भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] अद्वैत में प्रमाण-विचार ५७ अथ ब्रूषे—'यदा कियद्दूरं बुद्धिपरम्परया सा बाधिता भवत्यद्वैतश्रुतिस्तदा तन्न्यायाद् याऽपि बुद्धिः शेषं गत्वा नाऽनुव्यवसीयते, तत्रापि तद्बाधोऽवगम्यते; यत्र सा बाध्यते, तत्तुल्यन्यायत्वादन्तिमबुद्धेरपीति । मैवम्; किं कियतीषु बुद्धिषु व्याप्यव्यापकौ कावप्यवलम्ब्य व्याप्तिग्रहरूपयैव धिया शेषबुद्धौ बाधं व्युत्पादयसीत्थमद्वैतश्रुतेः, किं वा बुद्धयन्तरदृष्टव्याप्तिसनाथया पक्षधर्महेतुमुल्लिखन्त्या बुद्ध्याऽन्तिमबुद्धिविषयया ? नाद्यः, व्याप्तिबुद्धिर्यदि विषयविशेषेऽपि स्वातन्त्र्येण बाधात्मिकोपेयते, तदा सैव विशेषबुद्धिरपि स्यादिति गतमनुमानकथा। अथानुमितिमभ्युपैषि, तदा सा नाऽऽत्मानमपि धर्मीकृत्य प्रवर्तते इति तत्रैव दत्तपदा सर्वामद्वैतश्रुतिः परम्परामालम्बते इत्युक्तमावर्तते । इस व्यभिचार की सम्भावना ( शङ्का ) की जैसे निवृत्ति होती है, वैसे ही श्रुतिजन्य बुद्धि ( ज्ञान ) से उक्त सम्भावना का भी बाध होगा। किञ्च, सम्भावित बुद्धि में जो प्रमाण-सम्भावना है, उसी से उसके विषय के साथ अभेद के बोध में अवकाश पाकर अद्वैत-श्रुति सब वस्तुओं के अभेद का ग्रहण करायेगी । यदि उसके भेद में कुछ प्रमाण कहें, तो अनवस्था हो जायगी । प्रश्न—जब कुछ दूर तक प्रत्यक्ष-बुद्धि की परम्परा से वह ( अद्वैत-श्रुति ) बाधित होती है, तब उसी दृष्टान्त से जो बुद्धि ज्ञात नहीं होती, उसमें भी बाध का ज्ञान होगा । क्योंकि अन्तिम बुद्धि भी उसके तुल्य ही है। अर्थात् 'जो-जो बुद्धि है, वह स्व-विषय ( अपने विषय ) से भिन्न है, जैसे घट से पट भिन्न है यह बुद्धि' इस रीति से, ज्ञान-धारा की तीन-चार कक्षाओं में व्याप्ति का निश्चय होगा । पश्चात् उसी के बल से अन्तिम बुद्धि में भी स्व-विषय के साथ भेद की सिद्धि होगी । फिर अद्वैत श्रुति को अवकाश ही कहाँ है ? उत्तर—क्या जो जो बुद्धियाँ हैं, वे स्व-विषय से भिन्न हैं' यह व्याप्तिग्रह ही अन्तिम बुद्धि के ( स्व-विषय के साथ ) भेद-ग्रह में प्रमाण है अथवा व्याप्ति से युक्त— पक्षधर्मताविशिष्ट हेतु का ज्ञान ? यदि व्याप्ति का ज्ञान कहा जाय, तो पृथक् अनुमान को प्रमाण मानना व्यर्थ है । क्योंकि सर्वत्र व्याप्तिग्रह से ही विशेष ( अनुमेय ) का ज्ञान हो जायगा । यदि अनु- मिति कही जाय, तो श्रुति उसी अनुमिति में स्व-विषय के साथ अद्वैत-बोध में अवकाश पाकर सर्वत्र अद्वैत का बोध करायेगी । ८