खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] अद्वैत में प्रमाण-विचार ६३ त्वद्वचनस्य वैयर्थ्यापत्तिः, वचनस्य परार्थत्वात् । मौनमवलम्ब्याप्रतिष्ठमानश्च भवानप्रतिभातो न मुच्यते । न च स्वयं मया प्रमितो भेदः परं प्रति वचसा केवलं बोध्यते इति वाच्यम्; त्वद्वचसि परस्याप्रत्ययात् । विजिगीषुं परं प्रति विजि- गीष्वन्तरवचनं हि तत्रार्थे तज्जिज्ञासोत्पादनद्वारेण तस्य स्वतस्तदर्थप्रमित्युत्पादन- पर्यवसायितयोपयुक्तम् । न चाद्वैतवादिनं प्रति तथा कर्तुं शक्यते, तं प्रत्यन्यतरा- सिद्धेरुक्तत्वात् । न च वाच्यं मम वचनात्संदेहेनापि श्रुत्या तत्र संदिग्धबाधितभावया नाभैद- प्रतिपादनं ते घटते इति, यस्मादद्वैतं मन्यमानेन भेदासिद्ध्या सर्वत्र साध्याविशे- पादिदोषप्रतिसंधायिना संशयस्यानवकाशीकरणमेव स्यात् । ( भेद ) शुक्ति-रजत के तुल्य उपपन्न ही है, अनुपपन्न नहीं । फिर उससे अन्त्य- बुद्धि के श्रुतिज-बुद्धि के साथ भेद की कल्पना कैसे हो ? प्रश्न——यह अनुमान परार्थ नहीं, किन्तु स्वार्थ है और हम द्वैत-वादी हैं, अतः हमारे प्रति असिद्ध नहीं । उत्तर—यदि आपका अनुमान स्वार्थ है, तो पञ्चावयव का प्रयोग व्यर्थ है, क्योंकि शब्द का प्रयोग परार्थ होता है । प्रश्न—अस्तु, हम पञ्चावयव रूप शब्द का प्रयोग नहीं करेंगे ? उत्तर—कथा में यदि आप मौन का अवलम्बन करेंगे, तो अप्रतिभा नामक निग्रहस्थान से नहीं छूटेंगे । प्रश्न—हम भेद का स्वयं अनुमानकर दूसरे के प्रति वचन से केवल बोधमात्र कराते हैं। उत्तर--तुम्हारे वचन में दूसरे को विश्वास ही नहीं होगा । प्रश्न—जैसे वाद में एक विजिगीषु के प्रति अन्य विजिगीषु का वचन आप्तशब्दत्वरूप से प्रमिति का कारण नहीं है, परन्तु उस अर्थ में प्रमाण की जिज्ञासा के उत्पादन द्वारा स्वतः जायमान उस पुरुष के ज्ञान का कारण है; वैसे ही हमारे शब्द भी आपके ज्ञान में कारण होंगे । उत्तर—अद्वैत-मत में भेद के न होने, भेद-घटित हेतु के असिद्ध होने तथा द्वैत-ज्ञानरूप उपपादक के न होने से आपके वचन अनुमान या अर्थापत्ति में अद्वैतवादी की जिज्ञासा का उत्पादन भी नहीं कर सकते । प्रश्न—'सर्वं भिन्नम्' इस मेरे वचन से आपको भेदविषयक संदेह अवश्य होगा । अतः संदिग्ध या बाधितविषयक श्रुति से अभेदविषयक बोध आपको नहीं होना चाहिए ।