खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
DevanagariHindipublished610 पृष्ठ
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खण्डनखण्डखाद्य की अकाराद्यनुक्रमसहित कारिकाएँ
| संख्या | कारिका | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|
| १. | अथान्यः स विशेषश्चेत् तद्धीत्वं कश्चिदिष्यते ।<br>दत्तः साकारवादाय विष्टरः स्पष्टमेव तत् ॥ | २१४ |
| २. | अथोच्यते य एवार्थो यस्यां संविदि भासते ।<br>तद्वेद्यः स पृथक् नेति वेद्यावेद्यस्य लक्षणम् ॥ | ४६५ |
| ३. | अद्वैतागमनासीरे साधु सा धुन्वती परान् ।<br>सैवमेवार्जयत्यर्थापत्तिपत्तिपरम्परा ॥ | ७६ |
| ४. | अनौचित्याऽपि तर्केण दुर्बाधैवाद्वयश्रुतिः ।<br>अनारोपितमूलत्वाद् बलवत्त्वात्तथादृशा ॥ | ६१ |
| ५. | अन्तर्भावितसत्त्वं चेत् कारणं तदसत्ततः ।<br>नान्तर्भावितसत्त्वं चेत् कारणं तदसत्ततः ॥ | १९ |
| ६. | अन्यथानुपपत्तिश्चेदस्ति वस्तुप्रसाधिका ।<br>पिनष्टि दृष्टवैषम्यं सैव सर्वबलाधिका ॥ | ४२ |
| ७. | अन्योन्याभावसंसर्गाभावभेदव्यवस्थितौ ।<br>सत्यां स्यात्तद्व्यवस्थेति स्वाश्रयं कश्चिकित्सतु ॥ | १३६ |
| ८. | अभीष्टसिद्धावपि खण्डनाना-<br> मखण्डि राज्ञामिव नैवमाज्ञा ।<br>तत्तानि कस्मान्न यथाभिलाषं<br> सैद्धान्तिकेऽप्यध्वनि योजयध्वम् ॥ | ८२ |
| ९. | अभेदं नोल्लिखन्ती धीर्न भेदोल्लेखनक्षमा ।<br>तथा चाऽऽद्ये प्रमा सा स्यान्नान्त्ये स्वोपेक्ष्यवैशसात् ॥ | ६७ |
| १०. | अर्थादुत्स्थास्त्ववो धर्मा नानुमात्वादयो यथा ।<br>नद्वैत्वमपि तद्वत् स्यादित्यर्थोऽनर्थमाविशेत् ॥ | २१५ |