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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

परिच्छेद ] अप्रसङ्गात्मक तर्क का निरूपण ५७१ वैयात्यम् । यथा—अवस्तुनि विधिनिषेधयोः किमिच्छसीति पृच्छति प्रमाणव्यव- हारिणां सौगते । अत एवात्र अनौचित्यापरनामकं वैयात्यं परस्य दोषं मनसि कृत्वैके ब्रुवते—'अत्र सहृदयानां मूकतैवौचिता' इति । अपरे च—'न ह्यप्रतीते देवदत्तादौ स किं गौरः कृष्णो वेति वैयात्यं विना प्रश्नः स्यादि'ति । यदि च इदमनौचित्यं नाम दोषो नाभ्युपेयते, तदानीमर्थान्तरेण प्रकृतमर्थं निरस्य अर्थान्तरस्यार्थान्तरेण परिहारात् तत्परम्परामालम्बितुकामः केन दोषेण अर्थान्तरपरिहाराभासत्ववादिनी अर्थान्तरेणैव तत्परिहरणमनुचितमित्यतोऽन्येन जीयेत । अर्थान्तरनिग्रहतायां विप्रतिपन्नोऽपि प्रश्नपरम्परामालम्ब्य स्वभङ्गभयात् कथावसानमनिच्छन्तं कथं जयेत ? न चानवस्थया जयतीति वाच्यम् ; यावदुत्तरमर्थान्तरेण परिहरणे प्रश्ना- न्तरेण वा द्वयोरप्यनवस्थासाम्यात् । परन्तु उस असत्त्व को भावरूप या अभावरूप मानते हैं ?' तो वह प्रश्नानौचित्य है । अतएव पर के ऐसे प्रश्न में प्रश्न-वैयात्य नामक दोष मानकर एक आचार्य ने कहा है—'ऐसे प्रश्न पर सहृदय पण्डितों के लिए मौन ही उचित है।' दूसरे आचार्य ने कहा है कि "अज्ञात देवदत्त के विषय में देवदत्त कृष्ण है या गौर ?' यह प्रश्न धृष्टता के सिवा और कुछ नहीं।" यदि अनौचित्य को दोष न मानें, तो प्रतिवादी का किसी भी प्रकार निग्रह न हो सकेगा । देखिये, वादी कहता है—'शब्दोऽनित्यः कृतकत्वात् ।' प्रतिवादी इसका अर्थान्तर से यों परिहार करता है—'शब्द विभु होने से उसे कृतक कहना अज्ञान है।' इस पर वादी कहेगा—'यह परिहार 'अर्थान्तर' होने से उचित नहीं है।' इस पर प्रतिवादी भी चुप न रहेगा और 'फिर वह 'अर्थान्तर ही क्या है ?' इस प्रकार प्रश्नों की परम्परा चलाता ही रहेगा । अर्थात् 'अर्थान्तर' होने से परिहार को 'आभास' कहनेवाले के प्रति 'पुनः अर्थान्तर से ही परिहार अनुचित है' इस प्रकार अनौचित्य के उद्भावन से ही उक्त प्रतिवादी निगृहीत हो सकता है । किञ्च— जो स्वयं अर्थान्तर को निग्रहस्थान नहीं मानते, वे यदि पराजय के भय से प्रश्न- परम्परा का अवलम्बनकर शास्त्रार्थ की समाप्ति ही न चाहें, तो अनौचित्य से अन्य किस निग्रह से आप उन्हें परास्त करेंगे ? तस्मात् अनौचित्य अवश्य मानना चाहिए । प्रश्न—स्वपराजय के भय से प्रश्न-परम्परा का अवलम्बन करनेवाले पुरुष को अनवस्था से ही पराजित कर सकते हैं । उत्तर—अनवस्था ही क्या है, ऐसा प्रश्न होने से प्रश्न और उत्तर दोनों पक्षों में अनवस्था समान है ।

'दोषं व्यक्तिविवेकेऽमुं कविलोकविलोचने । काव्यमीमांसिषु प्राप्तमहिमा महिमाऽऽदृत ॥' ननु कथमत्र प्रामाणिकाव्यवहार्यत्वमिति पृष्टेन यदि मूकत्वमालम्ब्य तथात्वं वादिनि न व्युत्पाद्यते, तदानीमप्रतिभाऽऽपतेत् । अथ तथात्वं व्युत्पाद्यते प्रश्ना- र्थादेः प्रमाणाविषयत्वमुपन्यस्य, तदाऽत्यन्तासद्व्यवहार्यता स्वीकृतैव स्यादिति चेत् । अत्र ब्रूमते--मूकतैवात्र विजयायेति । न चाप्रतिमैवं प्रसज्येत; उत्तरस्या- ऽप्रतिपत्तिरुत्तरार्हस्येति तल्लक्षणात् । यदि चायं नियमो वादिना इष्यते, यद्भ्रान्त्यैन तेन व्यवहर्तव्यमनुवादा- दन्यत्रेति; तदा मध्यस्थोद्भाव्यत्वमस्य दोषस्योपन्यस्यताम् । मध्यस्थेन ह्यपभ्रंशभाषयाऽपि यथा वादिप्रबोधनं क्रियते, तथा यद्यप्रमाणमवलम्ब्यापि क्रियते, तदा को दोषस्तस्य स्यात्, तत्र विषये तथैव तेन वादिबोधनस्य शक्य-

काव्यतत्त्वविवेचक पण्डितों में अत्यन्त समादृत आलंकारिक महिम भट्ट ने कविजनों के नेत्र-तुल्य 'व्यक्तिविवेक' नामक अपने ग्रन्थ में ध्वनिकार प्रभृति आद्य आचार्यों के इस कथन का उल्लेख करते हुए कि 'अनौचित्यादृ ते नान्यद् रसभङ्गस्य कारणम्' (रसभंग का कारण अनौचित्य के सिवा और कुछ भी नहीं है । सभी रसभंजक दोषों में अनौचित्य अनुस्यूत ही रहता है ), इस दोष का आदर किया है । प्रश्न--'अनौचित्य प्रामाणिकों द्वारा अव्यवहार्य कैसे हैं ?' ऐसा प्रश्न होने पर यदि मूकता का अवलम्बन कर वादी के प्रति अनौचित्य की अव्यवहार्यता का प्रतिपादन न किया जाय, तो 'अप्रतिभा' नामक निग्रह होगा । तदर्थ यदि अनौचित्य में प्रमाणा- विषयत्व का प्रतिपादनकर 'अनौचित्य की प्रामाणिक अव्यवहार्यता' का प्रतिपादन किया जाय, तो अत्यन्त असत् वस्तु में भी आपने व्यवहार्यता मान ली, कारण 'अनौचित्यं प्रामाणिकाव्यवहार्यम्, प्रमाणाविषयत्वात्' इस प्रकार शब्द-व्यवहार का विषय वह हो ही गया । उत्तर--अनौचित्य अव्यवहार्य कैसे है, इस प्रश्न में मूकता ही विजय का हेतु है । वहाँ मूकत्व के अवलम्बन में भी अप्रतिभा नहीं होती, कारण 'उत्तर-योग्य प्रश्न की अप्रतिपत्ति' ही अप्रतिभा है, अनौचित्य तो उत्तरार्ह ही नहीं है । यदि वादी इस नियम को स्वीकार करता हो कि 'अनुवाद से अन्यत्र मैं भ्रान्ति से व्यवहार नहीं करूँगा' तो मध्यस्थ को ही वहाँ अनौचित्य का उद्भावन करना चाहिए । मध्यस्थ जैसे अपभ्रंश शब्दों से ( जो कि निरर्थक निग्रहस्थान से निग्रह के

