खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तद्विषय-विषयिप्रवाहमद्वैते स्थापयन्ती न केनापि प्रमाणेन क्वचिदपि विषये बाधितुं शक्या । तस्मात्— सुदूरधावनश्रान्ता बाधबुद्धिपरम्परा । विनिवृत्ताऽद्वयाम्नायैः पाष्णिग्राहैर्विजीयते ॥'—इति । न च यत्र तस्य प्रतिपत्तुर्बुद्धिधाराविश्रान्तिस्तत्र पुरुषान्तरबुद्धिर्भेदे प्रमाणं स्यात् । तथापि पुरुषान्तरेण भिन्नतया सा प्रतीयते इत्यत्र प्रमाणं त्वया वाच्यम् । नहि तदपि पुरुषान्तरेणैव, न च संभाव्यमानम्, श्रौतेन निश्चयेन तन्निवर्तनात्; तथाप्यनवस्थानादिति । सञ्चार (ज्ञान) के 'उच्छेद और अनवस्था के भय से जहाँ जाकर आप अद्वैत-बुद्धि की बाध-बुद्धि-धारा की समाप्ति मानेंगे, 'उसी बुद्धि में श्रुति अवकाश पाकर सम्पूर्ण उस बुद्धि के विषय ज्ञान-प्रवाह को अद्वैत में स्थापन करती हुई किसी प्रमाण से किसी भी विषय में बाधित नहीं हो सकती । अतः दूर दौड़ने से श्रान्त—अतएव विनिवृत्त—बाधपरम्परा पृष्ठ-भावी (पीछे दौड़नेवाले) शत्रु के सदृश अद्वैत-श्रुति से जीती जाती है। दूर दौड़ने से थकी, बाध-बुद्धि की धार । लौटी अद्वय-बोधने, घेर दबाई नार ॥ भेद-समर्थन—विषयान्तर के सञ्चार का उच्छेदन न हो, इसलिए उस पुरुष की बुद्धि-धारा तो समाप्त हो जाती है। परन्तु अन्य पुरुष की बुद्धि से उस चरमबुद्धि (अन्तिम भेद-बुद्धि) के भेद का भी ग्रहण होता है। भेद-खंडन—अन्य पुरुष की बुद्धि से उस चरम बुद्धि के भेद का ज्ञान होता है—इसमें यदि प्रमाण न दे, तो आपका इष्ट भेद सिद्ध नहीं हुआ। यदि कोई बुद्धि प्रमाण दें, तो उसी बुद्धि में अवकाश पाकर अद्वैत-श्रुति भेद-बुद्धि का बाध करेगी। यदि आप प्रमाणों (भेद-ज्ञानों) की धारा मानें, तो अनवस्था हो जायगी। समर्थन—पुरुषान्तर की बुद्धि से भेद का ज्ञान होगा, इसमें भी प्रमाण अन्य पुरुष देगा। खंडन—अद्वैत-श्रुति पुरुषान्तर से प्रदर्शित प्रमाण-बुद्धि में ही अवकाश पाकर सर्वत्र भेद का बाध करेगी अथवा अनवस्था का प्रसंग हो जायगा। समर्थन—'पुरुषान्तर-बुद्धिः भेद प्रमाणं भविष्यति' इस सम्भावना से अद्वैत-बुद्धि का बाध होगा । खण्डन—'यदि वह्निविरहिण्यपि धूमः स्यात् तदा न स्यात् अकारणः सहेतुको वा स्यात्' इस तर्क से 'यदि वह्निविरहिण्यपि धूमः स्यात्'