खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
५६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [चतुर्थे रैकदर्शनदुःशक्यत्वं च । कार्यकारणभावस्य तज्जातीयतया नियतत्वेन व्यक्तिभेदस्य चक्रकानन्तर्भूतत्वात् । व्याघातेऽप्येकस्यैव जनकत्वाजनकत्वे तथा । न च कालभेदादिविशेषः ; घटतत्प्रध्वंसादौ कालभेदेऽपि तादात्म्यव्याघातोपगमादेव । 'सत्प्रतिपक्षजात्योश्च को विशेषो व्याघाते येन पूर्वत्र बाध्यबाधकयोर्द्वयो- रप्याभासत्वम्, उत्तरत्र तु उत्तरस्य परं तथोपेयत इति गुरवः । यद्यपि प्रतिपक्षहेतुः साध्यान्तरसाधक इत्यस्ति तस्य जात्युत्तरवैधर्म्यम्, अनाभासत्व का प्रयोजक है', तो यह कथन भी, चक्रक में व्यक्ति-भेद का अभाव- ज्ञान असंभव होने से, असङ्गत है । कारण कार्यकारणभाव दुःखादि जातीय में नियत है । अतः व्यवधान से परस्पर कार्यकारणभावरूप चक्रक के लक्षण में व्यक्ति- विषय का प्रवेश नहीं है । एक ही बीज में अङ्कुर की जनकता और अजनकता प्रामाणिक होने से व्याघात भी आभास है । समर्थन--जिस काल में जनकत्व हो, उसी काल में अजनकत्व का होना व्याघात है। बीज और अंकुर में काल-भेद होने से व्याघात नहीं है। खण्डन—जो आचार्य प्रागभाव तथा प्रध्वंसाभाव को प्रतियोगिरूप मानते हैं, उनके प्रति काल-भेद होने पर भी आप तो 'यदि घटः प्रागभावात्मकः प्रध्वंसाभावात्मको वा स्यात् व्याघातः स्यात्' इस प्रकार व्याघात का प्रसञ्जन करते हैं । अतः लक्षण में काल के अभेद का निवेश नहीं हो सकता । 'सत्प्रतिपक्ष तथा जाति दोनों में एक-सा व्याघात होने पर भी क्या विशेष है, जिससे सत्प्रतिपक्ष में बाध्य और बाधक दोनों आभास होते हैं और जाति में केवल उत्तर ही आभास होता है'—ऐसा गुरु (प्रभाकर) ने कहा है। समर्थन—सत्प्रतिपक्षस्थल में व्याप्ति होने से हेतु साध्य का साधक होता है और जातिस्थल में हेतु में साध्य की व्याप्ति न होने से वह साध्य का साधक नहीं होता, यही दोनों में भेद (विशेष) है । खण्डन—यह भेद अकिञ्चित्कर है, कारण १. व्याघात में कोई विशेष न होने पर भी श्रीउदयनाचार्य सत्प्रतिपक्ष से जात्युत्तर को विलक्षण मानते हैं । यहाँ प्रसंगतः उनके इस मत का भी प्रभाकर (गुरु) के शब्दों से ही खण्डन करते हैं—'सत्प्रतिपक्षजात्योश्च' इत्यादि से ।
परिच्छेद ] तर्क-विशेष-लक्षणों का खण्डन ५६५ तथापि 'त्वद्धेतुरसाधकः समबलप्रतिपक्षप्रतिहतत्वादित्यस्य दूषणत्वार्थमवश्या- पेक्ष्यस्य द्वाराऽऽत्मव्याघातकत्वात् साक्षाद्वा अवश्योपस्थाप्यद्वारेण वा स्वव्याघा- तकतायामुपयुक्तविशेषाभावः । न च तत्राऽऽस्तामेव व्याघातः, सत्प्रतिपक्षता तु निरवद्यैवेति शक्यं वक्तुम् । यतः शब्दादेर्नित्यत्वमेकस्मादनित्यत्वं चापरस्मादनुमानात्तथा सति किं न स्यात् । तयोर्विरोधग्राहिणः प्रमाणस्य बलादिति चेन्न । यथा नित्यत्वम- नित्यत्वमित्युभयमास्तामित्याचक्ष्महे तथा 'विरुद्धमविरुद्धं चाऽस्तामि'त्यपि ब्रुवतोऽस्मान् कथं निवारयिष्यसि ? दोष देने के लिए अवश्य अपेक्षणीय 'तुम्हारा हेतु, सम-बल प्रतिपक्ष से पराहत होने से असाधक है' इत्याकारक अनुमितिरूप द्वार से आत्मव्याघात दोनों स्थलों में तुल्य ही है। भेद यही है कि नैयायिक के यह कहने पर कि 'सब सत् है, अर्थक्रिया- कारी होने से', बौद्ध के 'सर्व असत् है, ज्ञेय होने से' इस जातिरूप उत्तर में ज्ञेयत्व हेतु [ स्व के भी ज्ञेय होने से स्व के स्वरूप रूप जो प्रतिपक्ष, उससे ] साक्षात् ही व्याहत है। किन्तु 'शब्द अनित्य है, कृतक होने से' इस नैयायिक के अनुमान में 'शब्द नित्य है, केवल आकाश-गुण होने से' इस सत्प्रतिपक्ष स्थल में प्रथम हेतु समबल प्रतिपक्ष आकाशैकगुणत्व से पराहत होने के कारण उसकी असाधकता के साधन द्वारा आकाशैकगुणत्वरूप हेतु अपना भी व्याघातक है। अर्थात् जैसे दूसरे के नाश के लिए स्वयं उसकाया हुआ भूत दूसरे का नाशकर अपने नाश का भी कारण होता है, वैसे ही स्थापना-हेतु के बाधनार्थ आकाशैकगुणत्व हेतु से उत्थापित समबलप्रतिपक्ष-प राहतत्वरूप हेतु अपने नाश का भी कारण हो जाता है। समर्थन—व्याघात तुल्य होने पर भी व्याप्ति होने से सत्प्रतिपक्ष सत् उत्तर है तथा व्याप्ति न होने से जाति असत् उत्तर । खण्डन—यदि सत्प्रतिपक्ष स्थल में दोनों हेतुओं में व्याप्ति मानें, तो दोनों हेतुओं के बल पर नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों विरुद्ध धर्मों का एकत्र ज्ञान होना चाहिए । समर्थन—नित्यत्व, अनित्यत्व दोनों धर्मों के विरोध को विषय करनेवाले प्रमाण के बल पर दोनों का एकत्र ज्ञान नहीं होगा । खण्डन—जैसे दोनों हेतुओं में व्याप्ति के बल पर हम एकत्र नित्यत्व का आपादन करते हैं, वैसे ही यदि उक्त व्याप्ति के बल पर 'नित्यत्व, अनित्यत्व कहीं विरुद्ध तो कहीं अविरुद्ध हैं' ऐसा आपादन करें, तो कौन हमें रोकेगा ?