त्वात् । तस्मात् मध्यस्थं प्रत्यनुत्तरदाने स्वदोषपरिहाराय प्रतिवादिनाऽपि वैयात्य- लक्षणदर्शनं कार्यम्, मध्यस्थं प्रति तस्याप्रमाणेनापि प्रतिबोधने निर्दोषत्वात् । ननु वादिभ्यामेव वा, वादिनि मध्यस्थेन वा, तं प्रति वादिना वाऽत्यन्ता- सद्धिषये व्यवहारोपगमे कथं नासत्ख्यातिः स्वीकृता स्यात् ? किं न स्यात् । विशिष्टरूपे सम्बन्धांशे चासत्ख्यातेरन्यथाख्यातिवादिभिरप्यभ्युपगमात् । ननु 'वन्ध्यासुताच्छशविषाणं भिन्नम्'त्यादिषु व्यवहरतः कथं विशेष्ये विशेषणेऽपि नासत्ख्यातिरूपगन्तव्येति चेत् । न ; असत्ख्यात्यभ्युपगमस्य सत्ख्यातित्वात्यागनियमोपगमविश्रान्तत्वात् । असदपि सदुपश्लिष्टमेव प्रतिभासते, न तु केवलमसत् कयाऽपि ख्यात्या समुल्लिख्यते इत्यन्यथाख्यातिवादिभिरिष्य- माणत्वात् । वन्ध्यासुताच्छशविषाणं भिन्नमिति प्रतिपत्राऽपि भिन्नमित्ययमंशः सामान्यतोऽन्यत्र दृष्ट एव प्रतीयते । केवलं भेदस्य सदाश्रयः प्रतियोगी चेति प्रयोजक होते हैं ) वादी का प्रबोधन करता है, वैसे ही अप्रमाण का अवलम्बन करके भी वादी का प्रबोधन करे तो क्या हानि है ? कारण मध्यस्थ वादी के प्रति अनौचित्य का प्रबोधन भ्रान्ति से ही कर सकता है, उसके लिए अभ्रान्तता से व्यवहार्यता का नियम नहीं है । तस्मात् मध्यस्थ के प्रति प्रतिवादी भी उत्तर न देने के अपने दोष ( अप्रतिभा ) के परिहारार्थ अनौचित्य का बोध करा ही सकता है । कारण मध्यस्थ के प्रति अप्रमाण से भी प्रतिबोधन में उसे कोई दोष नहीं है । एवञ्च वादी के नियोग के बिना मध्यस्थ भी उसके अनौचित्य का उद्भावन कैसे करेगा, यह शंका भी नहीं रहती । प्रश्न—अत्यन्त असत् वादी के प्रति वादी के, वादी के प्रति मध्यस्थ के या मध्यस्थ के प्रति वादी के को व्यवहार का विषय मान लेने पर तो असत्ख्याति का स्वीकार हो जायगा । उत्तर—अन्यथाख्यातिवादी विशिष्ट अंश या सम्बन्ध-अंश में जैसे असत्ख्याति मानते हैं, वैसे ही अनौचित्य के विषय में भी असत्ख्याति मानें, तो हानि क्या है ? प्रश्न—'वन्ध्या-सुत से शश-विषाण भिन्न है' इस स्थल में विशेष्य-विशेषण अंश में भी असत्ख्याति क्यों न मानी जाय ? उत्तर—असत्ख्याति के अस्वीकार का अर्थ है, सत्ख्याति का अत्याग । सर्वथा असत्ख्याति को न मानना उसका अर्थ नहीं है, कारण असत् भी सत् से उपश्लिष्ट ही भासता है, केवल असत् किसी ख्याति से नहीं भासता । यही तो अन्यथाख्यातिवादी भी मानते हैं । 'वन्ध्या-सुत से

५७४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ यद्वस्तुतः तदसदाश्रयः प्रतियोगी च तस्येत्यन्यथा कृत्वा प्रतीयत इत्यन्यथा- ख्यातिरेवोपगता भवति । यथा तु विशिष्टमत्यन्तासदेव तथाऽऽश्रयप्रतियोगिनी अत्यन्तासती एव किं न प्रतिभासेते ? तावताऽपि यथोक्तान्यथाख्यात्यनुलङ्घनादेव । न चैवमसत्ख्यातिवादिनाऽपि शक्यं वक्तुम् ; केवलं सदेव प्रकाशत इत्य- स्मात्पक्षाद्विपरीतं विशिष्टं सम्बन्धश्च क्वचिद्विशेषणाद्यपि अत्यन्तासद् भ्रान्त्योल्लि- ख्यत इत्येवंरूपा तावदसत्ख्यातिः परेणोपगतैव । यदि तु सदपि प्रकाशते किञ्चित्, तत्किं नासत्प्रकाशत इति । यतः परेण विकल्पः सर्वथा वस्त्वनुल्लेखी केवलमलीकमुल्लिखन् असत्ख्यात्यात्मा स्वीक्रियते । यदि तु यथोक्तमेव परोऽप्यभ्युपगच्छति; तदानीमनुमानप्रमाणादिवत् अत्राप्यविप्रतिपत्तिरेवेति । शशविषाण भिन्न है' इस स्थल में भी सामान्यतः अन्यत्र दृष्ट ही भेद प्रतीति का विषय होता है । अन्तर केवल यह है कि अन्यत्र भेद का सत् आश्रय और प्रतियोगी भासता है और प्रकृत में अन्यथा रूप से भेद का असत् प्रतियोगी और असत् आश्रय भासता है । फिर यहाँ भी अन्यथाख्याति ही क्यों न मानी जायगी ? जैसे विशिष्ट अत्यन्त असत् ही भासता है, वैसे ही उक्त प्रतीति में आश्रय आश्रय और प्रतियोगी अत्यन्त असत् ही भासते हैं, ऐसा मानने पर भी अन्यथाख्याति का उल्लंघन नहीं है । प्रश्न—असत्ख्यातिवादी भी कह सकता है कि "जैसे 'केवल सत् ही भासता है' इस पक्ष से विपरीत विशिष्ट, सम्बन्ध और कहीं-कहीं विशेषण भी अत्यन्त असत् ही भासते हैं, ऐसी असत्ख्याति को अन्यथाख्यातिवादी मानते हैं, वैसे ही असत् भी 'सत् से उपश्लिष्ट ही भासता है, केवल नहीं भासता । अतः सर्वज्ञान असत्ख्याति ही है।" उत्तर—बौद्ध सद्वस्तु की अनवगाहिनी केवल उल्लेख करनेवाली विकल्परूप असत्ख्याति मानते हैं और अन्यथाख्यातिवादी सत्-उपश्लिष्ट ही असत् भासता है, ऐसा मानते हैं । दोनों मतों में यह महान् भेद है । यदि कहें कि 'बौद्ध भी सत् से उपश्लिष्ट ही असत् के भान को असत्ख्याति मान लेंगे। अर्थात् जैसे किञ्चित् सत् के भासने पर भी वे अन्यथाख्याति मान लेते हैं, वैसे ही किञ्चित् असत्के भासने पर असत्ख्याति भी क्यों न मानी जाय ?', तो यह भी ठीक नहीं। कारण अनुमान के प्रामाण्य के तुल्य उक्तस्वरूप असत्ख्याति मानने में हमें तो कोई विप्रतिपत्ति नहीं होगी, किन्तु आप बौद्धों के लिए यह अपसिद्धान्त हो जायगा ।

