क ही है । अतएव 'संशय की ही एक बलवती कोटि उत्सर्ग है' यह कथन भी खण्डित जानना चाहिए । प्रयोजन का साधक होने पर भी उत्सर्ग को यदि सन्देह मानें, तो निश्चय को भी वस्तु से नियत सन्निकर्षरूप कारण से जन्य सन्देह की ही एक बलवती कोटि क्यों न माना जाय ? प्रश्न—उत्सर्ग के उदाहरण में संशय की स्फूर्ति होती है, पर निश्चय में वह नहीं होती । अतः निश्चय सन्देह की बलवती कोटि नहीं हो सकता । उत्तर—जो उत्सर्ग का आदर करते हैं, वे उत्सर्ग के उदाहरण में संशय की स्फूर्ति नहीं, किन्तु संशय का उच्छेद ही मानते हैं । कारण बाधाभाव से सहकृत होकर उत्सर्ग ज्ञान के प्रामाण्य में प्रमाण होता है । तस्मात् जैसे बाध होने पर अनवस्था आदि अपना दूषकत्व त्याग देते हैं, पर बाधाभावस्थल में दूषक होते हैं, वैसे ही उत्सर्ग भी बाध के अभाव में प्रमाण होता ही है ।