५६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ स्यादप्येवं यदि सत्प्रतिपक्षत्वमेव तत्र दोषो न स्यादिति चेत्; तर्हि मन्तव्यं प्रथमस्य हेतोः समानबलप्रतिपक्षप्रतिहतत्वादसाधकत्वमित्युक्तमावर्तते । अनवस्थायां च यस्यां यस्यां सत्तायामपरापरसत्ता यायात्, तस्यास्तस्याः प्रमाणेन सिद्धौ नानवस्था दोषः स्यात्, असिद्धौ चाऽऽश्रयासिद्धविषयमापादन- मिति । यदिच आत्माश्रयादिषु सर्वत्र विशेषोऽयमभिधीयते प्रमाणसिद्धत्वात्तत्र तथोपेयतं इति; तर्ह्यापादनस्थाने तथाभ्युपगमाय प्रमाणं नास्तीत्युक्तं भवति । तथाच तत्र प्रमाणप्रश्नस्यावसरो न प्रसङ्गस्येति ।
अप्रसङ्गात्मक-तर्कनिरूपणम्
अपरेऽपि विषयभेदात्तर्कभेदा आत्माश्रयादिवत् मन्तुमुचिताः । तद्यथा— अविनिगमः, उत्सर्गः, कल्पनागौरवलाघवे च, अनौचित्यं चेति । विकल्पेन अन्वयावगमयोग्येऽनेकस्मिन्नभ्युपगते तदेकदेशान्वयनियम- समर्थन—सत्प्रतिपक्षरूप दोष न होने पर व्याप्ति के बल पर साध्य की सिद्धि होती है । यहाँ तो सत्प्रतिपक्ष दोष है, अतः नित्यत्व और अनित्यत्वरूप विरुद्ध धर्मों का एकत्र अध्यास नहीं होता । खण्डन—तब यह मानना चाहिए कि प्रथम हेतु समानबल- प्रतिपक्ष-पराहृत होने से असाधक है । यदि ऐसा मान लें, तो उक्त वेताल-न्याय से वही स्वव्याघातक भी होने से जाति से सत्प्रतिपक्ष में कुछ विशेष ही नहीं रह जायगा । किञ्च—अनवस्था-स्थल में जिस-जिस सत्ता में अपर-अपर सत्ता का आपादन करते हैं, उस-उस सत्ता में यदि प्रमाण है, तो प्रामाणिक होने से अनवस्था दोष नहीं है । यदि प्रमाण नहीं, तो आश्रय की असिद्धि होने से अनवस्था का आपादन हो ही नहीं सकता । यदिच आत्माश्रयादि सभी स्थलों में यह विशेष कहा जाय कि 'अमुक स्थल में प्रमाणसिद्ध होने से आत्माश्रयादि दोष नहीं हैं,' तो इसका अर्थ यही होता है कि आपादन के स्थान में अमुक आत्माश्रय आदि मानने में प्रमाण नहीं है । एवञ्च प्रमाण-प्रश्न का यह स्थल है, प्रसङ्ग का नहीं ।
अप्रसंगात्मक तर्क का निरूपण
विषय-भेद से आत्माश्रयादि की तरह अविनिगम, उत्सर्ग, कल्पना-गौरव, कल्पना-लाघव और अनौचित्य ये भी अन्य पांच तर्क मानने योग्य हैं । विकल्प से अन्वययोग्य अनेक के प्रसक्त होने पर उनमें से एक के अन्वय का
परिच्छेद ] अप्रसंगात्मक तर्क का निरूपण ५६७ निर्द्धारणाशक्यत्वमविनिगमः, सत्प्रतिपक्षहेतोरिव निर्द्धारयितुमशक्यानन्वयोः परस्परप्रतिक्षेप एव पर्यवसानात् । नन्वन्यतरमादायापि प्रकृतस्योपपत्तिसम्भवेन अविनिगमस्य दोषत्वमेवा- नुपपन्नम् । केवलं पुंसस्तत्र यदि संशयः स्यात्स च किं न स्यादिति चेन्न । भावानवबोधात् । प्रमाणासम्भवेन क्वचिदपि विशेषः कथमभ्युपगन्तुं शक्यो यमादाय वस्तुगत्याऽप्येकस्यान्वयः स्यात् । नन्वेवं प्रमाणाभाव एव दोषः स्यान्न अविनिगम इति चेन्न । तस्य अवि- निगमोन्नेयत्वेन अविनिगमस्यैव प्रथमोत्पन्नस्योपन्यासोचित्यात् । जो नियम है, उसके निर्धारण की अशक्यता अविनिगम है। जैसे—भूतत्व और मूर्तत्व दोनों में जातित्व के अन्वय की योग्यता है और दोनों को जाति मानने में साङ्कर्य दोष होगा, अतः एक को ही जाति मानना चाहिए। यहाँ अनुगत-प्रतीतिरूप जातित्वसाधक प्रमाण दोनों स्थलों में तुल्य होने से यह विकल्प होता है कि भूतत्व जाति है या मूर्तत्व ? दोनों के बीच एक में भी जातित्व का अन्वय अशक्य नहीं है, यही अविनिगम है। यहाँ सत्प्रतिपक्षि-हेतु की तरह एक के जातित्व की ग्राहक सामग्री, इतर के जातित्व की प्रतिबन्धिका हो जाती है। समर्थन—एक भूतत्व को जाति मान लेने पर सङ्कर-दोष का परिहार हो जाता है, अतः अविनिगम दोष ही नहीं है। अविनिगम-स्थल में पुरुष को केवल सन्देह होता है, उसकी भी निवृत्ति हो सकती है। खण्डन—आपने मेरे भाव को नहीं जाना। भूतत्व और मूर्तत्व दोनों के मध्य एक में कोई विशेष (जातित्वसाधक अतिशय) मानने में प्रमाण ही नहीं है। फिर किसके बल पर एक में जातित्व का अन्वय करेंगे। अर्थात् अनुगत-प्रतीतिरूप प्रमाण दोनों में तुल्य है और इससे अतिरिक्त अन्य विशेष होने में कोई प्रमाण नहीं है। समर्थन—यदि ऐसा है, तो 'प्रमाणाभाव' को ही दोष मानिये, 'अविनिगम' को दोष मानना व्यर्थ है। खंडन—प्रमाणरूप विशेष अतीन्द्रिय होने से वह अविर्नि- गम से अनुमेय ही है। अतः प्रथम उपस्थित होने से अविनिगम ही दोष है, प्रमाणाभाव नहीं। १. 'प्रकृतोद्देश्यविधेयभावतद्व्याप्यतरान्यमितस्तथा तुल्यबलानेकसंसर्गको तादृश्यान्वयितया तदेकदेशनिर्द्धारणा- सम्भवत्वम्' यह अविनिगम का लक्षण है।
५६८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ नन्वेवमनुमाने व्यक्त्यविनिगमो दोषः स्यादिति चेन्न । तत्रानेकव्यक्तीना- मभ्युपगमसिद्धयभावात् सामान्योपसंहारस्यैकामेव व्यक्तिमाक्षेप्तुं सामर्थ्यात्, अविनिगमस्य चानेकाभ्युपगमे सत्युपस्थानादिति । बाहुल्यादृष्टमपेक्ष्य बाहुल्यदृष्टतयाऽदुर्बलस्योपगमार्हता उत्सर्गः । तथथा— स्वस्थस्य जाग्रतो ज्ञानं प्रामाण्याप्रामाण्यनिर्धारकप्रमाणानुपनिपाताविशेषेऽपि विना बाधमप्रामाण्यमभ्युपगच्छन्तं प्रति स्यात्, न तु प्रामाण्यम्, यं तर्कमेतमालम्ब्याऽऽहुः— 'तस्माद्बोधात्मकत्वेन प्राप्ता बुद्धेः प्रमाणता । अर्थान्यथात्वहेतूत्थदोषज्ञानादपोद्यते ॥'