खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ स्यादप्येवं यदि सत्प्रतिपक्षत्वमेव तत्र दोषो न स्यादिति चेत्; तर्हि मन्तव्यं प्रथमस्य हेतोः समानबलप्रतिपक्षप्रतिहतत्वादसाधकत्वमित्युक्तमावर्तते । अनवस्थायां च यस्यां यस्यां सत्तायामपरापरसत्ता यायात्, तस्यास्तस्याः प्रमाणेन सिद्धौ नानवस्था दोषः स्यात्, असिद्धौ चाऽऽश्रयासिद्धविषयमापादन- मिति । यदिच आत्माश्रयादिषु सर्वत्र विशेषोऽयमभिधीयते प्रमाणसिद्धत्वात्तत्र तथोपेयतं इति; तर्ह्यापादनस्थाने तथाभ्युपगमाय प्रमाणं नास्तीत्युक्तं भवति । तथाच तत्र प्रमाणप्रश्नस्यावसरो न प्रसङ्गस्येति ।
अप्रसङ्गात्मक-तर्कनिरूपणम्
अपरेऽपि विषयभेदात्तर्कभेदा आत्माश्रयादिवत् मन्तुमुचिताः । तद्यथा— अविनिगमः, उत्सर्गः, कल्पनागौरवलाघवे च, अनौचित्यं चेति । विकल्पेन अन्वयावगमयोग्येऽनेकस्मिन्नभ्युपगते तदेकदेशान्वयनियम- समर्थन—सत्प्रतिपक्षरूप दोष न होने पर व्याप्ति के बल पर साध्य की सिद्धि होती है । यहाँ तो सत्प्रतिपक्ष दोष है, अतः नित्यत्व और अनित्यत्वरूप विरुद्ध धर्मों का एकत्र अध्यास नहीं होता । खण्डन—तब यह मानना चाहिए कि प्रथम हेतु समानबल- प्रतिपक्ष-पराहृत होने से असाधक है । यदि ऐसा मान लें, तो उक्त वेताल-न्याय से वही स्वव्याघातक भी होने से जाति से सत्प्रतिपक्ष में कुछ विशेष ही नहीं रह जायगा । किञ्च—अनवस्था-स्थल में जिस-जिस सत्ता में अपर-अपर सत्ता का आपादन करते हैं, उस-उस सत्ता में यदि प्रमाण है, तो प्रामाणिक होने से अनवस्था दोष नहीं है । यदि प्रमाण नहीं, तो आश्रय की असिद्धि होने से अनवस्था का आपादन हो ही नहीं सकता । यदिच आत्माश्रयादि सभी स्थलों में यह विशेष कहा जाय कि 'अमुक स्थल में प्रमाणसिद्ध होने से आत्माश्रयादि दोष नहीं हैं,' तो इसका अर्थ यही होता है कि आपादन के स्थान में अमुक आत्माश्रय आदि मानने में प्रमाण नहीं है । एवञ्च प्रमाण-प्रश्न का यह स्थल है, प्रसङ्ग का नहीं ।
अप्रसंगात्मक तर्क का निरूपण
विषय-भेद से आत्माश्रयादि की तरह अविनिगम, उत्सर्ग, कल्पना-गौरव, कल्पना-लाघव और अनौचित्य ये भी अन्य पांच तर्क मानने योग्य हैं । विकल्प से अन्वययोग्य अनेक के प्रसक्त होने पर उनमें से एक के अन्वय का