भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 586

५६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [चतुर्थे रैकदर्शनदुःशक्यत्वं च । कार्यकारणभावस्य तज्जातीयतया नियतत्वेन व्यक्तिभेदस्य चक्रकानन्तर्भूतत्वात् । व्याघातेऽप्येकस्यैव जनकत्वाजनकत्वे तथा । न च कालभेदादिविशेषः ; घटतत्प्रध्वंसादौ कालभेदेऽपि तादात्म्यव्याघातोपगमादेव । 'सत्प्रतिपक्षजात्योश्च को विशेषो व्याघाते येन पूर्वत्र बाध्यबाधकयोर्द्वयो- रप्याभासत्वम्, उत्तरत्र तु उत्तरस्य परं तथोपेयत इति गुरवः । यद्यपि प्रतिपक्षहेतुः साध्यान्तरसाधक इत्यस्ति तस्य जात्युत्तरवैधर्म्यम्, अनाभासत्व का प्रयोजक है', तो यह कथन भी, चक्रक में व्यक्ति-भेद का अभाव- ज्ञान असंभव होने से, असङ्गत है । कारण कार्यकारणभाव दुःखादि जातीय में नियत है । अतः व्यवधान से परस्पर कार्यकारणभावरूप चक्रक के लक्षण में व्यक्ति- विषय का प्रवेश नहीं है । एक ही बीज में अङ्कुर की जनकता और अजनकता प्रामाणिक होने से व्याघात भी आभास है । समर्थन--जिस काल में जनकत्व हो, उसी काल में अजनकत्व का होना व्याघात है। बीज और अंकुर में काल-भेद होने से व्याघात नहीं है। खण्डन—जो आचार्य प्रागभाव तथा प्रध्वंसाभाव को प्रतियोगिरूप मानते हैं, उनके प्रति काल-भेद होने पर भी आप तो 'यदि घटः प्रागभावात्मकः प्रध्वंसाभावात्मको वा स्यात् व्याघातः स्यात्' इस प्रकार व्याघात का प्रसञ्जन करते हैं । अतः लक्षण में काल के अभेद का निवेश नहीं हो सकता । 'सत्प्रतिपक्ष तथा जाति दोनों में एक-सा व्याघात होने पर भी क्या विशेष है, जिससे सत्प्रतिपक्ष में बाध्य और बाधक दोनों आभास होते हैं और जाति में केवल उत्तर ही आभास होता है'—ऐसा गुरु (प्रभाकर) ने कहा है। समर्थन—सत्प्रतिपक्षस्थल में व्याप्ति होने से हेतु साध्य का साधक होता है और जातिस्थल में हेतु में साध्य की व्याप्ति न होने से वह साध्य का साधक नहीं होता, यही दोनों में भेद (विशेष) है । खण्डन—यह भेद अकिञ्चित्कर है, कारण १. व्याघात में कोई विशेष न होने पर भी श्रीउदयनाचार्य सत्प्रतिपक्ष से जात्युत्तर को विलक्षण मानते हैं । यहाँ प्रसंगतः उनके इस मत का भी प्रभाकर (गुरु) के शब्दों से ही खण्डन करते हैं—'सत्प्रतिपक्षजात्योश्च' इत्यादि से ।