—इति । द्रष्टव्योदाहरणं चैतदीश्वराभिसन्धौ वेदप्रामाण्ये तथा, यथा न सौगतोऽपि विप्रतिपत्तुमर्हति । समर्थन—यदि अविनिगम को दोष मानें, तो धूम से पर्वत में तार्ण (तृणजन्य), पार्ण (पर्णजन्य) या काष्ठज वह्नि के बीच एक का भी अन्वय अशक्य होने से सर्वत्र अनुमिति-स्थल में अविनिगम रहेगा । एवञ्च अनुमितिमात्र का उच्छेद हो जायगा । खण्डन—अनुमिति-स्थल में अनेक व्यक्तियों की प्रसक्ति ही नहीं होती। कारण वह्नित्वरूप-सामान्यधर्मावच्छिन्नं व्याप्तिग्रह की एक व्यक्ति के आक्षेप में ही सामर्थ्य है और अविनिगम तो अनेक व्यक्तियों के प्रसक्त होने पर ही होता है । लोक में अप्रसिद्ध की अपेक्षा अतिप्रसिद्ध अदुर्बल के स्वीकार की योग्यता १उत्सर्ग है । जैसे जो किसी स्वस्थ (निर्दोषताक्ष) और जाग्रत मनुष्य के ज्ञान को [ प्रामाण्य- अप्रामाण्य के निर्णायक प्रमाणरूप विशेष न होने पर भी बाध के अभावकाल में ] अप्रमाण मानते हैं, उनके प्रति उत्सर्ग दोष होता है। जो उक्त ज्ञान को प्रमाण मानते हैं, उनके प्रति उत्सर्ग दोष नहीं होता । इस उत्सर्गरूप तर्क का अवलम्बनकर भट्टपाद ने चोदना-सूत्र के प्रसङ्ग में ५३ वीं कारिका द्वारा कहा है कि बोधस्वरूप होने से ही बुद्धि को उत्सर्गतः प्रामाण्य प्राप्त हो जाता है, [कारण प्रायशः ज्ञानमात्र प्रमा हुआ करता है ] । किन्तु वह प्रामाण्य कहीं-कहीं विषय के अभाव से विषय या चक्षुरादिनिष्ठ दोष से बाधित भी हो जाता है । 'ईश्वराभिसन्धि' के वेद-प्रामाण्य नामक प्रकरण में उत्सर्ग का उदाहरण हमने इस प्रकार दिखलाया है, जिसमें बौद्ध भी विप्रतिपत्ति नहीं कर सकते । १ इस तरह भूयोदर्शनरूपता वा भूयः सहचाररूपता ही उत्सर्ग का स्वरूप सिद्ध होता है ।
परिच्छेद ] अप्रसङ्गात्मक तर्क का निरूपण ५६६ ननु बलवदेककोटिकः संशय एवोत्सर्गः, तत्कथं तर्कः स्यादिति चेन्न । उत्सर्गस्य सम्भावनायाः स्वार्थस्थित्यनुकूलतयाऽवलम्ब्यत्वात् ; संशयस्य त्वनेव- म्भावात् , उत्सर्गस्यैककोटिनिष्ठत्वात् संशयस्य च कोटिद्वयावगाहित्वात् । एतेन संशयस्यैवैका बलवती या कोटिः सैवोत्सर्ग इति निरस्तम् । निर्णयोऽपि संशयस्यैव वस्तुनियतकारणजत्वरूपबलवती कोटिः स्यात् । स्यादप्येवं यद्युत्सर्गवन्निर्णयेऽपि संशयस्यानुस्फूर्तिः स्यादिति चेन्न । उत्सर्गोदाहरणे उत्सर्गमाद्रियमाणैः संशयोच्छेदानुमतेरेव बाधाभावं सहकारिण- मपेक्ष्य उत्सर्गेणार्थैक्याभाव एव प्रमाणीभवनात् । तस्माद्यथा अनवस्थादयो बाधाद् दूषणत्वं त्यजन्तस्तदभावे दूषणानि भवन्ति तथोत्सर्गेऽपि तथैवेति । प्रश्न—हम उत्सर्ग को 'प्रायशः ज्ञानं प्रमैव स्यात्' इत्याकारक बलवान् एक- कोटिवाला सम्भावनारूप सन्देह ही मान लेंगे । उसको तर्क क्यों माना जाय ? उत्तर—तथाकथित सम्भावनारूप उत्सर्ग स्वप्रयोजन ( ज्ञान-प्रामाण्य ) की सत्ता के साधनार्थ माना जाता है, पर संशय उभयकोटिक होने से उक्त प्रयोजन का साधन नहीं हो सकता । इसी तरह उत्सर्ग एककोटिक होता है, जब कि सन्देह कोटि- द्वयावगाही हुआ करता है । अतः उत्सर्ग सन्देह नहीं, किन्तु तर्क ही है । अतएव 'संशय की ही एक बलवती कोटि उत्सर्ग है' यह कथन भी खण्डित जानना चाहिए । प्रयोजन का साधक होने पर भी उत्सर्ग को यदि सन्देह मानें, तो निश्चय को भी वस्तु से नियत सन्निकर्षरूप कारण से जन्य सन्देह की ही एक बलवती कोटि क्यों न माना जाय ? प्रश्न—उत्सर्ग के उदाहरण में संशय की स्फूर्ति होती है, पर निश्चय में वह नहीं होती । अतः निश्चय सन्देह की बलवती कोटि नहीं हो सकता । उत्तर—जो उत्सर्ग का आदर करते हैं, वे उत्सर्ग के उदाहरण में संशय की स्फूर्ति नहीं, किन्तु संशय का उच्छेद ही मानते हैं । कारण बाधाभाव से सहकृत होकर उत्सर्ग ज्ञान के प्रामाण्य में प्रमाण होता है । तस्मात् जैसे बाध होने पर अनवस्था आदि अपना दूषकत्व त्याग देते हैं, पर बाधाभावस्थल में दूषक होते हैं, वैसे ही उत्सर्ग भी बाध के अभाव में प्रमाण होता ही है ।
'सुगमासुगमयोरसुगमदुर्बलत्वं कल्पनागौरवम्, दृष्टजातीयमपेक्ष्यादृष्ट- जातीयं दुःखेन प्रमीयते, स्वल्पमपेक्ष्य च बह्विति अखिलजनानुभवसिद्धमेतत् । दर्शितं च विविच्येदमीश्वराभिसन्धौ । यथा—नैयायिकादिकं प्रति क्षित्यादिषु प्रतिकार्यं कर्तॄणां भिन्नानामभ्युपगमापादके, यथा च सौगतं प्रति प्रत्येकं कारणानां समर्थानामेकसमानदेशकालानामनेकनीलादिव्यक्त्युत्पादापादके चेति दूषणानुकूलमिदम् । तद्व्यतिरेकेण कल्पनालाघवं साधनानुकूलम् । प्रामाणिकाव्यवहार्यत्वमसमाधेयजातीयमनौचित्यं वैयात्यनामकम् । तस्य भेदाः प्रश्नवैयात्यादयः । प्रश्नविषयमप्रमिण्वतां प्रति प्रश्नानौचित्यं प्रश्न- सुबोध और दुर्बोध के मध्य दुर्बोध की दुर्बलता कल्पना-गौरव है। दृष्टजातीय की अपेक्षा अदृष्टजातीय तथा स्वल्प की अपेक्षा बहु पदार्थ दुःख से जाना जाता है—यह सर्वसाधारण के अनुभव से सिद्ध है। इस कल्पना-गौरव का उदाहरण 'ईश्वराभिसन्धि' नामक ग्रन्थ में विवेचनपूर्वक दिखाया गया है। जैसे—नैयायिक द्वारा कार्यत्व-हेतु से क्षित्यादि में कर्तृजन्यत्व का साधन करने पर, 'क्षित्यादि कार्य अनेक होने से अनेक कर्ताओं की सिद्धि क्यों नहीं होती ?' वादी की इस आपत्ति की निवृत्ति कल्पना-गौरवरूप तर्क से होती है। इसी प्रकार बौद्धमत में 'प्रत्येक समर्थ (फलोपधायक), अनेक और समान देश-कालवाले कारणों का प्रत्येक, अनेक नीलादि-कार्यकारित्व क्यों न हो ?'- इस शंका की निवृत्ति कल्पना-गौरवरूप तर्क से होती है। कल्पना-गौरव प्रतिवादी द्वारा कथित दूषण के अनुकूल है और उसका अभावरूप कल्पना-लाघव स्वपक्ष के साधन के अनुकूल है। 'प्रामाणिकों के व्यवहार का अविषय तथा समाधान के लिए अयोग्य' अनौचित्य है और अनौचित्य का ही नाम 'वैयात्य' है। अनौचित्य के भेद प्रश्न, वैयात्य आदि हैं। जो पण्डित प्रश्न के विषय को ही नहीं मानते, उनके प्रति उस 'विषय में विशेष के ज्ञानार्थ प्रश्न करना प्रश्नानौचित्य है। जैसे—प्रमाणव्यवहारी नैयायिक आदि के प्रति यदि बौद्ध यह प्रश्न करे कि 'आप जगत् को अवस्तु (असत्) तो मानते ही हैं, १. अर्थात् जहाँ उपस्थितिकृत, शरीरकृत या सम्बन्धकृत लाघव हो, वहीं सुगम है और तदन्य असुगम है। असुगम की दुर्बलता का अर्थ है, प्रमाणापरिच्छेद्यता; कारण प्रमाता स्वभावतः लघु अर्थ का ही ग्रहण करता है। एवञ्च 'इदमस्माद् गुरु', 'इदमस्मात् लघु' इत्याकारक प्रतीतिसिद्ध स्वरूपसम्बन्ध-विशेष ही गौरव-लाघव हैं।