परिच्छेद ] अप्रसंगात्मक तर्क का निरूपण ५७५ ननु सर्वथैवासत्ख्यातिरपि भवताऽनुमन्तव्यैव । तथाहि-'वन्ध्यासुत-शशविषाणे कूर्मरोमैवे'ति वदतः शब्दादर्थं प्रतिपादयतां किं तदणुमात्रमपि समुल्लेख्यं तत्प्र- तीतेरिति चेन्न । तत्रापि तादात्म्यस्य सामान्यतोऽन्यत्र प्रतीतस्यैव असदुपहितस्य स्फुरणोपगमात् । प्रकारभेदवैशिष्ट्येन भिन्नयोरेकत्वं हि तादात्म्यम्, तच्चाऽन्य- त्रास्त्येव । तर्कसंशयाभ्यामप्रमाभ्यां जननेऽपि तत्तत्प्रमावत् मध्यस्थाद्यप्रमया तथा प्रश्नानौचित्यादिप्रमोत्पादनाविरोधः । बाधवद्भ्रमविषयातथाभावेऽपि भ्रमस्या- अप्रमात्वपारमार्थिकतावत् प्रश्नविषयासत्यत्वेऽपि प्रश्नानौचित्यसत्यतोपपत्तिरेव । एतेन भ्रान्तिजाया धियः प्रमात्वं तथाप्यदृष्टचरमित्यपि परास्तप्रायमिति । एवमन्यत्राप्येवंविधोदाहरणे वाच्यम् । प्रश्न—आपको सर्वथा असत्ख्याति भी अवश्य माननी होगी। देखिये—'वन्ध्या- सुत और शशविषाण कूर्मरोम ही हैं' इस शब्द का क्या अणुमात्र भी अर्थ है, जो उक्त प्रतीति का विषय हो ? उत्तर—सामान्यरूप से अन्यत्र प्रतीत ही असत् से उपहित तादात्म्य इस प्रतीति का विषय होता है। कारण प्रकार-भेद से विशिष्ट विभिन्न अर्थों का ऐक्य 'तादात्म्य' पदार्थ है और वह अन्यत्र सत् ही है। किंच—तर्क तथा संशय स्वयं तो अप्रमाण हैं, फिर भी जैसे उनसे प्रमात्मक अनुमिति होती है, वैसे ही मध्यस्थ के अनौचित्यरूप विषय को विषय करनेवाली अप्रमा से भी प्रश्नानौचित्यविषयक प्रमा उत्पन्न हो ही सकती है। अथवा बाधित भ्रम का विषय भी असत् ही होता है, फिर भी उक्त भ्रम अपने में अप्रमात्व की पारमार्थिकता ( प्रमा ) का जनक होता ही है। इसी तरह 'शशशृङ्गमृजु वक्रं वा ?' इस प्रश्न का विषय असत् होने पर भी प्रश्नानौचित्य में सत्यत्व का अवगाहन करनेवाली प्रमा हो ही सकता है। इसीसे 'भ्रान्ति से जायमान बुद्धि में प्रमात्व कहीं नहीं देखा गया है' यह कथन भी खंडितप्राय है। कारण पीछे अनेक उदाहरणों द्वारा यह सिद्ध कर दिखाया जा चुका है कि भ्रान्तिज बुद्धि से भी प्रमा होती है। इसी प्रकार वन्ध्यासुत, गगनारविन्द, कूर्मरोम आदि असत्ख्यातियों में सत् से उपश्लिष्ट ही असत् का भान मानना चाहिए।

५७६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ न च कश्चिदुक्तप्रकारमन्यथाख्यातिसमाधानं नानुमन्तुं शक्नोति । अन्यथा कथमसत्ख्यातिवादिनो मतमपि जानीयात्, अज्ञात्वा च स्वपरमत- वैचित्र्यं वादे प्रवर्तेत । एते सर्वेऽपि तर्काः प्रमाणविरोधे वा प्रमाणाभावे वा निष्पीडिताः प्रविशन्तो न बाधासिद्धिभ्यां भिद्यन्ते । पूर्वैरपि लोकसिद्धत्वात् व्यवहृताः । केवलमस्माभिरेव तर्कपदव्यामभिषिक्ताः, ततो न प्रबन्धेन निरस्यन्ते - 'विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं च्छेत्तुमसाम्प्रतम्' इति । तर्काभास-खण्डनम् ये च परैस्तर्कदोषाः षट् स्वीक्रियन्ते—आश्रयासिद्धिः, अनुकूलत्वम्, मूलशैथि- ल्यम्, इष्टापादनम्, विपर्ययापर्यवसानम्, मिथोविरोधश्चेति; सोऽयं तर्कस्य दोषविभागो 'असत् भी सत् से उपश्लिष्ट ही भासता है, केवल असत् नहीं भासता और यही अन्यथाख्याति है'— कोई भी अन्यथाख्यातिवादी इस प्रकार उक्त अन्यथाख्याति के निर्वाह का अस्वीकार नहीं कर सकता । यदि अस्वीकार करे, तो असत्ख्यातिवादी के मत को कैसे जानेगा ? कारण वह असत् का भान तो मानता नहीं । मेरे कथन के अनुसार तो सत् जो ख्याति, उससे उपश्लिष्ट असत् का भान होता है, अतः असत्- ख्यातिवादी का मत जानने में उसे कोई बाधक नहीं है । स्व और परमत का वैलक्षण्य बिना जाने कोई भी पुरुष वाद में प्रवृत्त ही कैसे हो सकेगा ? विचार करने पर यदि अविनिगम आदि चार तर्क प्रमाण के विरोधरूप हों, तो बाध में और यदि प्रमाण के अभावरूप हों, तो असिद्धि में अन्तर्भूत हो जाते हैं, इनसे पृथक् नहीं हैं। पूर्वाचार्यों ने भी इन तर्कों को लोकसिद्ध माना है। मैंने ही केवल इन्हें तर्क-पदवी पर आरूढ़ किया है। इसीलिए हम अतियत्न से इनका खण्डन नहीं करते। कारण विष का वृक्ष भी स्वयं बढ़ाकर स्वयं छेदन के अयोग्य होता है, ऐसा वृद्धजन कहते हैं। अर्थात् बाध और असिद्धि से पृथक् पूर्वोक्त अविनिगम आदि तर्कों की सत्ता ही नहीं है और उन दोनों का खण्डन हो ही चुका है। अतः इनका खण्डन व्यर्थ है, यह भाव है। तर्काभासों का खण्डन आश्रयासिद्धि, अनुकूलत्व, मूलशैथिल्य, इष्टापादन, विपर्ययापर्यवसान और मिथो- विरोध तर्क के ये पांच अन्य दोष भी आचार्यों ने माने हैं। यह दोषविभाग भी ठीक

