भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 587

परिच्छेद ] तर्क-विशेष-लक्षणों का खण्डन ५६५ तथापि 'त्वद्धेतुरसाधकः समबलप्रतिपक्षप्रतिहतत्वादित्यस्य दूषणत्वार्थमवश्या- पेक्ष्यस्य द्वाराऽऽत्मव्याघातकत्वात् साक्षाद्वा अवश्योपस्थाप्यद्वारेण वा स्वव्याघा- तकतायामुपयुक्तविशेषाभावः । न च तत्राऽऽस्तामेव व्याघातः, सत्प्रतिपक्षता तु निरवद्यैवेति शक्यं वक्तुम् । यतः शब्दादेर्नित्यत्वमेकस्मादनित्यत्वं चापरस्मादनुमानात्तथा सति किं न स्यात् । तयोर्विरोधग्राहिणः प्रमाणस्य बलादिति चेन्न । यथा नित्यत्वम- नित्यत्वमित्युभयमास्तामित्याचक्ष्महे तथा 'विरुद्धमविरुद्धं चाऽस्तामि'त्यपि ब्रुवतोऽस्मान् कथं निवारयिष्यसि ? दोष देने के लिए अवश्य अपेक्षणीय 'तुम्हारा हेतु, सम-बल प्रतिपक्ष से पराहत होने से असाधक है' इत्याकारक अनुमितिरूप द्वार से आत्मव्याघात दोनों स्थलों में तुल्य ही है। भेद यही है कि नैयायिक के यह कहने पर कि 'सब सत् है, अर्थक्रिया- कारी होने से', बौद्ध के 'सर्व असत् है, ज्ञेय होने से' इस जातिरूप उत्तर में ज्ञेयत्व हेतु [ स्व के भी ज्ञेय होने से स्व के स्वरूप रूप जो प्रतिपक्ष, उससे ] साक्षात् ही व्याहत है। किन्तु 'शब्द अनित्य है, कृतक होने से' इस नैयायिक के अनुमान में 'शब्द नित्य है, केवल आकाश-गुण होने से' इस सत्प्रतिपक्ष स्थल में प्रथम हेतु समबल प्रतिपक्ष आकाशैकगुणत्व से पराहत होने के कारण उसकी असाधकता के साधन द्वारा आकाशैकगुणत्वरूप हेतु अपना भी व्याघातक है। अर्थात् जैसे दूसरे के नाश के लिए स्वयं उसकाया हुआ भूत दूसरे का नाशकर अपने नाश का भी कारण होता है, वैसे ही स्थापना-हेतु के बाधनार्थ आकाशैकगुणत्व हेतु से उत्थापित समबलप्रतिपक्ष-प राहतत्वरूप हेतु अपने नाश का भी कारण हो जाता है। समर्थन—व्याघात तुल्य होने पर भी व्याप्ति होने से सत्प्रतिपक्ष सत् उत्तर है तथा व्याप्ति न होने से जाति असत् उत्तर । खण्डन—यदि सत्प्रतिपक्ष स्थल में दोनों हेतुओं में व्याप्ति मानें, तो दोनों हेतुओं के बल पर नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों विरुद्ध धर्मों का एकत्र ज्ञान होना चाहिए । समर्थन—नित्यत्व, अनित्यत्व दोनों धर्मों के विरोध को विषय करनेवाले प्रमाण के बल पर दोनों का एकत्र ज्ञान नहीं होगा । खण्डन—जैसे दोनों हेतुओं में व्याप्ति के बल पर हम एकत्र नित्यत्व का आपादन करते हैं, वैसे ही यदि उक्त व्याप्ति के बल पर 'नित्यत्व, अनित्यत्व कहीं विरुद्ध तो कहीं अविरुद्ध हैं' ऐसा आपादन करें, तो कौन हमें रोकेगा ?