परिच्छेद ] अप्रसङ्गात्मक तर्क का निरूपण ५७१ वैयात्यम् । यथा—अवस्तुनि विधिनिषेधयोः किमिच्छसीति पृच्छति प्रमाणव्यव- हारिणां सौगते । अत एवात्र अनौचित्यापरनामकं वैयात्यं परस्य दोषं मनसि कृत्वैके ब्रुवते—'अत्र सहृदयानां मूकतैवौचिता' इति । अपरे च—'न ह्यप्रतीते देवदत्तादौ स किं गौरः कृष्णो वेति वैयात्यं विना प्रश्नः स्यादि'ति । यदि च इदमनौचित्यं नाम दोषो नाभ्युपेयते, तदानीमर्थान्तरेण प्रकृतमर्थं निरस्य अर्थान्तरस्यार्थान्तरेण परिहारात् तत्परम्परामालम्बितुकामः केन दोषेण अर्थान्तरपरिहाराभासत्ववादिनी अर्थान्तरेणैव तत्परिहरणमनुचितमित्यतोऽन्येन जीयेत । अर्थान्तरनिग्रहतायां विप्रतिपन्नोऽपि प्रश्नपरम्परामालम्ब्य स्वभङ्गभयात् कथावसानमनिच्छन्तं कथं जयेत ? न चानवस्थया जयतीति वाच्यम् ; यावदुत्तरमर्थान्तरेण परिहरणे प्रश्ना- न्तरेण वा द्वयोरप्यनवस्थासाम्यात् । परन्तु उस असत्त्व को भावरूप या अभावरूप मानते हैं ?' तो वह प्रश्नानौचित्य है । अतएव पर के ऐसे प्रश्न में प्रश्न-वैयात्य नामक दोष मानकर एक आचार्य ने कहा है—'ऐसे प्रश्न पर सहृदय पण्डितों के लिए मौन ही उचित है।' दूसरे आचार्य ने कहा है कि "अज्ञात देवदत्त के विषय में देवदत्त कृष्ण है या गौर ?' यह प्रश्न धृष्टता के सिवा और कुछ नहीं।" यदि अनौचित्य को दोष न मानें, तो प्रतिवादी का किसी भी प्रकार निग्रह न हो सकेगा । देखिये, वादी कहता है—'शब्दोऽनित्यः कृतकत्वात् ।' प्रतिवादी इसका अर्थान्तर से यों परिहार करता है—'शब्द विभु होने से उसे कृतक कहना अज्ञान है।' इस पर वादी कहेगा—'यह परिहार 'अर्थान्तर' होने से उचित नहीं है।' इस पर प्रतिवादी भी चुप न रहेगा और 'फिर वह 'अर्थान्तर ही क्या है ?' इस प्रकार प्रश्नों की परम्परा चलाता ही रहेगा । अर्थात् 'अर्थान्तर' होने से परिहार को 'आभास' कहनेवाले के प्रति 'पुनः अर्थान्तर से ही परिहार अनुचित है' इस प्रकार अनौचित्य के उद्भावन से ही उक्त प्रतिवादी निगृहीत हो सकता है । किञ्च— जो स्वयं अर्थान्तर को निग्रहस्थान नहीं मानते, वे यदि पराजय के भय से प्रश्न- परम्परा का अवलम्बनकर शास्त्रार्थ की समाप्ति ही न चाहें, तो अनौचित्य से अन्य किस निग्रह से आप उन्हें परास्त करेंगे ? तस्मात् अनौचित्य अवश्य मानना चाहिए । प्रश्न—स्वपराजय के भय से प्रश्न-परम्परा का अवलम्बन करनेवाले पुरुष को अनवस्था से ही पराजित कर सकते हैं । उत्तर—अनवस्था ही क्या है, ऐसा प्रश्न होने से प्रश्न और उत्तर दोनों पक्षों में अनवस्था समान है ।
'दोषं व्यक्तिविवेकेऽमुं कविलोकविलोचने । काव्यमीमांसिषु प्राप्तमहिमा महिमाऽऽदृत ॥' ननु कथमत्र प्रामाणिकाव्यवहार्यत्वमिति पृष्टेन यदि मूकत्वमालम्ब्य तथात्वं वादिनि न व्युत्पाद्यते, तदानीमप्रतिभाऽऽपतेत् । अथ तथात्वं व्युत्पाद्यते प्रश्ना- र्थादेः प्रमाणाविषयत्वमुपन्यस्य, तदाऽत्यन्तासद्व्यवहार्यता स्वीकृतैव स्यादिति चेत् । अत्र ब्रूमते--मूकतैवात्र विजयायेति । न चाप्रतिमैवं प्रसज्येत; उत्तरस्या- ऽप्रतिपत्तिरुत्तरार्हस्येति तल्लक्षणात् । यदि चायं नियमो वादिना इष्यते, यद्भ्रान्त्यैन तेन व्यवहर्तव्यमनुवादा- दन्यत्रेति; तदा मध्यस्थोद्भाव्यत्वमस्य दोषस्योपन्यस्यताम् । मध्यस्थेन ह्यपभ्रंशभाषयाऽपि यथा वादिप्रबोधनं क्रियते, तथा यद्यप्रमाणमवलम्ब्यापि क्रियते, तदा को दोषस्तस्य स्यात्, तत्र विषये तथैव तेन वादिबोधनस्य शक्य-
काव्यतत्त्वविवेचक पण्डितों में अत्यन्त समादृत आलंकारिक महिम भट्ट ने कविजनों के नेत्र-तुल्य 'व्यक्तिविवेक' नामक अपने ग्रन्थ में ध्वनिकार प्रभृति आद्य आचार्यों के इस कथन का उल्लेख करते हुए कि 'अनौचित्यादृ ते नान्यद् रसभङ्गस्य कारणम्' (रसभंग का कारण अनौचित्य के सिवा और कुछ भी नहीं है । सभी रसभंजक दोषों में अनौचित्य अनुस्यूत ही रहता है ), इस दोष का आदर किया है । प्रश्न--'अनौचित्य प्रामाणिकों द्वारा अव्यवहार्य कैसे हैं ?' ऐसा प्रश्न होने पर यदि मूकता का अवलम्बन कर वादी के प्रति अनौचित्य की अव्यवहार्यता का प्रतिपादन न किया जाय, तो 'अप्रतिभा' नामक निग्रह होगा । तदर्थ यदि अनौचित्य में प्रमाणा- विषयत्व का प्रतिपादनकर 'अनौचित्य की प्रामाणिक अव्यवहार्यता' का प्रतिपादन किया जाय, तो अत्यन्त असत् वस्तु में भी आपने व्यवहार्यता मान ली, कारण 'अनौचित्यं प्रामाणिकाव्यवहार्यम्, प्रमाणाविषयत्वात्' इस प्रकार शब्द-व्यवहार का विषय वह हो ही गया । उत्तर--अनौचित्य अव्यवहार्य कैसे है, इस प्रश्न में मूकता ही विजय का हेतु है । वहाँ मूकत्व के अवलम्बन में भी अप्रतिभा नहीं होती, कारण 'उत्तर-योग्य प्रश्न की अप्रतिपत्ति' ही अप्रतिभा है, अनौचित्य तो उत्तरार्ह ही नहीं है । यदि वादी इस नियम को स्वीकार करता हो कि 'अनुवाद से अन्यत्र मैं भ्रान्ति से व्यवहार नहीं करूँगा' तो मध्यस्थ को ही वहाँ अनौचित्य का उद्भावन करना चाहिए । मध्यस्थ जैसे अपभ्रंश शब्दों से ( जो कि निरर्थक निग्रहस्थान से निग्रह के
