भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 589, कुल 610 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 589

परिच्छेद ] अप्रसंगात्मक तर्क का निरूपण ५६७ निर्द्धारणाशक्यत्वमविनिगमः, सत्प्रतिपक्षहेतोरिव निर्द्धारयितुमशक्यानन्वयोः परस्परप्रतिक्षेप एव पर्यवसानात् । नन्वन्यतरमादायापि प्रकृतस्योपपत्तिसम्भवेन अविनिगमस्य दोषत्वमेवा- नुपपन्नम् । केवलं पुंसस्तत्र यदि संशयः स्यात्स च किं न स्यादिति चेन्न । भावानवबोधात् । प्रमाणासम्भवेन क्वचिदपि विशेषः कथमभ्युपगन्तुं शक्यो यमादाय वस्तुगत्याऽप्येकस्यान्वयः स्यात् । नन्वेवं प्रमाणाभाव एव दोषः स्यान्न अविनिगम इति चेन्न । तस्य अवि- निगमोन्नेयत्वेन अविनिगमस्यैव प्रथमोत्पन्नस्योपन्यासोचित्यात् । जो नियम है, उसके निर्धारण की अशक्यता अविनिगम है। जैसे—भूतत्व और मूर्तत्व दोनों में जातित्व के अन्वय की योग्यता है और दोनों को जाति मानने में साङ्कर्य दोष होगा, अतः एक को ही जाति मानना चाहिए। यहाँ अनुगत-प्रतीतिरूप जातित्वसाधक प्रमाण दोनों स्थलों में तुल्य होने से यह विकल्प होता है कि भूतत्व जाति है या मूर्तत्व ? दोनों के बीच एक में भी जातित्व का अन्वय अशक्य नहीं है, यही अविनिगम है। यहाँ सत्प्रतिपक्षि-हेतु की तरह एक के जातित्व की ग्राहक सामग्री, इतर के जातित्व की प्रतिबन्धिका हो जाती है। समर्थन—एक भूतत्व को जाति मान लेने पर सङ्कर-दोष का परिहार हो जाता है, अतः अविनिगम दोष ही नहीं है। अविनिगम-स्थल में पुरुष को केवल सन्देह होता है, उसकी भी निवृत्ति हो सकती है। खण्डन—आपने मेरे भाव को नहीं जाना। भूतत्व और मूर्तत्व दोनों के मध्य एक में कोई विशेष (जातित्वसाधक अतिशय) मानने में प्रमाण ही नहीं है। फिर किसके बल पर एक में जातित्व का अन्वय करेंगे। अर्थात् अनुगत-प्रतीतिरूप प्रमाण दोनों में तुल्य है और इससे अतिरिक्त अन्य विशेष होने में कोई प्रमाण नहीं है। समर्थन—यदि ऐसा है, तो 'प्रमाणाभाव' को ही दोष मानिये, 'अविनिगम' को दोष मानना व्यर्थ है। खंडन—प्रमाणरूप विशेष अतीन्द्रिय होने से वह अविर्नि- गम से अनुमेय ही है। अतः प्रथम उपस्थित होने से अविनिगम ही दोष है, प्रमाणाभाव नहीं। १. 'प्रकृतोद्देश्यविधेयभावतद्व्याप्यतरान्यमितस्तथा तुल्यबलानेकसंसर्गको तादृश्यान्वयितया तदेकदेशनिर्द्धारणा- सम्भवत्वम्' यह अविनिगम का लक्षण है।