खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 77, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ें६२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
गृह्यते मया । तस्मादुदाह्रियमाणायामनुदाह्रियमाणायां च कस्यचिदेतत् प्रत्यवस्थानमस्थाने इति । मैवम् ; अन्तिमबुद्धेरद्वैतश्रुतिजबुद्ध्यादितो भेदो न त्वया प्रमित इति मयोच्यमाने यस्तदीयस्ततो भेदः प्रमातव्यः, स न तावत् प्रत्यक्षेण, तत्कालमन्तिमबुद्धेरनुपस्थितेः । यदि च केनचिद्धेतुना वा कयाचिदनुपपत्त्या वा तथा स्यात्, तदानीमद्वैतवादिनं प्रति हेतोः साध्याविशिष्टतया अनुपपत्तेश्च, येन विना सा तद्विशिष्टतया, ततः कथमाभासात् प्रमोदयः स्यात् । न च वाच्यं स्वयं मया स भेदो ज्ञायते इति नास्ति पाक्षिकोऽपि मां प्रत्यसिद्ध्यादिरिति । यतोऽस्य अभाव में श्रुति का अवकाश नहीं है। यदि किसी वस्तु का कथन करें, तो उसी काल में भेद-ग्राह होने से श्रुति का बाध होगा । उत्तर—अन्तिम बुद्धि का अद्वैत श्रुतिज बुद्धि से जो भेद उसका ज्ञान आपको ज्ञात नहीं है, यह कहने पर उक्त भेद का ज्ञान आपको कैसे होगा ? प्रत्यक्ष से हो नहीं सकता, क्योंकि उस काल में अन्तिमबुद्धि के न होने से सन्निकर्ष नहीं है । प्रश्न—'अन्त्य बुद्धि श्रुतिज बुद्धि से भिन्न है, भिन्नसामग्रीजन्य होने से अथवा भिन्न शब्द-जन्य होने से अथवा जन्म-नाश आदि विरुद्ध धर्मों के होने से; जो-जो भिन्न-सामग्री से जन्य है वह भिन्न है, जैसे घटादि'—इस अनुमान से ही भेद सिद्ध होगा । उत्तर—अद्वैतवादी के मत में भेद के न होने से, भिन्नसामग्रीजन्यत्व आदि हेतु साध्यसम ( असिद्ध ) हैं। अतः आभास-हेतु से भेद की प्रमा का उदय नहीं हो सकता । प्रश्न—'अन्त्यबुद्धि और श्रुतिज बुद्धि में परस्पर भेद के बिना, आपामर-प्रसिद्ध द्वैत (भेद) के ज्ञान की अनुपत्ति है। अतः द्वैत (भेद) के ज्ञान से अन्त्यबुद्धि और श्रुतिज बुद्धि में परस्पर भेद की कल्पना क्यों न हो ? उत्तर—अद्वैत-मत में भेद के न होने से उपपादक द्वैत-ज्ञान ही असिद्ध है । अतः उसके द्वारा अन्त्य बुद्धि से श्रुतिज-बुद्धि के भेद की कल्पना कैसे होगी । किञ्च— अद्वैत-मत में उपपाद्य-उपपादक का भेद भी परमार्थ में नहीं है। और अपारमार्थिक द्वैत १—अस्थाने = अयुक्तमित्यर्थः । अत्र ‘इति मैवमि’त्यपपाठः, अस्थाने इत्यनेन पुनरुक्तेः । मत इति शेषः ।