त्वात् । तस्मात् मध्यस्थं प्रत्यनुत्तरदाने स्वदोषपरिहाराय प्रतिवादिनाऽपि वैयात्य- लक्षणदर्शनं कार्यम्, मध्यस्थं प्रति तस्याप्रमाणेनापि प्रतिबोधने निर्दोषत्वात् । ननु वादिभ्यामेव वा, वादिनि मध्यस्थेन वा, तं प्रति वादिना वाऽत्यन्ता- सद्धिषये व्यवहारोपगमे कथं नासत्ख्यातिः स्वीकृता स्यात् ? किं न स्यात् । विशिष्टरूपे सम्बन्धांशे चासत्ख्यातेरन्यथाख्यातिवादिभिरप्यभ्युपगमात् । ननु 'वन्ध्यासुताच्छशविषाणं भिन्नम्'त्यादिषु व्यवहरतः कथं विशेष्ये विशेषणेऽपि नासत्ख्यातिरूपगन्तव्येति चेत् । न ; असत्ख्यात्यभ्युपगमस्य सत्ख्यातित्वात्यागनियमोपगमविश्रान्तत्वात् । असदपि सदुपश्लिष्टमेव प्रतिभासते, न तु केवलमसत् कयाऽपि ख्यात्या समुल्लिख्यते इत्यन्यथाख्यातिवादिभिरिष्य- माणत्वात् । वन्ध्यासुताच्छशविषाणं भिन्नमिति प्रतिपत्राऽपि भिन्नमित्ययमंशः सामान्यतोऽन्यत्र दृष्ट एव प्रतीयते । केवलं भेदस्य सदाश्रयः प्रतियोगी चेति प्रयोजक होते हैं ) वादी का प्रबोधन करता है, वैसे ही अप्रमाण का अवलम्बन करके भी वादी का प्रबोधन करे तो क्या हानि है ? कारण मध्यस्थ वादी के प्रति अनौचित्य का प्रबोधन भ्रान्ति से ही कर सकता है, उसके लिए अभ्रान्तता से व्यवहार्यता का नियम नहीं है । तस्मात् मध्यस्थ के प्रति प्रतिवादी भी उत्तर न देने के अपने दोष ( अप्रतिभा ) के परिहारार्थ अनौचित्य का बोध करा ही सकता है । कारण मध्यस्थ के प्रति अप्रमाण से भी प्रतिबोधन में उसे कोई दोष नहीं है । एवञ्च वादी के नियोग के बिना मध्यस्थ भी उसके अनौचित्य का उद्भावन कैसे करेगा, यह शंका भी नहीं रहती । प्रश्न—अत्यन्त असत् वादी के प्रति वादी के, वादी के प्रति मध्यस्थ के या मध्यस्थ के प्रति वादी के को व्यवहार का विषय मान लेने पर तो असत्ख्याति का स्वीकार हो जायगा । उत्तर—अन्यथाख्यातिवादी विशिष्ट अंश या सम्बन्ध-अंश में जैसे असत्ख्याति मानते हैं, वैसे ही अनौचित्य के विषय में भी असत्ख्याति मानें, तो हानि क्या है ? प्रश्न—'वन्ध्या-सुत से शश-विषाण भिन्न है' इस स्थल में विशेष्य-विशेषण अंश में भी असत्ख्याति क्यों न मानी जाय ? उत्तर—असत्ख्याति के अस्वीकार का अर्थ है, सत्ख्याति का अत्याग । सर्वथा असत्ख्याति को न मानना उसका अर्थ नहीं है, कारण असत् भी सत् से उपश्लिष्ट ही भासता है, केवल असत् किसी ख्याति से नहीं भासता । यही तो अन्यथाख्यातिवादी भी मानते हैं । 'वन्ध्या-सुत से
५७४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ यद्वस्तुतः तदसदाश्रयः प्रतियोगी च तस्येत्यन्यथा कृत्वा प्रतीयत इत्यन्यथा- ख्यातिरेवोपगता भवति । यथा तु विशिष्टमत्यन्तासदेव तथाऽऽश्रयप्रतियोगिनी अत्यन्तासती एव किं न प्रतिभासेते ? तावताऽपि यथोक्तान्यथाख्यात्यनुलङ्घनादेव । न चैवमसत्ख्यातिवादिनाऽपि शक्यं वक्तुम् ; केवलं सदेव प्रकाशत इत्य- स्मात्पक्षाद्विपरीतं विशिष्टं सम्बन्धश्च क्वचिद्विशेषणाद्यपि अत्यन्तासद् भ्रान्त्योल्लि- ख्यत इत्येवंरूपा तावदसत्ख्यातिः परेणोपगतैव । यदि तु सदपि प्रकाशते किञ्चित्, तत्किं नासत्प्रकाशत इति । यतः परेण विकल्पः सर्वथा वस्त्वनुल्लेखी केवलमलीकमुल्लिखन् असत्ख्यात्यात्मा स्वीक्रियते । यदि तु यथोक्तमेव परोऽप्यभ्युपगच्छति; तदानीमनुमानप्रमाणादिवत् अत्राप्यविप्रतिपत्तिरेवेति । शशविषाण भिन्न है' इस स्थल में भी सामान्यतः अन्यत्र दृष्ट ही भेद प्रतीति का विषय होता है । अन्तर केवल यह है कि अन्यत्र भेद का सत् आश्रय और प्रतियोगी भासता है और प्रकृत में अन्यथा रूप से भेद का असत् प्रतियोगी और असत् आश्रय भासता है । फिर यहाँ भी अन्यथाख्याति ही क्यों न मानी जायगी ? जैसे विशिष्ट अत्यन्त असत् ही भासता है, वैसे ही उक्त प्रतीति में आश्रय आश्रय और प्रतियोगी अत्यन्त असत् ही भासते हैं, ऐसा मानने पर भी अन्यथाख्याति का उल्लंघन नहीं है । प्रश्न—असत्ख्यातिवादी भी कह सकता है कि "जैसे 'केवल सत् ही भासता है' इस पक्ष से विपरीत विशिष्ट, सम्बन्ध और कहीं-कहीं विशेषण भी अत्यन्त असत् ही भासते हैं, ऐसी असत्ख्याति को अन्यथाख्यातिवादी मानते हैं, वैसे ही असत् भी 'सत् से उपश्लिष्ट ही भासता है, केवल नहीं भासता । अतः सर्वज्ञान असत्ख्याति ही है।" उत्तर—बौद्ध सद्वस्तु की अनवगाहिनी केवल उल्लेख करनेवाली विकल्परूप असत्ख्याति मानते हैं और अन्यथाख्यातिवादी सत्-उपश्लिष्ट ही असत् भासता है, ऐसा मानते हैं । दोनों मतों में यह महान् भेद है । यदि कहें कि 'बौद्ध भी सत् से उपश्लिष्ट ही असत् के भान को असत्ख्याति मान लेंगे। अर्थात् जैसे किञ्चित् सत् के भासने पर भी वे अन्यथाख्याति मान लेते हैं, वैसे ही किञ्चित् असत्के भासने पर असत्ख्याति भी क्यों न मानी जाय ?', तो यह भी ठीक नहीं। कारण अनुमान के प्रामाण्य के तुल्य उक्तस्वरूप असत्ख्याति मानने में हमें तो कोई विप्रतिपत्ति नहीं होगी, किन्तु आप बौद्धों के लिए यह अपसिद्धान्त हो जायगा ।
परिच्छेद ] अप्रसंगात्मक तर्क का निरूपण ५७५ ननु सर्वथैवासत्ख्यातिरपि भवताऽनुमन्तव्यैव । तथाहि-'वन्ध्यासुत-शशविषाणे कूर्मरोमैवे'ति वदतः शब्दादर्थं प्रतिपादयतां किं तदणुमात्रमपि समुल्लेख्यं तत्प्र- तीतेरिति चेन्न । तत्रापि तादात्म्यस्य सामान्यतोऽन्यत्र प्रतीतस्यैव असदुपहितस्य स्फुरणोपगमात् । प्रकारभेदवैशिष्ट्येन भिन्नयोरेकत्वं हि तादात्म्यम्, तच्चाऽन्य- त्रास्त्येव । तर्कसंशयाभ्यामप्रमाभ्यां जननेऽपि तत्तत्प्रमावत् मध्यस्थाद्यप्रमया तथा प्रश्नानौचित्यादिप्रमोत्पादनाविरोधः । बाधवद्भ्रमविषयातथाभावेऽपि भ्रमस्या- अप्रमात्वपारमार्थिकतावत् प्रश्नविषयासत्यत्वेऽपि प्रश्नानौचित्यसत्यतोपपत्तिरेव । एतेन भ्रान्तिजाया धियः प्रमात्वं तथाप्यदृष्टचरमित्यपि परास्तप्रायमिति । एवमन्यत्राप्येवंविधोदाहरणे वाच्यम् । प्रश्न—आपको सर्वथा असत्ख्याति भी अवश्य माननी होगी। देखिये—'वन्ध्या- सुत और शशविषाण कूर्मरोम ही हैं' इस शब्द का क्या अणुमात्र भी अर्थ है, जो उक्त प्रतीति का विषय