भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] अद्वैत में प्रमाण-विचार ४७ यदि च त्वद्दर्शनरीत्या अभिधीयमानमस्माभिर्बाधं बाधसे, तदा स्वाभ्युपगम- रीतिबाधादभिधायितैव ते स्यात् । अस्माभिर्निर्वाह्यमानस्य त्वया खण्डनयुक्त्यैव बाधेऽस्माकमेव जेतृता, 'खण्डनयुक्तयो बाधिकाः, निर्वाह्यपक्षश्च बाध्यः' इत्यस्या- स्मदुक्तपक्षस्य त्वयैव निर्वाहात् । तस्मात् त्वया निर्वाह्यमस्माभिश्च खण्डनीय- मितीदृश्यामेव परं कथायां त्वन्निर्वाहानिर्वाहे तव जयो नान्यथेति । तदेवं भेदप्रपञ्चोऽनिर्वचनीयः, ब्रह्मैव तु परमार्थसदद्वितीयमिति स्थितम् । अद्वैत-प्रमाण-विचारः ननु अद्वैते किं प्रमाणम् ? प्रश्न एव तावत् अद्वैतमनङ्गीकुर्वतो नोपपद्यते । प्रमाणं यत्राद्वैते पृच्छयते तस्याऽप्रतीतौ कथमेवंभूतः प्रश्नः संगच्छते ? नहि प्रमाण- मात्रं भवता पृच्छयते, किन्नाम विषयविशेषनियतम् । तच्च तदोपपद्यते, यदि तादृशं ते प्रतीतिमारोहेत् । प्रश्नस्य वाग्व्यवहारविशेषत्वात् व्यवहारस्य च स्वजनकज्ञान- यदि तुम्हारे दर्शन की रीति से हमने जो अव्याप्ति आदि दोष दिये हैं, उन- का खण्डन करते हो, तो अपनी रीति का ही खण्डन करते हो । यदि कदाचित् हम अव्याप्ति आदि दोषों का समर्थन करें और आप खण्डनोक्त युक्तियों से उनका खण्डन करें, तब भी हमारी ही विजय होगी । क्योंकि आपने ही हमारे इस पक्ष का साधन किया है कि 'खण्डन में उक्त युक्ति बाधक और निर्वाह्य पक्ष बाध्य है।' आप प्रपञ्च को सत्य मानते हैं, अतः आपको प्रमाण-प्रमेय के लक्षणों का निर्वाह करना चाहिए और हम अनिर्वचनीयवादी हैं, अतः हमें उनका खण्डन करना चाहिए, ऐसी वितण्डा में यदि आप लक्षणों का समर्थन कर सकें, तभी आपकी जय होगी, अन्यथा नहीं । इस तरह आप लक्षणों का स्थापन नहीं कर सकते । अतः भेद-प्रपञ्च अनिर्वचनीय है और अद्वितीय ब्रह्म ही परमार्थ में सत् हैं, यह सिद्ध हुआ । अद्वैत में प्रमाण-विचार प्रश्न—अद्वैत में क्या प्रमाण है ? प्रश्न का खण्डन—जो अद्वैत को स्वीकार नहीं करते, वे 'अद्वैत में क्या प्रमाण है?' ऐसा प्रश्न ही नहीं कर सकते । आप जिस अद्वैत में प्रमाण पूछते हैं, उसके अज्ञात रहने पर ऐसा प्रश्न ही कैसे होगा ? क्योंकि आप केवल प्रमाण तो पूछते नहीं, अद्वैत में प्रमाण पूछते हैं । पर अद्वैत में प्रमाण का प्रश्न तभी हो सकता है, जब आप अद्वैत को जानते हों । क्योंकि प्रश्न वचन-