भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 610 में से

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परिच्छेद ] अद्वैत में प्रमाण-विचार ५६ एतेन ‘सर्वं भिन्नम्’ इति वाक्येन विना बाधं स्वतःप्रमाणेन सत्प्रतिशब्दा सेयमद्वैतश्रुतिरित्त्यप्यनवकाशं प्रत्यवस्थानं मन्तव्यम् । यस्मात् कस्मादपि भेदे मिथ्यातः सत्यभेदोपगमेन सिद्धसाधनात्, सर्वस्मादिति स्वतोऽप्यापत्तेः ; स्वव्यति- रिक्तादिति चाद्वैतवाद्यन्यव्यवच्छेदकम् । तदेवम्— ‘हेत्वाद्यभावसार्द्धैये सर्वं पक्षतयाऽऽस्थिते । किञ्चित्तु त्यजता दत्ता सैव द्वारद्वयश्रुतेः ॥’ अत एव च— ‘आद्यधीवेद्यभेदीयाऽप्यन्यथानुपपन्नता । स्वज्ञानापेक्षणादन्ते बाधते नाद्वयश्रुतिम् ॥’ प्रश्न—‘सब बुद्धियों के आत्म-भिन्न विषयों से सब बुद्धियां भिन्न हैं ऐसा निवेश करने पर कोई दोष नहीं है । उत्तर—आपका यह अनुमान स्वार्थ है या परार्थ ? यदि स्वार्थ कहें, तो स्व ( भेदवादी ) के प्रति भेद सिद्ध ही होने से सिद्ध-साधन होगा । यदि परार्थ कहें, तो पर ( अभेदवादी ) के प्रति आत्म-व्यतिरिक्त पदार्थ का अभाव होने से विशेषण असिद्ध होगा । प्रश्न—बाधक के विना स्वतःप्रमाण ‘सब भिन्न हैं’ इस वाक्य से अद्वैत का बाध क्यों न हो ? उत्तर—यदि इस वाक्यसे ‘जिस किसीसे भी भिन्न ऐसा बोध अभिप्रेत हो, तो मिथ्या से सत्य में भेद सिद्ध ही होने से सिद्धसाधन है । यदि ‘सर्व’ से भिन्न इष्ट हो, तो अपने आत्मा से भी आत्मा भिन्न सिद्ध हो जायगा । यदि ‘आत्म-भिन्न जो ‘सर्व’ उससे भिन्न’ ऐसा कहें, तो वचन परार्थ है और पर अद्वैतवादी के प्रति आत्म-व्यतिरिक्त अप्रसिद्ध होने से विशेषण की असिद्धि है । किञ्च—‘सर्वस्मात् सर्वं भिन्नम्’ इस पूर्वोक्त अनुमिति के प्रतिज्ञावाक्य में ‘सर्व’ को आप पक्ष मानते हैं । अतः पक्ष से भिन्न हेतु, साध्य तथा दृष्टान्त का अभाव हो जायगा । पक्ष प्रमाण-सिद्ध ही होता है, अतः सर्ववस्तुओं को ज्ञात ही मानना होगा । वह सर्वज्ञता के बिना दुर्लभ है । यदि पक्ष में कुछ अंश छोड़ दें, तो उसी स्थल में अवकाश पाकर श्रुति सर्वत्र अद्वैत की स्थापना कर देगी । सर्व-पक्ष यदि होत तब, हेतु निदर्शन नास । सबको हो सर्वज्ञता, छोड़े श्रुति-अवकास ॥ प्रश्न—‘घटपटौ भिन्नौ’ इस बुद्धि का विषय भेद ‘सर्वमभिन्नम’ इत्याकारक

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