हो ? उत्तर—सामान्यरूप से अन्यत्र प्रतीत ही असत् से उपहित तादात्म्य इस प्रतीति का विषय होता है। कारण प्रकार-भेद से विशिष्ट विभिन्न अर्थों का ऐक्य 'तादात्म्य' पदार्थ है और वह अन्यत्र सत् ही है। किंच—तर्क तथा संशय स्वयं तो अप्रमाण हैं, फिर भी जैसे उनसे प्रमात्मक अनुमिति होती है, वैसे ही मध्यस्थ के अनौचित्यरूप विषय को विषय करनेवाली अप्रमा से भी प्रश्नानौचित्यविषयक प्रमा उत्पन्न हो ही सकती है। अथवा बाधित भ्रम का विषय भी असत् ही होता है, फिर भी उक्त भ्रम अपने में अप्रमात्व की पारमार्थिकता ( प्रमा ) का जनक होता ही है। इसी तरह 'शशशृङ्गमृजु वक्रं वा ?' इस प्रश्न का विषय असत् होने पर भी प्रश्नानौचित्य में सत्यत्व का अवगाहन करनेवाली प्रमा हो ही सकता है। इसीसे 'भ्रान्ति से जायमान बुद्धि में प्रमात्व कहीं नहीं देखा गया है' यह कथन भी खंडितप्राय है। कारण पीछे अनेक उदाहरणों द्वारा यह सिद्ध कर दिखाया जा चुका है कि भ्रान्तिज बुद्धि से भी प्रमा होती है। इसी प्रकार वन्ध्यासुत, गगनारविन्द, कूर्मरोम आदि असत्ख्यातियों में सत् से उपश्लिष्ट ही असत् का भान मानना चाहिए।
५७६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ न च कश्चिदुक्तप्रकारमन्यथाख्यातिसमाधानं नानुमन्तुं शक्नोति । अन्यथा कथमसत्ख्यातिवादिनो मतमपि जानीयात्, अज्ञात्वा च स्वपरमत- वैचित्र्यं वादे प्रवर्तेत । एते सर्वेऽपि तर्काः प्रमाणविरोधे वा प्रमाणाभावे वा निष्पीडिताः प्रविशन्तो न बाधासिद्धिभ्यां भिद्यन्ते । पूर्वैरपि लोकसिद्धत्वात् व्यवहृताः । केवलमस्माभिरेव तर्कपदव्यामभिषिक्ताः, ततो न प्रबन्धेन निरस्यन्ते - 'विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं च्छेत्तुमसाम्प्रतम्' इति । तर्काभास-खण्डनम् ये च परैस्तर्कदोषाः षट् स्वीक्रियन्ते—आश्रयासिद्धिः, अनुकूलत्वम्, मूलशैथि- ल्यम्, इष्टापादनम्, विपर्ययापर्यवसानम्, मिथोविरोधश्चेति; सोऽयं तर्कस्य दोषविभागो 'असत् भी सत् से उपश्लिष्ट ही भासता है, केवल असत् नहीं भासता और यही अन्यथाख्याति है'— कोई भी अन्यथाख्यातिवादी इस प्रकार उक्त अन्यथाख्याति के निर्वाह का अस्वीकार नहीं कर सकता । यदि अस्वीकार करे, तो असत्ख्यातिवादी के मत को कैसे जानेगा ? कारण वह असत् का भान तो मानता नहीं । मेरे कथन के अनुसार तो सत् जो ख्याति, उससे उपश्लिष्ट असत् का भान होता है, अतः असत्- ख्यातिवादी का मत जानने में उसे कोई बाधक नहीं है । स्व और परमत का वैलक्षण्य बिना जाने कोई भी पुरुष वाद में प्रवृत्त ही कैसे हो सकेगा ? विचार करने पर यदि अविनिगम आदि चार तर्क प्रमाण के विरोधरूप हों, तो बाध में और यदि प्रमाण के अभावरूप हों, तो असिद्धि में अन्तर्भूत हो जाते हैं, इनसे पृथक् नहीं हैं। पूर्वाचार्यों ने भी इन तर्कों को लोकसिद्ध माना है। मैंने ही केवल इन्हें तर्क-पदवी पर आरूढ़ किया है। इसीलिए हम अतियत्न से इनका खण्डन नहीं करते। कारण विष का वृक्ष भी स्वयं बढ़ाकर स्वयं छेदन के अयोग्य होता है, ऐसा वृद्धजन कहते हैं। अर्थात् बाध और असिद्धि से पृथक् पूर्वोक्त अविनिगम आदि तर्कों की सत्ता ही नहीं है और उन दोनों का खण्डन हो ही चुका है। अतः इनका खण्डन व्यर्थ है, यह भाव है। तर्काभासों का खण्डन आश्रयासिद्धि, अनुकूलत्व, मूलशैथिल्य, इष्टापादन, विपर्ययापर्यवसान और मिथो- विरोध तर्क के ये पांच अन्य दोष भी आचार्यों ने माने हैं। यह दोषविभाग भी ठीक
अप्रसंगात्मक तर्क का निरूपण ५७७
नोपपद्यते । व्याप्तिपक्षधर्मतयोः प्रतीतिमपेक्ष्य यथाऽनुमानं जायते तथैव तर्कोऽपि । इयान् परमनयोर्विशेषो यदनुमानं तयोः प्रमित्या जायते, तर्कस्त्व- वास्तवाभ्यामपि ताभ्यां पराभ्युपगममात्रसिद्धाभ्यां भवति । तेन विमृष्यमाणः तर्कः पराभ्युपगममात्रप्रसादसिद्धपरिकरो नाऽऽश्रयासिद्धिमपि तावद्वास्तवीमनु- रोद्धुमधिकरोति । ततः प्रमित्यभ्युपगमसिद्धिकृतवैचित्र्याश्रयाङ्गे'दादन्यो यावान् यथा च हेत्वाभासविभागः, तद्वदेव च तर्काभासविभागोऽपि न्याय्यः । तस्मादाश्रयासिद्धिमूलशैथिल्येष्टापादनानि असिद्धिरेकैव दोषोऽनुमानवत् । तत्र अप्रमितत्वावलम्बिनी, इह त्वनभ्युपगमावलम्बिनीति विशेषः । मिथोविरोधश्च सत्प्रतिपक्षतैव । विपर्ययापर्यवसानं तु दोष एवाऽऽपादनस्य न भवति । यन्नाम विपर्ययापर्यवसानादापादनमात्मसाधनानुकूलं न भवति, तदन्यदेव किमपि । नहीं है । कारण व्याप्तिपक्षधर्मता की प्रतीति के बल पर जैसे अनुमिति होती है, वैसे ही तर्क भी होता है । किन्तु दोनों में भेद यह है कि अनुमिति तो 'व्याप्ति-पक्षधर्मता की प्रमिति' के बल पर से होती है और तर्क अवास्तव, किन्तु 'पर के अभ्युपगम- मात्र से सिद्ध व्याप्ति-पक्षधर्मता' से भी होता है । इस प्रकार विचारने पर तर्क पर के अभ्युपगममात्ररूप प्रसाद से सिद्ध सामग्रीवाला है । अतः वह वास्तविक आश्रयासिद्धि को भी रोक नहीं सकता । तस्मात् प्रमिति और अभ्युपगम की सिद्धि के वैचित्र्य- मूलक भेदों को छोड़ जितने और जिस प्रकार के हेत्वाभास के विभाग अनुमान में होते हैं, तर्क में भी उतने ही और उसी प्रकार के तर्काभास-विभाग जानने चाहिए । तस्मात् आश्रयासिद्धि, मूलशैथिल्य, इष्टापादन ये तीनों तर्कदोष असिद्धिरूप एक ही दोष के अन्तर्गत है, जैसा कि अनुमान में होता है । दोनों में अन्तर इतना ही है कि वह असिद्धि 'अप्रमितत्व' का अवलम्बन करती है, तो तर्क में 'अभ्युपगम' मात्र का । इसी तरह मिथोविरोध सत्प्रतिपक्ष ही है । फिर, विपर्ययापर्यवसान तो तर्क का दोष ही नहीं है । जो आपादन, विपर्यय में पर्यवसान न होने से, आत्मसाधन के अनुकूल नहीं होते वे और ही कुछ दोष हैं । अर्थात् जहां पर-पक्ष में दोषमात्र देना हो वहाँ विपर्ययापर्यवसित तर्क का भी उपयोग होने से विपर्ययापर्यवसान को तर्काभास तो मान ही नहीं सकते । फिर जहां स्वपक्ष-साधनार्थ विपर्ययापर्यवसित तर्क का उपन्यास नहीं होता, वहाँ उसका कारण कुछ और ही दोष हैं, कथित तर्काभास नहीं ।
