खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] शून्यबाद और स्वप्रकाश-विज्ञानवाद का भेद ४५ वस्तुतस्तु वयं सर्वप्रपञ्चसत्त्वासत्त्वव्यवस्थापनविनिवृत्ताः स्वतःसिद्धे चिदात्मनि ब्रह्मतत्त्वे केवले भरमवलम्ब्य चरितार्थाः सुखमास्महे । ये तु स्वपरिकल्पितसाधनदूषणव्यवस्थया विचारमवतार्य तत्त्वं निर्णेतुमिच्छन्ति, तान् प्रति ब्रूमः—'न साध्वीयं भवतां विचार-व्यवस्था, भवत्कल्पितव्यवस्थयैव व्याहतत्वात् । अत एवास्मदुपन्स्यमानदूषणस्थितिविषयाः पर्यनुयोगा निरवकाशाः, त्वदूप्यव्यवस्थयैव त्वदूष्यव्यवस्थाया व्याहत्युपन्यासात् । न चोपन्यास एव निर्बन्ध- कारणम् ; १विचारोपन्यासस्य सदसत्त्वोपगमाद्युदासीनैर्विचार्यमित्युपेत्यैव परं विचारप्रवर्तनायाः शक्यत्वमित्यावेदितत्वात् । उत्तर—परपक्षी की व्यवस्था के अनुरोध से इस प्रकार निर्वचनीयत्व ( लक्षण ) का खण्डन करने पर अनिर्वचनीयत्व सिद्ध हो ही जाता है । क्योंकि विधि या निषेध इन दोनों में से एक के खण्डन से अन्य की सिद्धि अर्थात् ही फलित होती है, इसे परपक्षी भी मानते हैं । अतः संसार अनिर्वचनीय है, यह कथन भी दूसरों की रीति से है । वस्तुतः सारे संसार के सत्त्व या असत्त्व के साधन से निवृत्त हम लोग तो स्वतःसिद्ध चिद्रूप केवल ब्रह्मतत्त्व का निश्चय पाकर कृतकृत्य हो सुख से स्थित हैं । किन्तु जो परीक्षक स्वकल्पित साधन और दूषण की व्यवस्था द्वारा कथा आरम्भकर तत्त्व- निर्णय की इच्छा करते हैं, उनसे हम कहते हैं कि 'आपकी यह व्यवस्था ठीक नहीं, क्योंकि आपके द्वारा कल्पित दूषणों से ही वह खण्डित हो जाती है ।' प्रश्न — अव्याप्ति आदि दोषों के लक्षणों में दोष होने से वे अनिर्वचनीय हैं या नहीं ? यदि अनिर्वचनीय हैं, तो उन दोषों से प्रमाण-प्रमेय के लक्षण दूषित कैसे होंगे । यदि अनिर्वचनीय नहीं हैं, तो उन दोषों से ही द्वैत हुआ । उत्तर—हम उन दोषों को भी अनिर्वचनीय ही मानते हैं, अतः द्वैत नहीं है । किन्तु आप उन दोषों को मानते हैं, अत एव आपके मतानुसार ही हम उन दोषों से प्रमाण-प्रमेय के लक्षणों का खण्डन करते हैं । प्रश्न—दोषों और कथा के स्वीकार के बिना दोषों का कथन नहीं हो सकता, क्योंकि कथा में स्वीकृत का ही कथन होता है । इसलिए दोषों का उपन्यास ही उनके स्वीकार का हेतु होगा ? उत्तर--विचार ( कथा ) १ विचारस्येति सुपाठः, विचारोपन्यासस्येति कुपाठः, अनन्वयात् । विचारस्येत्यस्य निर्बन्धेऽन्वयः । निर्बन्धः = स्वीकारः । उपन्यास इत्यस्याग्रे दोषाणामिति शेषः, विचारं विना दोषोपन्यासानुपपत्तेरिति भावः ।