भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] अद्वैत में प्रमाण-विचार ६१ अनौचित्याऽपि तर्केण दुर्वाधैवाऽद्वयश्रुतिः । अनारोपितमूलत्वाद् बलवत्त्वादतादृशा ॥ प्रवृत्तेनाप्यनौचित्यमूलं येन न लूयते । तत्राऽनौचित्यसाम्राज्यं वैपरीत्यात्तु नात्र तत् ॥' ननु, यद्यदेवोदाह्रियते त्वया---'नेत इतोऽस्य भेदो गृहीतः इति ततोऽस्याऽद्वैता- म्नायैरभेदबोधने तद्द्वारा सर्वाऽभेदे पर्यवसातव्यमिति, ततस्ततस्तस्य भेदस्तवै असत् अर्थ का बोध भी शब्द से होता आत । पीछे बाध-अभाव से, होत प्रमात्व का नाते ॥ बाधस्थल में जो कहें असम्बन्ध-अज्ञान । वे अबाध-स्थल विषे, करें सम्बन्धहि मान ॥ प्रश्न—सर्वलोकसिद्ध भेद का बाध अनुचित है। फिर अनौचिती रूप तर्क से श्रुति का बाध क्यों न हो ? उत्तर—तर्क आरोपस्वरूप होता है, अतः अनारोपित रूप होने से बलवती श्रुति का उससे बाध नहीं हो सकता । प्रश्न—ऐसा मानने पर अनौचिती रूप तर्क का अवकाश ही कहाँ होगा ? उत्तर—स्वार्थसिद्धि में प्रवृत्त भी बाध्य प्रमाण, जहाँ अनौचित्य की मूलभूता आपाद्य- आपादक-व्याप्ति का खण्डन न कर सकें, उस स्थल में अनौचित्य का साम्राज्य है। प्रकृत में अद्वैत-श्रुति से भेद का बाध तथा व्याप्ति का खण्डन होने से अनौचित्य का साम्राज्य नहीं है। अनौचिती जो तर्क है, वह आरोप-सरूप । अनारोप श्रुति-बोध के, सन्मुख बैठे चूप ॥ जहाँ अनौचित तर्क के, मूल मान बलवान् । वहाँ तू उसद्य खोल हिय, बहुरि करो सन्मान ॥ प्रश्न—'घटपटौ भिन्नौ' इस बुद्धि से घट-पट का तथा अन्तिम बुद्धि का स्व-विषय से भेद किसी प्रमाण से गृहीत नहीं है । अतः श्रुति का घट-पट से 'घटपटौ भिन्नौ' इस बुद्धि के अभेद-बोधन द्वारा सर्वाभेद-बोध में पर्यवसान है—इस प्रकार जिस वस्तु का कथन आप करेंगे, तो उससे उसका भेद उसी काल में गृहीत हो जायगा । इस कारण यदि आप किसी वस्तु का कथन ही न करें, तो स्थल के