भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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५६८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ नन्वेवमनुमाने व्यक्त्यविनिगमो दोषः स्यादिति चेन्न । तत्रानेकव्यक्तीना- मभ्युपगमसिद्धयभावात् सामान्योपसंहारस्यैकामेव व्यक्तिमाक्षेप्तुं सामर्थ्यात्, अविनिगमस्य चानेकाभ्युपगमे सत्युपस्थानादिति । बाहुल्यादृष्टमपेक्ष्य बाहुल्यदृष्टतयाऽदुर्बलस्योपगमार्हता उत्सर्गः । तथथा— स्वस्थस्य जाग्रतो ज्ञानं प्रामाण्याप्रामाण्यनिर्धारकप्रमाणानुपनिपाताविशेषेऽपि विना बाधमप्रामाण्यमभ्युपगच्छन्तं प्रति स्यात्, न तु प्रामाण्यम्, यं तर्कमेतमालम्ब्याऽऽहुः— 'तस्माद्बोधात्मकत्वेन प्राप्ता बुद्धेः प्रमाणता । अर्थान्यथात्वहेतूत्थदोषज्ञानादपोद्यते ॥'—इति । द्रष्टव्योदाहरणं चैतदीश्वराभिसन्धौ वेदप्रामाण्ये तथा, यथा न सौगतोऽपि विप्रतिपत्तुमर्हति । समर्थन—यदि अविनिगम को दोष मानें, तो धूम से पर्वत में तार्ण (तृणजन्य), पार्ण (पर्णजन्य) या काष्ठज वह्नि के बीच एक का भी अन्वय अशक्य होने से सर्वत्र अनुमिति-स्थल में अविनिगम रहेगा । एवञ्च अनुमितिमात्र का उच्छेद हो जायगा । खण्डन—अनुमिति-स्थल में अनेक व्यक्तियों की प्रसक्ति ही नहीं होती। कारण वह्नित्वरूप-सामान्यधर्मावच्छिन्नं व्याप्तिग्रह की एक व्यक्ति के आक्षेप में ही सामर्थ्य है और अविनिगम तो अनेक व्यक्तियों के प्रसक्त होने पर ही होता है । लोक में अप्रसिद्ध की अपेक्षा अतिप्रसिद्ध अदुर्बल के स्वीकार की योग्यता १उत्सर्ग है । जैसे जो किसी स्वस्थ (निर्दोषताक्ष) और जाग्रत मनुष्य के ज्ञान को [ प्रामाण्य- अप्रामाण्य के निर्णायक प्रमाणरूप विशेष न होने पर भी बाध के अभावकाल में ] अप्रमाण मानते हैं, उनके प्रति उत्सर्ग दोष होता है। जो उक्त ज्ञान को प्रमाण मानते हैं, उनके प्रति उत्सर्ग दोष नहीं होता । इस उत्सर्गरूप तर्क का अवलम्बनकर भट्टपाद ने चोदना-सूत्र के प्रसङ्ग में ५३ वीं कारिका द्वारा कहा है कि बोधस्वरूप होने से ही बुद्धि को उत्सर्गतः प्रामाण्य प्राप्त हो जाता है, [कारण प्रायशः ज्ञानमात्र प्रमा हुआ करता है ] । किन्तु वह प्रामाण्य कहीं-कहीं विषय के अभाव से विषय या चक्षुरादिनिष्ठ दोष से बाधित भी हो जाता है । 'ईश्वराभिसन्धि' के वेद-प्रामाण्य नामक प्रकरण में उत्सर्ग का उदाहरण हमने इस प्रकार दिखलाया है, जिसमें बौद्ध भी विप्रतिपत्ति नहीं कर सकते । १ इस तरह भूयोदर्शनरूपता वा भूयः सहचाररूपता ही उत्सर्ग का स्वरूप सिद्ध होता है ।