५७८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ बाधविरुद्धत्वव्यभिचारास्तु अनुमानवत् तर्केऽपि दोषाः पृथग्वाच्याः । बाध उत्सर्गसम्भावनादेरन्यत्रानुकूलः । तर्कस्य सप्तममपि दोषं तर्कस्याऽऽपत्तिसाम्यं न नामोपगच्छामः , स चोभा- भ्यामभ्युपगतव्याप्येनानभ्युपगतव्यापकेन प्रागेव दर्शित इत्यास्तां विस्तर इति । सर्वखण्डन-प्रकारोपदेशः एवं प्रकाराणि तत्तल्लक्षणेषु खण्डनान्यूहनीयानि । तदेतासु खण्डनयुक्तिषु कामपि स्थानान्तरस्थां केनापि प्रकारान्तरेणाऽऽनीय तत्सदृशीमन्यादृशीं वा स्वयमूहयित्वा परैर्विविच्यमानानि पदार्थान्तराण्यपि बुद्धिमता बाधनीयानि । अत्र चास्माभिर्दूषयितुं शङ्कितेभ्यः परपक्षप्रकारेभ्यो यदि प्रकारान्तरं कोऽपि स्वयमूहति, उक्तानां बाधकानां मध्ये क्वचित्प्रज्ञयाऽपि समाधानमभिद- इतना ही नहीं बाध, विरोध और व्यभिचार अनुमान की तरह तर्क में भी पृथक् ही दोष हैं । उत्सर्ग तथा सम्भावनारूप तर्क से भी अन्य तर्कों में बाध अनुकूल है, अर्थात् आभासत्व का प्रयोजक नहीं है । कुछ लोग तर्क में 'आपत्तिसाम्य'रूप सप्तम दोष भी मानते हैं। यह आपत्तिसाम्य वहाँ होता है, जहाँ दोनों पक्षों ने व्याप्य का स्वीकार किया हो और व्यापक का स्वीकार न किया हो । किन्तु इस दोष को 'यदि सत्ता सद्द्व्यवहारविषय हो, तो सत्तावती हो जायगी' इस स्थल में तर्क-खण्डन के प्रस्ताव में 'यत्रोभयोः समो दोषः' इत्यादि से हम पहले ही दिखा चुके हैं, अतः विस्तार व्यर्थ है । सर्व-खण्डन-प्रकार का उपदेश हमने विस्तार-भय से जिन लक्षणों का खण्डन नहीं किया है, उन लक्षणों में भी अस्मदुक्त खण्डन के सदृश खण्डनों की स्वयं ऊहा कर या इन्हीं खण्डन-युक्तियों के बीच अन्य स्थानस्थित किसी खण्डनयुक्ति का किसी प्रकार आनयन कर या तत्सदृश युक्तियों की ऊहा कर वादी द्वारा विवेचित अन्यान्य पदार्थों के लक्षणों का भी बुद्धि- मान् खण्डन करें । इस ग्रंथ में हमने जिन लक्षणों का खण्डन किया है, यदि वादी उनके तुल्य अन्य लक्षणों की ऊहा करे या उक्त बाधकों के बीच अपनी प्रज्ञा के बल किसीका समा- धान भी कर दे और खण्डनवादी को प्रस्तुत समाधान की स्फूर्ति न हो, तो वादी द्वारा
परिच्छेद ] सर्वखण्डन-प्रकार का उपदेश ५७६ ध्यात् । तत्र खण्डनवादिनः प्रस्तुता प्रतिक्रिया न स्फुरेत् , तदाऽपरेण प्रयुज्यमाने वाक्ये बहुपदात्मके कस्यचित्पदस्यार्थं खण्डनान्तरमवतारणीयम् । एवं तत्रापि परेण प्रज्ञाशोषणे पुनस्तथैव शाखान्तरेषु सङ्क्रमणीयमिति प्रकारेण खण्डनमये चक्रे सम्यगवधेयम् । न च शाखान्तरसङ्क्रान्तावर्थान्तरं पतेत्; अप्रकृतत्वाभावात् । न चैकनि- र्णयारम्भे अन्यसङ्क्रान्तावनौचित्यं स्यात्; 'शब्दोऽनित्यः कृतकत्वादि'त्यादौ परेणोक्ते कृतकत्वादौ विप्रतिपत्तव्यत्वापत्तेरन्यतरासिद्ध्याद्युच्छेदापातात् । येन हि तन्निर्वाह्यते, तदनिर्वचनीयतयाऽपि निर्वाह्याऽनिर्वचनीयतैवेति । तस्मात्— 'तत्तुल्योहस्तदीयं च योजनं विषयान्तरे । शृङ्खला तस्य शेषे च त्रिधा भ्रमति मत्क्रिया ॥' प्रयुक्त बहुपदात्मक वाक्य में किसी पद के अर्थ का खण्डन करने के लिए खण्डनान्तर का अवतरण करना चाहिए । इसी प्रकार यदि वहां भी वादी प्रज्ञा का शोषण ( निष्प्रभ ) कर दे, तो पुनः उक्त प्रकार से अन्य शाखा का अवलम्बन करना चाहिए । अन्य शाखा के अवलम्बन से अर्थान्तर भी नहीं होगा; कारण वह ( अन्य शाखा ) भी प्रस्तुत ही है और 'अप्रस्तुत अन्य अर्थ का अवलम्बन' ही 'अर्थान्तर' होता है । इसी प्रकार एक पदार्थ के निर्णय के आरम्भ में अन्य पदार्थ के संक्रमण से होनेवाला अनौचित्य भी यहां नहीं होगा; कारण अनौचित्य भी अप्रस्तुत अन्य के अवलम्बन में ही होता है । अन्यथा यदि प्रस्तुत विषय में भी अर्थान्तर या अनौचित्य हो, तो शब्द में कृतकत्व से अनित्यत्व-साधन के प्रस्ताव में अर्थान्तर के भय से कृतकत्व में भी विप्रतिपत्ति ( जिज्ञासा ) नहीं होगी । साथ ही अन्यतरासिद्धि-स्थल का भी उच्छेद हो जायगा । कारण अन्यतर के प्रति ' हेतु के असिद्धिस्थल में यदि हेतु की सिद्धि करें तो अर्थान्तर या अनौचित्य हो जायगा । फलतः साध्य के साधन के प्रस्ताव में हेतु का साधन कोई नहीं करेगा । किन्तु वस्तुतः हेतु का निरूपण प्रस्तुत ही है; कारण जिस हेतु से जो निरूपित होता है, उस हेतु के अनिर्वचनीयत्व से साध्य का अनिर्व- चनीय सिद्ध होता है । तस्मात् मदुक्त्युक्ति के तुल्य अन्य युक्तियों की ऊहा, अन्यत्र उक्त मदुक्त युक्तियों का अन्यत्र योजन तथा उन युक्तियों का खण्डन होने पर शृङ्खला-शाखान्तरारोहण—इस प्रकार वाद में मेरी खण्डन-प्रक्रिया तीन प्रकार से चक्कर काटती रहती है ।
