भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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५८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अथ 'सर्वा विवादाध्यासिता बुद्धयः स्वविषयेभ्यो भिन्नाः, बुद्धित्वात्, घटपट- बुद्धिवत्' इति सामान्याकारेणाऽऽत्मानमपि धर्मीकृत्य आत्मनोऽपि स्वविषयाद्भेदं साधयिष्यत्यनुमेति मन्यसे । मैवम्; एवमपि विषयिणो विषयस्याऽभेदं बोधयन्ती श्रुतिरनुमानमप्यनवकाशयति । विषयिविषययोर्मिथो भेदेऽपि साध्ये अस्तु हेत्वनुयोगः । परबुद्धिस्तद्विषयांश्च प्रति निराबाधा सती श्रुतिरेकस्या बुद्धेर्विषयाद्-परानपरस्याश्च विषयात् परामभेद- बोधाय धावन्ती सर्वाद्धैते एव पर्यवस्यतीति । न च शक्यमनुमातुं सर्वस्या बुद्धेर्विषया सर्वा बुद्धिविंभेति, माभूदन्यबुद्धि- विषयादात्मनोऽपि बुद्धिर्भिनेति । न चाऽऽत्मव्यतिरिक्तादित्युक्ते निस्तारः स्यात्, अद्वैतवादिना सर्वाभेदमिच्छता क्वचिदपि तदसिद्धया विशेषणाप्रसिद्धेरिति । प्रश्न -'सब बुद्धियाँ अपने विषय से भिन्न हैं, बुद्धि होने से, घट-पटविषयक बुद्धि के तुल्य', स्व को भी धाम दल में प्रवेश कर प्रवृत्त इस अनुमिति से, स्व (बुद्धि) में भी स्व-विषय के भेद की सिद्धि होगी । उत्तर—इस अनुमिति सेभी बुद्धि में विषय का भेद सिद्ध हुआ, बुद्धि का भेद विषय में नहीं । ऐसा होने से बुद्धि और विषय। के अभेद-बोध में बाधक न होने से श्रुति अवकाश पाकर सर्वाद्धैत का बोध करा देगी । प्रश्न—'बुद्धिविषयौ परस्परं भिन्नौ' ऐसी अनुमिति क्यों न हो ? उत्तर-इसमें यदि बुद्धित्व को हेतु कहें, तो विषय-भाग में असिद्धि है और यदि विषयत्व को हेतु कहें, तो बुद्धि-अंश में असिद्धि ( पक्ष में हेतु का अभाव ) है । उभय-साधारण प्रमेयत्व हेतु व्यभिचरित है। बुद्धि-विषयान्तरत्व आदि कोई उभयसाधारण हेतु मान भी लें; तथापि पर-बुद्धि और उस बुद्धि के विषय के प्रति बाध से रहित होकर श्रुति ( एक बुद्धि के विषय से अन्य बुद्धि का और अन्य बुद्धि से एक बुद्धि के विषय का अभेद-बोध कराती हुई क्रम से सर्वा- द्वैत का बोध करा देगी । प्रश्न -'सब बुद्धियाँ, सब बुद्धियों के विषय से भिन्न हैं' यह अनुमिति ही भेद में प्रमाण क्यों नहीं ? उत्तर - अन्त्यबुद्धि का विषय उपान्त्य-बुद्धि भी स्व से भिन्न हो जायगी । क्योंकि वह बुद्धि है और अन्त्यबुद्धि का विषय भी हैं।