अप्रसंगात्मक तर्क का निरूपण ५७७

नोपपद्यते । व्याप्तिपक्षधर्मतयोः प्रतीतिमपेक्ष्य यथाऽनुमानं जायते तथैव तर्कोऽपि । इयान् परमनयोर्विशेषो यदनुमानं तयोः प्रमित्या जायते, तर्कस्त्व- वास्तवाभ्यामपि ताभ्यां पराभ्युपगममात्रसिद्धाभ्यां भवति । तेन विमृष्यमाणः तर्कः पराभ्युपगममात्रप्रसादसिद्धपरिकरो नाऽऽश्रयासिद्धिमपि तावद्वास्तवीमनु- रोद्धुमधिकरोति । ततः प्रमित्यभ्युपगमसिद्धिकृतवैचित्र्याश्रयाङ्गे'दादन्यो यावान् यथा च हेत्वाभासविभागः, तद्वदेव च तर्काभासविभागोऽपि न्याय्यः । तस्मादाश्रयासिद्धिमूलशैथिल्येष्टापादनानि असिद्धिरेकैव दोषोऽनुमानवत् । तत्र अप्रमितत्वावलम्बिनी, इह त्वनभ्युपगमावलम्बिनीति विशेषः । मिथोविरोधश्च सत्प्रतिपक्षतैव । विपर्ययापर्यवसानं तु दोष एवाऽऽपादनस्य न भवति । यन्नाम विपर्ययापर्यवसानादापादनमात्मसाधनानुकूलं न भवति, तदन्यदेव किमपि । नहीं है । कारण व्याप्तिपक्षधर्मता की प्रतीति के बल पर जैसे अनुमिति होती है, वैसे ही तर्क भी होता है । किन्तु दोनों में भेद यह है कि अनुमिति तो 'व्याप्ति-पक्षधर्मता की प्रमिति' के बल पर से होती है और तर्क अवास्तव, किन्तु 'पर के अभ्युपगम- मात्र से सिद्ध व्याप्ति-पक्षधर्मता' से भी होता है । इस प्रकार विचारने पर तर्क पर के अभ्युपगममात्ररूप प्रसाद से सिद्ध सामग्रीवाला है । अतः वह वास्तविक आश्रयासिद्धि को भी रोक नहीं सकता । तस्मात् प्रमिति और अभ्युपगम की सिद्धि के वैचित्र्य- मूलक भेदों को छोड़ जितने और जिस प्रकार के हेत्वाभास के विभाग अनुमान में होते हैं, तर्क में भी उतने ही और उसी प्रकार के तर्काभास-विभाग जानने चाहिए । तस्मात् आश्रयासिद्धि, मूलशैथिल्य, इष्टापादन ये तीनों तर्कदोष असिद्धिरूप एक ही दोष के अन्तर्गत है, जैसा कि अनुमान में होता है । दोनों में अन्तर इतना ही है कि वह असिद्धि 'अप्रमितत्व' का अवलम्बन करती है, तो तर्क में 'अभ्युपगम' मात्र का । इसी तरह मिथोविरोध सत्प्रतिपक्ष ही है । फिर, विपर्ययापर्यवसान तो तर्क का दोष ही नहीं है । जो आपादन, विपर्यय में पर्यवसान न होने से, आत्मसाधन के अनुकूल नहीं होते वे और ही कुछ दोष हैं । अर्थात् जहां पर-पक्ष में दोषमात्र देना हो वहाँ विपर्ययापर्यवसित तर्क का भी उपयोग होने से विपर्ययापर्यवसान को तर्काभास तो मान ही नहीं सकते । फिर जहां स्वपक्ष-साधनार्थ विपर्ययापर्यवसित तर्क का उपन्यास नहीं होता, वहाँ उसका कारण कुछ और ही दोष हैं, कथित तर्काभास नहीं ।

५७८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ बाधविरुद्धत्वव्यभिचारास्तु अनुमानवत् तर्केऽपि दोषाः पृथग्वाच्याः । बाध उत्सर्गसम्भावनादेरन्यत्रानुकूलः । तर्कस्य सप्तममपि दोषं तर्कस्याऽऽपत्तिसाम्यं न नामोपगच्छामः , स चोभा- भ्यामभ्युपगतव्याप्येनानभ्युपगतव्यापकेन प्रागेव दर्शित इत्यास्तां विस्तर इति । सर्वखण्डन-प्रकारोपदेशः एवं प्रकाराणि तत्तल्लक्षणेषु खण्डनान्यूहनीयानि । तदेतासु खण्डनयुक्तिषु कामपि स्थानान्तरस्थां केनापि प्रकारान्तरेणाऽऽनीय तत्सदृशीमन्यादृशीं वा स्वयमूहयित्वा परैर्विविच्यमानानि पदार्थान्तराण्यपि बुद्धिमता बाधनीयानि । अत्र चास्माभिर्दूषयितुं शङ्कितेभ्यः परपक्षप्रकारेभ्यो यदि प्रकारान्तरं कोऽपि स्वयमूहति, उक्तानां बाधकानां मध्ये क्वचित्प्रज्ञयाऽपि समाधानमभिद- इतना ही नहीं बाध, विरोध और व्यभिचार अनुमान की तरह तर्क में भी पृथक् ही दोष हैं । उत्सर्ग तथा सम्भावनारूप तर्क से भी अन्य तर्कों में बाध अनुकूल है, अर्थात् आभासत्व का प्रयोजक नहीं है । कुछ लोग तर्क में 'आपत्तिसाम्य'रूप सप्तम दोष भी मानते हैं। यह आपत्तिसाम्य वहाँ होता है, जहाँ दोनों पक्षों ने व्याप्य का स्वीकार किया हो और व्यापक का स्वीकार न किया हो । किन्तु इस दोष को 'यदि सत्ता सद्द्व्यवहारविषय हो, तो सत्तावती हो जायगी' इस स्थल में तर्क-खण्डन के प्रस्ताव में 'यत्रोभयोः समो दोषः' इत्यादि से हम पहले ही दिखा चुके हैं, अतः विस्तार व्यर्थ है । सर्व-खण्डन-प्रकार का उपदेश हमने विस्तार-भय से जिन लक्षणों का खण्डन नहीं किया है, उन लक्षणों में भी अस्मदुक्त खण्डन के सदृश खण्डनों की स्वयं ऊहा कर या इन्हीं खण्डन-युक्तियों के बीच अन्य स्थानस्थित किसी खण्डनयुक्ति का किसी प्रकार आनयन कर या तत्सदृश युक्तियों की ऊहा कर वादी द्वारा विवेचित अन्यान्य पदार्थों के लक्षणों का भी बुद्धि- मान् खण्डन करें । इस ग्रंथ में हमने जिन लक्षणों का खण्डन किया है, यदि वादी उनके तुल्य अन्य लक्षणों की ऊहा करे या उक्त बाधकों के बीच अपनी प्रज्ञा के बल किसीका समा- धान भी कर दे और खण्डनवादी को प्रस्तुत समाधान की स्फूर्ति न हो, तो वादी द्वारा