५८० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ उपसंहारः ग्रन्थग्रन्थिरिह क्वचित्क्वचिदपि न्यासि प्रयत्नान्मया, प्राज्ञम्मन्यमना हठेन पठिती माऽस्मिन् खलः खेलतु । श्रद्धाराद्धगुरुश्लथीकृतदृढग्रन्थिः समासाद्यत्, त्वेतत्तर्करसोर्मिमज्जनसुखेष्वासञ्जनं सज्जनः ॥ ताम्बूलद्वयमासनं च लभते यः कान्यकुब्जेश्वरात् यः साक्षात्कुरुते समाधिषु परब्रह्मप्रमोदार्णवम् ॥ उपसंहार इस ग्रन्थ में कहीं-कहीं यत्नपूर्वक रचना का काठिन्य हमने इसी प्रयोजन से किया है कि जो प्राज्ञम्मन्य हैं, वस्तुतः प्राज्ञ नहीं हैं तथा हठ से पढ़नेवाले हैं, वे खल- जन इस ग्रन्थ में क्रीड़ा न करें । किन्तु श्रद्धा से आराधित गुरुओं द्वारा जिन्होंने ग्रन्थ-काठिन्य विघटित कर दिया, ऐसे सज्जन विद्वान् ही मदुक्त तर्क की रस-ऊर्मी में मज्जन-सुख से प्रेम का लाभ करें । कान्यकुब्ज देश के महाराज से जिन्हें दो बीड़े पान तथा उच्च आसन प्राप्त होता है, जो समाधि में आनन्द ब्रह्म का साक्षात्कार करते हैं तथा जिनका काव्य मधु- १. शंका हो कि समाधि द्वारा ब्रह्मसाक्षात्कार होने पर तो उस व्यक्ति सारा कर्तव्य ही समाप्त हो जाता है । फिर वह ग्रन्थ-रचना कैसे करेगा ? तो यह ठीक नहीं । समाधि में ब्रह्म का साक्षात्कार करनेवाला भले ही उस समय ग्रन्थ न रच पाये, किन्तु बाद में तो रच ही सकता है । ब्रह्मसाक्षात्कारी कुछ करता ही नहीं, ऐसा भी नहीं कह सकते । कारण जीवन्मुक्त लोग देवता और गुरु का आराधन करते पाये ही जाते हैं । आहार्य भेदज्ञान करके वे जैसा उन कामों को करते हैं, वैसे ही ग्रन्थ-रचना भी करें, तो कोई बाधा नहीं है । इसी तरह यह भी नहीं कहा जा सकता कि ब्रह्मसाक्षात्कार या अद्वैत-भावना के कारण श्रवण, मनन-निदिध्यासन आदि का चतुर्थाश्रमी (संन्यासी) को ही अधिकार है; श्रीहर्ष जैसे गृहस्थ यह नहीं कर सकते । कारण श्रवणादि के बिना गुरु और देवता के प्रसाद से भी मानव को अद्वैत-भावना हो सकती है । इसीलिए 'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः...’, ‘शृण्वन्तोऽपि बहवो यन्न विदुः’ इत्यादि श्रुतियाँ स्वरसतः संगत होती हैं । 'ईश्वरानुग्रहादेव पुंसामद्वैत- वासना' आदि वचन भी स्पष्ट यही कहते हैं । चतुर्थाश्रम का साफल्य तो विशेष रूप से निवृत्ति- प्रियों के लिए ही हो सकता है । अतः उसका भी वैफल्य नहीं होगा ।
परिच्छेद ] उपसंहार ५८१ यत्काव्यं मधुवर्षि धर्षितपरास्तर्केषु यस्योक्तयः श्रीश्रीहर्षकवेः कृतिः कृतिमुदे तस्याऽभ्युदीयादियम् ॥ इति कवितार्किकचक्रवर्त्ति-श्रीश्रीहर्षकृते खण्डनखण्डखाद्ये सङ्कीर्णः तृतीयः परिच्छेदः । वर्षी है तथा तर्कों में जिनकी युक्तियाँ प्रतिवादियों को परास्त कर देती हैं उन श्री श्रीहर्ष कवि का यह ग्रन्थ पण्डितों के आनन्द के लिए प्रकट हुआ है । 'गौरीशङ्कर'-श्रेष्ठिनाऽत्र 'खुरजा'रत्नेन काश्यां मुदा 'जोखीराम'पितामहस्य मटरूमल्ल'स्य तातस्य च । नामालङ्कृतनामसंस्कृतमहाविद्यालयः स्थापितः तत्सेवाधिकृतः तदेककरणः 'चण्डीप्रसादो' द्विजः ॥ १ ॥ क्वाहं कुत्र च खण्डनस्य सुदृढग्रन्थिप्रमोकेच्छया, प्रारम्भो विकटश्रमश्च जननीभाषानुवादस्य मे । यद्यप्येवमथापि पूर्णकृपया श्रीशस्य सङ्ख्यावतां कारुण्यैकधियां विधाय करयोस्खोऽर्प्यते सादरम् ॥ २ ॥ स्वर्गीय श्रीचण्डीप्रसाद सुकुल-रचित खण्डनखण्डखाद्य का भाषानुवाद समाप्त ।
खण्डनखण्डखाद्य की अकाराद्यनुक्रमसहित कारिकाएँ
| संख्या | कारिका | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|
| १. | अथान्यः स विशेषश्चेत् तद्धीत्वं कश्चिदिष्यते ।<br>दत्तः साकारवादाय विष्टरः स्पष्टमेव तत् ॥ | २१४ |
| २. | अथोच्यते य एवार्थो यस्यां संविदि भासते ।<br>तद्वेद्यः स पृथक् नेति वेद्यावेद्यस्य लक्षणम् ॥ | ४६५ |
| ३. | अद्वैतागमनासीरे साधु सा धुन्वती परान् ।<br>सैवमेवार्जयत्यर्थापत्तिपत्तिपरम्परा ॥ | ७६ |
| ४. | अनौचित्याऽपि तर्केण दुर्बाधैवाद्वयश्रुतिः ।<br>अनारोपितमूलत्वाद् बलवत्त्वात्तथादृशा ॥ | ६१ |
| ५. | अन्तर्भावितसत्त्वं चेत् कारणं तदसत्ततः ।<br>नान्तर्भावितसत्त्वं चेत् कारणं तदसत्ततः ॥ | १९ |
| ६. | अन्यथानुपपत्तिश्चेदस्ति वस्तुप्रसाधिका ।<br>पिनष्टि दृष्टवैषम्यं सैव सर्वबलाधिका ॥ | ४२ |
| ७. | अन्योन्याभावसंसर्गाभावभेदव्यवस्थितौ ।<br>सत्यां स्यात्तद्व्यवस्थेति स्वाश्रयं कश्चिकित्सतु ॥ | १३६ |
| ८. | अभीष्टसिद्धावपि खण्डनाना-<br> मखण्डि राज्ञामिव नैवमाज्ञा ।<br>तत्तानि कस्मान्न यथाभिलाषं<br> सैद्धान्तिकेऽप्यध्वनि योजयध्वम् ॥ | ८२ |
| ९. | अभेदं नोल्लिखन्ती धीर्न भेदोल्लेखनक्षमा ।<br>तथा चाऽऽद्ये प्रमा सा स्यान्नान्त्ये स्वोपेक्ष्यवैशसात् ॥ | ६७ |
| १०. | अर्थादुत्स्थास्त्ववो धर्मा नानुमात्वादयो यथा ।<br>नद्वैत्वमपि तद्वत् स्यादित्यर्थोऽनर्थमाविशेत् ॥ | २१५ |
३८३ खण्डनखण्डखाद्य-कारिका संख्या कारिका पृष्ठ-संख्या . ११. अविकल्पकः स्थाणुः पुरुषः श्रुतोऽस्ति यः श्रुतिषु । १ ईश्वरमुमयं परं वन्देऽनुमयाऽपि तमधिगतम् ॥ १२. अविशिष्टास्य वैशिष्ट्ये यदि धीर्विशेत् । ४३५ तद्बुद्धिधारन्तः स्याद्वा मूलाविशिष्टता ॥ १३. असंसर्गाग्रहस् मन्ता शंसत्यबाधिते । ६० अत्यन्तासदसंसंऽहं संसर्गलग्नकम् ॥ १४. आगमेनानुमाने ध्यानात् प्रत्यक्षेण च । २५० त्रेधाऽऽत्मनि' णानां संप्लवः स्वार्थमिष्यते ॥ १५. आद्यधीवेद्यभेदीध्न्यथानुपपन्नता । ५९ स्वज्ञानापेक्षणादन् बाधते नाद्वयश्रुतिम् १६ आपातो ऽदमद्वयवादीनीना- मद्वैतमात्ममर्थतया श्रुतीनाम् । तत् स्वप्रकाशर्थचिदेव भूत्वा ८१ निष्पीडितह ! निर्वहते विचारात् ॥ १७. आशामोदकतृप्ता ये चोपार्जितमोदकाः । २३ रस-वीर्य-विपाकादि ल्यं तेषां प्रसज्यते ॥ १८. ईश्वरानुमहादेषा पुंसामद्वैतवासना । ८१ महाभयकृतत्राणा णिणां यदि जायते ॥ १९. उपपादयितुं स्तैर्मतैरशकनीययोः । २१५ अनिर्वक्तव्यतावाद-पादसेगतिस्तयोः ॥ २०. एकोऽनेकविशेषेऽर्थे विधौ यत्र लक्ष्यते । १६३ तद्विशेषान्तरान्यत्वात् शेषस्तत्रैव धावति ॥ २१. एकं ब्रह्मास्त्रमादाय नान् गणयतः क्वचित् । ६४ आस्ते न धीरवीरस्य श्ङ्गः सङ्गरकेलिषु ॥ २२. एतदेव परामृश्य भर्तृहरिदुदाहृतम् । २४८ लक्षणस्याभिधानं तु केनांशेनोपयुज्यते ॥ २३. कथं सामान्यतो ज्ञाते नैव ज्ञाते विशेषतः । ६४ पह्रोभस्त्वया कर्तुं शक्यः स्यादद्वयश्रुतेः ॥