परिच्छेद ] सर्वखण्डन-प्रकार का उपदेश ५७६ ध्यात् । तत्र खण्डनवादिनः प्रस्तुता प्रतिक्रिया न स्फुरेत् , तदाऽपरेण प्रयुज्यमाने वाक्ये बहुपदात्मके कस्यचित्पदस्यार्थं खण्डनान्तरमवतारणीयम् । एवं तत्रापि परेण प्रज्ञाशोषणे पुनस्तथैव शाखान्तरेषु सङ्क्रमणीयमिति प्रकारेण खण्डनमये चक्रे सम्यगवधेयम् । न च शाखान्तरसङ्क्रान्तावर्थान्तरं पतेत्; अप्रकृतत्वाभावात् । न चैकनि- र्णयारम्भे अन्यसङ्क्रान्तावनौचित्यं स्यात्; 'शब्दोऽनित्यः कृतकत्वादि'त्यादौ परेणोक्ते कृतकत्वादौ विप्रतिपत्तव्यत्वापत्तेरन्यतरासिद्ध्याद्युच्छेदापातात् । येन हि तन्निर्वाह्यते, तदनिर्वचनीयतयाऽपि निर्वाह्याऽनिर्वचनीयतैवेति । तस्मात्— 'तत्तुल्योहस्तदीयं च योजनं विषयान्तरे । शृङ्खला तस्य शेषे च त्रिधा भ्रमति मत्क्रिया ॥' प्रयुक्त बहुपदात्मक वाक्य में किसी पद के अर्थ का खण्डन करने के लिए खण्डनान्तर का अवतरण करना चाहिए । इसी प्रकार यदि वहां भी वादी प्रज्ञा का शोषण ( निष्प्रभ ) कर दे, तो पुनः उक्त प्रकार से अन्य शाखा का अवलम्बन करना चाहिए । अन्य शाखा के अवलम्बन से अर्थान्तर भी नहीं होगा; कारण वह ( अन्य शाखा ) भी प्रस्तुत ही है और 'अप्रस्तुत अन्य अर्थ का अवलम्बन' ही 'अर्थान्तर' होता है । इसी प्रकार एक पदार्थ के निर्णय के आरम्भ में अन्य पदार्थ के संक्रमण से होनेवाला अनौचित्य भी यहां नहीं होगा; कारण अनौचित्य भी अप्रस्तुत अन्य के अवलम्बन में ही होता है । अन्यथा यदि प्रस्तुत विषय में भी अर्थान्तर या अनौचित्य हो, तो शब्द में कृतकत्व से अनित्यत्व-साधन के प्रस्ताव में अर्थान्तर के भय से कृतकत्व में भी विप्रतिपत्ति ( जिज्ञासा ) नहीं होगी । साथ ही अन्यतरासिद्धि-स्थल का भी उच्छेद हो जायगा । कारण अन्यतर के प्रति ' हेतु के असिद्धिस्थल में यदि हेतु की सिद्धि करें तो अर्थान्तर या अनौचित्य हो जायगा । फलतः साध्य के साधन के प्रस्ताव में हेतु का साधन कोई नहीं करेगा । किन्तु वस्तुतः हेतु का निरूपण प्रस्तुत ही है; कारण जिस हेतु से जो निरूपित होता है, उस हेतु के अनिर्वचनीयत्व से साध्य का अनिर्व- चनीय सिद्ध होता है । तस्मात् मदुक्त्युक्ति के तुल्य अन्य युक्तियों की ऊहा, अन्यत्र उक्त मदुक्त युक्तियों का अन्यत्र योजन तथा उन युक्तियों का खण्डन होने पर शृङ्खला-शाखान्तरारोहण—इस प्रकार वाद में मेरी खण्डन-प्रक्रिया तीन प्रकार से चक्कर काटती रहती है ।

५८० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ उपसंहारः ग्रन्थग्रन्थिरिह क्वचित्क्वचिदपि न्यासि प्रयत्नान्मया, प्राज्ञम्मन्यमना हठेन पठिती माऽस्मिन् खलः खेलतु । श्रद्धाराद्धगुरुश्लथीकृतदृढग्रन्थिः समासाद्यत्, त्वेतत्तर्करसोर्मिमज्जनसुखेष्वासञ्जनं सज्जनः ॥ ताम्बूलद्वयमासनं च लभते यः कान्यकुब्जेश्वरात् यः साक्षात्कुरुते समाधिषु परब्रह्मप्रमोदार्णवम् ॥ उपसंहार इस ग्रन्थ में कहीं-कहीं यत्नपूर्वक रचना का काठिन्य हमने इसी प्रयोजन से किया है कि जो प्राज्ञम्मन्य हैं, वस्तुतः प्राज्ञ नहीं हैं तथा हठ से पढ़नेवाले हैं, वे खल- जन इस ग्रन्थ में क्रीड़ा न करें । किन्तु श्रद्धा से आराधित गुरुओं द्वारा जिन्होंने ग्रन्थ-काठिन्य विघटित कर दिया, ऐसे सज्जन विद्वान् ही मदुक्त तर्क की रस-ऊर्मी में मज्जन-सुख से प्रेम का लाभ करें । कान्यकुब्ज देश के महाराज से जिन्हें दो बीड़े पान तथा उच्च आसन प्राप्त होता है, जो समाधि में आनन्द ब्रह्म का साक्षात्कार करते हैं तथा जिनका काव्य मधु- १. शंका हो कि समाधि द्वारा ब्रह्मसाक्षात्कार होने पर तो उस व्यक्ति सारा कर्तव्य ही समाप्त हो जाता है । फिर वह ग्रन्थ-रचना कैसे करेगा ? तो यह ठीक नहीं । समाधि में ब्रह्म का साक्षात्कार करनेवाला भले ही उस समय ग्रन्थ न रच पाये, किन्तु बाद में तो रच ही सकता है । ब्रह्मसाक्षात्कारी कुछ करता ही नहीं, ऐसा भी नहीं कह सकते । कारण जीवन्मुक्त लोग देवता और गुरु का आराधन करते पाये ही जाते हैं । आहार्य भेदज्ञान करके वे जैसा उन कामों को करते हैं, वैसे ही ग्रन्थ-रचना भी करें, तो कोई बाधा नहीं है । इसी तरह यह भी नहीं कहा जा सकता कि ब्रह्मसाक्षात्कार या अद्वैत-भावना के कारण श्रवण, मनन-निदिध्यासन आदि का चतुर्थाश्रमी (संन्यासी) को ही अधिकार है; श्रीहर्ष जैसे गृहस्थ यह नहीं कर सकते । कारण श्रवणादि के बिना गुरु और देवता के प्रसाद से भी मानव को अद्वैत-भावना हो सकती है । इसीलिए 'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः...’, ‘शृण्वन्तोऽपि बहवो यन्न विदुः’ इत्यादि श्रुतियाँ स्वरसतः संगत होती हैं । 'ईश्वरानुग्रहादेव पुंसामद्वैत- वासना' आदि वचन भी स्पष्ट यही कहते हैं । चतुर्थाश्रम का साफल्य तो विशेष रूप से निवृत्ति- प्रियों के लिए ही हो सकता है । अतः उसका भी वैफल्य नहीं होगा ।

परिच्छेद ] उपसंहार ५८१ यत्काव्यं मधुवर्षि धर्षितपरास्तर्केषु यस्योक्तयः श्रीश्रीहर्षकवेः कृतिः कृतिमुदे तस्याऽभ्युदीयादियम् ॥ इति कवितार्किकचक्रवर्त्ति-श्रीश्रीहर्षकृते खण्डनखण्डखाद्ये सङ्कीर्णः तृतीयः परिच्छेदः । वर्षी है तथा तर्कों में जिनकी युक्तियाँ प्रतिवादियों को परास्त कर देती हैं उन श्री श्रीहर्ष कवि का यह ग्रन्थ पण्डितों के आनन्द के लिए प्रकट हुआ है । 'गौरीशङ्कर'-श्रेष्ठिनाऽत्र 'खुरजा'रत्नेन काश्यां मुदा 'जोखीराम'पितामहस्य मटरूमल्ल'स्य तातस्य च । नामालङ्कृतनामसंस्कृतमहाविद्यालयः स्थापितः तत्सेवाधिकृतः तदेककरणः 'चण्डीप्रसादो' द्विजः ॥ १ ॥ क्वाहं कुत्र च खण्डनस्य सुदृढग्रन्थिप्रमोकेच्छया, प्रारम्भो विकटश्रमश्च जननीभाषानुवादस्य मे । यद्यप्येवमथापि पूर्णकृपया श्रीशस्य सङ्ख्यावतां कारुण्यैकधियां विधाय करयोस्खोऽर्प्यते सादरम् ॥ २ ॥ स्वर्गीय श्रीचण्डीप्रसाद सुकुल-रचित खण्डनखण्डखाद्य का भाषानुवाद समाप्त ।

खण्डनखण्डखाद्य की अकाराद्यनुक्रमसहित कारिकाएँ

संख्याकारिकापृष्ठ-संख्या
१.अथान्यः स विशेषश्चेत् तद्धीत्वं कश्चिदिष्यते ।<br>दत्तः साकारवादाय विष्टरः स्पष्टमेव तत् ॥२१४
२.अथोच्यते य एवार्थो यस्यां संविदि भासते ।<br>तद्वेद्यः स पृथक् नेति वेद्यावेद्यस्य लक्षणम् ॥४६५
३.अद्वैतागमनासीरे साधु सा धुन्वती परान् ।<br>सैवमेवार्जयत्यर्थापत्तिपत्तिपरम्परा ॥७६
४.अनौचित्याऽपि तर्केण दुर्बाधैवाद्वयश्रुतिः ।<br>अनारोपितमूलत्वाद् बलवत्त्वात्तथादृशा ॥६१
५.अन्तर्भावितसत्त्वं चेत् कारणं तदसत्ततः ।<br>नान्तर्भावितसत्त्वं चेत् कारणं तदसत्ततः ॥१९
६.अन्यथानुपपत्तिश्चेदस्ति वस्तुप्रसाधिका ।<br>पिनष्टि दृष्टवैषम्यं सैव सर्वबलाधिका ॥४२
७.अन्योन्याभावसंसर्गाभावभेदव्यवस्थितौ ।<br>सत्यां स्यात्तद्व्यवस्थेति स्वाश्रयं कश्चिकित्सतु ॥१३६
८.अभीष्टसिद्धावपि खण्डनाना-<br>    मखण्डि राज्ञामिव नैवमाज्ञा ।<br>तत्तानि कस्मान्न यथाभिलाषं<br>    सैद्धान्तिकेऽप्यध्वनि योजयध्वम् ॥८२
९.अभेदं नोल्लिखन्ती धीर्न भेदोल्लेखनक्षमा ।<br>तथा चाऽऽद्ये प्रमा सा स्यान्नान्त्ये स्वोपेक्ष्यवैशसात् ॥६७
१०.अर्थादुत्स्थास्त्ववो धर्मा नानुमात्वादयो यथा ।<br>नद्वैत्वमपि तद्वत् स्यादित्यर्थोऽनर्थमाविशेत् ॥२१५

३८३ खण्डनखण्डखाद्य-कारिका संख्या कारिका पृष्ठ-संख्या . ११. अविकल्पकः स्थाणुः पुरुषः श्रुतोऽस्ति यः श्रुतिषु । १ ईश्वरमुमयं परं वन्देऽनुमयाऽपि तमधिगतम् ॥ १२. अविशिष्टास्य वैशिष्ट्ये यदि धीर्विशेत् । ४३५ तद्बुद्धिधारन्तः स्याद्वा मूलाविशिष्टता ॥ १३. असंसर्गाग्रहस् मन्ता शंसत्यबाधिते । ६० अत्यन्तासदसंसंऽहं संसर्गलग्नकम् ॥ १४. आगमेनानुमाने ध्यानात् प्रत्यक्षेण च । २५० त्रेधाऽऽत्मनि' णानां संप्लवः स्वार्थमिष्यते ॥ १५. आद्यधीवेद्यभेदीध्न्यथानुपपन्नता । ५९ स्वज्ञानापेक्षणादन् बाधते नाद्वयश्रुतिम् १६ आपातो ऽदमद्वयवादीनीना- मद्वैतमात्ममर्थतया श्रुतीनाम् । तत् स्वप्रकाशर्थचिदेव भूत्वा ८१ निष्पीडितह ! निर्वहते विचारात् ॥ १७. आशामोदकतृप्ता ये चोपार्जितमोदकाः । २३ रस-वीर्य-विपाकादि ल्यं तेषां प्रसज्यते ॥ १८. ईश्वरानुमहादेषा पुंसामद्वैतवासना । ८१ महाभयकृतत्राणा णिणां यदि जायते ॥ १९. उपपादयितुं स्तैर्मतैरशकनीययोः । २१५ अनिर्वक्तव्यतावाद-पादसेगतिस्तयोः ॥ २०. एकोऽनेकविशेषेऽर्थे विधौ यत्र लक्ष्यते । १६३ तद्विशेषान्तरान्यत्वात् शेषस्तत्रैव धावति ॥ २१. एकं ब्रह्मास्त्रमादाय नान् गणयतः क्वचित् । ६४ आस्ते न धीरवीरस्य श्ङ्गः सङ्गरकेलिषु ॥ २२. एतदेव परामृश्य भर्तृहरिदुदाहृतम् । २४८ लक्षणस्याभिधानं तु केनांशेनोपयुज्यते ॥ २३. कथं सामान्यतो ज्ञाते नैव ज्ञाते विशेषतः । ६४ पह्रोभस्त्वया कर्तुं शक्यः स्यादद्वयश्रुतेः ॥

५८४ खण्डनखण्डखाद्य-कारिक · संख्या कारिकाः पृष्ठ-संख्या २४. गुरुधियमभावस्य स्थाने स्थानेऽुक्तवान् । प्रसिद्ध एव लोकेऽस्मिन् बुद्धबन्धुः प्रभाकरः ॥ ४३५ २५. ग्रन्थग्रन्थिरिह क्वचित्क्वचिदपि न्यासि तन्मया, प्राज्ञंम्मन्यमना हठेन पठिती माऽस्मिन् खेलतु । श्रद्धाराद्धगुरुश्लथीकृतदृढग्रन्थिः सादयत् , त्वेतत्तर्करसोर्मिमज्जनसुखेष्व्ासञ्जनं सञ्जनः ॥ ५८० २६. तत्तुल्योहस्तदीयं च योजनं विषयान्तरे । शृङ्खला तस्य शेषे च त्रिधा ति मंतक्रिया ॥ ५७९ २७. तत्सङ्कत्प्रत्यभिज्ञानं यत्ते स्कारबोधकम् । सहकारि तदेवास्ताम्यातिप्रसङ्गनुत् ॥ ११३ २८. तथाहि मिथिलानाथो मुमुक्षेमः पुरा । आहेदं मिथिलादाहे न मे रूञ्चन दह्यते ॥ १८६ २९. तस्मादस्माभिरप्यस्मिन्नर्थे न ग्लु दुष्पठा । त्वद्गाथैवान्यथाकारमक्षराणि कियन्त्यपि ॥ २७१ ३०. ताम्बूलद्वयमासनं च लभते यः कान्कुब्जेश्वरात् , यः साक्षात्कुरुते समाधिषु परब्रह्मप्रमोदार्णवम् । यत्काव्यं मधुवर्षि धर्षितपरास्त्यु यस्योक्तयः, श्रीश्रीहर्षकवेः कृतिः कृतिमुदे त्स्याभ्युदीयादियम् ॥ ५८० ३१. दोषं व्यक्तिविवेकेऽमुं कविलोकविलोचने । काव्यमीमांसिषु प्राप्तमहि महिमाऽऽदृत ॥ ५७२ ३२. धीधनाः ! बाधनायास्यास्तर प्रज्ञां प्रयच्छथ । क्षेप्तुं चिन्तामणि पाणौधमथौ यदीच्छथ ॥ ८१ ३३. नातत्तन्मन्यसे तावन्न तत्तदपि मंस्यते । सामानाधिकरण्यं हि रूपभेदमपेक्ष्यते ॥ १३२ ३४. नात्यापत्त्य प्रमामात्रान्ने तेऽर्थाः स्वीक्रियोचिताः । तद्विप्यस्तदूरीकारे क्वाश्रयं कश्चिकित्सतु ॥ २१४ ३५. नानात्वमवलम्ब्यापि वदत्यद्वैतवादिनि । असिद्धभेदाद् व्याघातः पतेदापादकात् कुतः ॥ ६५

खण्डनखण्डखाद्य-कारिका ३८५ संख्या कारिकाः पृष्ठ-संख्या ३६. पारमार्थिकमद्वैतं प्रविश्य शरणं श्रुतिः । बाधनादुपजीव्येन बिभेति न मनागपि ॥ ८९२ ३७ पूर्वसम्बन्धनियमे हेतुत्वे तुल्य एव नौ । हेतुतत्त्वबहिर्भूत-सत्त्वासत्त्वकथा वृथा ॥ ३८ प्रत्येयव्यस्य वैचित्र्यं प्रत्ययोल्लेखसाधिकम् । धियं निवेश्य लुम्पद्भी भङ्गं साक्ष्येव यच्छति ॥ ४३४ ३९. प्रवृत्तेनाप्यनौचित्यमूलं येन न ल्लूयते । तत्रानौचित्यसाम्राज्यं वैपरीत्यात्तु नात्र तत् ॥ ६१ ४०. प्रश्नस्य यः स्याद्विषयः स वाच्यो वाचा तया चैष भवेन्निरुक्तः । इयं त्वयाऽप्यास्थितमेतयैव गिरा स्वपृच्छाविषयस्य वक्त्रा ॥ ४१ ४१. प्राप्तोपाधिनिगम्यत्वप्रमाणापगमैर्भवेत् । अनवस्थितिमाधातुरचिकित्स्या त्रिदोषता ॥ ७४ ४२. प्राचोत्तरस्य नियमे प्राच एव न तेन किम् । अनाद्यनन्तयोर्नैवं विनिगन्ता प्रवाहयोः ॥ ४४८ ४३. बाधेऽदृष्टेऽन्यसाम्यात् किं दृष्टेऽन्यदपि बाध्यताम् । क्व ममत्वं मुमुक्षूणामनिर्वचनवादिनाम् ॥ १८६ ४४. मानापनोदनविनोदनते गिरीशे भासेव सङ्कुचितयोरुचितं तदिन्दोः । भेत्तुं भवानिशचितं दुरितं भवानि ! नम्रीभवानि घनमङ्घ्रिसरोजयोस्ते ॥ १ ४५. यथाविधं यं विषयं निजस्य प्रश्नस्य निर्वक्ति परो ययोक्त्या । वाच्यस्तथैवोत्तरवादिनाऽपि तथैव वाचा स तथाविधोऽर्थः ॥ ४१६ ४६. रूपान्तरेण निर्दिश्य तच्चेतदभिधीयते । ताद्रूप्येण तथापि स्यात् सैव सव्यभिचारता ॥ १३२

५८६ खण्डनखण्डखाद्य कारिकाः संख्या कारिकाः पृष्ठ-संख्या ४७. वाच्यान्यथोपपत्तिर्वा त्याज्यो वा दृष्टताग्रहः । न ह्येकत्र समावेशश्छायातपवदेतयोः ॥ ४२ ४८. विधिजः प्रत्ययोऽन्योऽयं व्यतिरेकासमर्थनः । नैवं चेदपराद्धं ते किमन्यापोहवादिना ॥ २३९ ४९. व्याघातो यदि शङ्काऽस्ति न चेच्छङ्का ततस्तराम् । व्याघातावधिरशङ्का तर्कः शङ्कावधिः कुतः ॥ २७१ ५०. शब्दार्थनिर्वचनखण्डनया नयन्तः सर्वत्र निर्वचनभावमखर्वगर्वान् । धीरा यथोक्तमपि कीरवदेतदुक्त्वा लोकेषु दिग्विजयकौतुकमातनुध्वम् ॥ २ ५१. समस्तलोकशास्त्रैकमत्यमाश्रित्य नृत्यतोः । का तदस्तु गतिस्तत्तद्बुद्धीव्यवहारयोः ॥ २१५ ५२. सर्वत्र सत्ताऽसत्ता वा नियमेऽन्यानपेक्षया । नियामकाद्धि भावानां क्वाचित्कत्वस्य सम्भवः ॥ २४६ ५३. सुदूरधावनश्रान्ता- बाधबुद्धिपरम्परा । विनिवृत्ताऽद्वयाम्नायैः पाष्णिग्राहैर्विजीयते ॥ ५६ ५४. सोऽपि वा धीविशेषः किं स्वीकार्यस्तद्वियं विना । एवञ्च सोऽपि सोऽपीति नान्तः सोपानधावने ॥ २१५ ५५. हेत्वाद्यभावसार्वज्ञ्ये सर्वं पक्षतयाऽऽस्थिते । किञ्चित्तु त्यजता दत्ता सैव द्वारद्वयश्रुतेः ॥ ५९

खण्डन-खण्ड-खाद्य में उद्धृत वचनों का अनुक्रम

वचनग्रन्थग्रन्थकारपृष्ठ
१. अत्यन्तासत्यपि ह्यर्थेश्लोकवा० (सू० २ का० ६)श्रीकुमारिलं६०, ४२४
२. अधःशब्दनिगद्यं किम्पराशरस्मृतिश्रीपराशर४५४
३. ऋये परप्रयुक्तानाम्श्लोकवा० (सू० ५, का० १४-२५)श्रीकुमारिल२७४
४. अप्रत्यक्षोपलम्भस्यप्रमाणवार्तिकश्रीधर्मकीर्ति३१
५. अयमेव हि भेदो भेदहेतुर्वाप्रमाणवार्तिकाळङ्कारश्रीप्रज्ञाकर गुप्त५३६
६. एकमेवाद्वितीयम्छान्दोग्य-उप० (६।२।१)×४६
७. एकसाध्याविनाभावोश्लोकवा० (बृहट्टीका)श्रीकुमारिल२७४
८. एवं त्रिचतुरजन्मनोंश्लोकवा० (सू०२, का० ६१)"१५.
६. तस्माद्बोधात्मकत्वेनश्लोकवा० (सू०२, का० ५३)"५६८
१०. दुःखजन्मप्रवृत्तिदोष०न्यायसूत्र (१।१।२)श्रीगौतम५६३
११. द्वितीयाद्वै भयं भवतिबृहदा० (१।४।२)×७६
१२. नहि शास्त्राश्रया वादाप्रमाणवार्तिकश्रीधर्मकीर्ति४०७
१३. निश्चितौ हि वादं कुरुतःतात्पर्यटीकाश्रीवाचस्पति३६५
१४. नेह नानाऽस्ति किञ्चनबृहदा० (६।१।२१)×४६
१५. नैषा तर्केण मतिरापनेयाकठोप० (२।६)×८१
१६. परस्परविरोधे हिकुसुमाञ्जलि (३।८)श्रीउदयनाचार्य४४,४२०
१७. प्रमाणवन्त्यदृष्टानितन्त्रवार्तिकं (२।१।५)श्रीकुमारिल४१
१८. प्रमाणमविसंवादिप्रमाणवार्तिक (१।३)श्रीधर्मकीर्ति१६४
१६. प्रत्यक्षावगतेऽपि दहनेतत्त्वोपप्लवसिंहश्रीजयराशिभट्ट२२४
२०. प्रमेया च तुलाप्रामाण्यवन्न्यायसूत्र (२।१।१६)श्रीगौतम३६६
२१. प्राग्दिशो विभक्तिःअष्टाध्यायी (५।३।१)श्रीपाणिनि३००
२२. मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्चन्यायसूत्र (२।१।१२)श्रीगौतम१७५
२३. बुद्ध्या विवेचितानां तुलङ्कावतारसूत्र (सगाथक, १६७)श्रीबुद्धदेव४२
२४. (अत्र ब्रूमो) य एवार्थोप्रकरण-पञ्चिका (३)श्रीशालिकनाथ४६५
२५. यत्रानुकूलतर्को नास्तिकुसुमाञ्जलि (६।७)श्रीउदयन३२७

( २ ) २६. यत्रोभयोः समो दोषः तन्त्रवार्तिक (शून्यवाद) श्रीकुमारिल ३६३,५४४ २७. रिक्तस्य जन्तोर्जातस्य × सौगत ४०७ २८. लक्षणस्याभिधानं तु श्लोकवा० (४।२) श्रीकुमारिल २४८ २६. लब्धरूपं क्वचित्किञ्चित् ब्रह्मसिद्धि (तर्क० २) श्रीमण्डन मिश्र ५३६ ३०. वर्णा (ते) विभक्त्यन्ताः न्यायसूत्र (२।२।५६) श्रीगौतम ३०० ३१. वस्तुनः प्रतियोगिता कुसुमाञ्जलि (३।२) श्रीउदयन ५३६ ३२. विभक्तिश्च अष्टाध्यायी (१।४।१०४) श्रीपाणिनि ३०० ३३. विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य सुभाषित × ५७६ ३४. सप्रयोजनमनुयुक्तो न्यायभाष्य श्रीवात्स्यायन ७ ३५. सम्बद्धं वर्तमानं च श्लोकवा० (४।८४) श्रीकुमारिल २३० ३६. समानमित्यनुत्तर० न्यायवार्तिक (२।१।१६) श्रीउद्योतकर ३६७ ३७. सुप्तिङन्तं पदम् अष्टाध्यायी (१।४।१४) श्रीपाणिनि ३०० ३८. स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य गीता (२।४४) श्रीवेदव्यास ८१