खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तस्मात्— एकं ब्रह्मास्त्रमादाय नान्यं गणयतः क्वचित् । आस्ते न धीरवीरस्य भङ्गः सङ्गरकेलिषु ॥' अपि च—प्रतीयते तावदिदं सामान्यतो यन्नाम किञ्चित्परश्चेतसा चिन्त- यन्नस्तीति, किञ्चिद्वा विवक्षुरित्यादि । तत्र परस्य बुद्धिविषयो विवक्षाविषयो वा विशेषतो विनिगमनं विना नैव प्रतीयते । ततोऽन्तिमबुद्ध्यादिभेदो न भवता शक्यप्रमः, परेण तच्चिन्तनादेरपि संभवात् । स्वस्मात्स्वस्य भेदस्याभावात् । ततस्तत्र लब्धपदा कथमद्वैतश्रुतिर्विश्वाभेदे पर्यवस्यन्ती त्वया शक्यबाधा स्यात् । तस्मात्— 'कथं सामान्यतो ज्ञाते नैव ज्ञाते विशेषतः । पदरोधस्त्वया कर्तुं शक्यः स्यादद्वयश्रुतेः ॥' उत्तर—जो अद्वैत को मानते हैं, उनके मत में भेद की असिद्धि होने से भेद का उपस्थापक हेतु (भेद-घटित होने से) साध्य के समान है । अतः भेद की उपस्थिति न होने से भेद-विषयक सन्देह का भी अवकाश नहीं है । इसलिए एक (अद्वैत) ब्रह्मरूप अस्त्र को अर्थात् अभेदरूप युक्ति को ग्रहणकर संग्राम (शास्त्रार्थ) रूप क्रीड़ा में अन्य भेदवादियोंकी गणना न करनेवाले, धीर-वीर अद्वैतवादी का भङ्ग (पराजय) कदापि नहीं हो सकता । ब्रह्मज्ञान ब्रह्मास्त्र को, कर में कर विद्वान । दुसरे को नहिं देखते, किससे हो अपमान ॥ किञ्च—जहाँ 'यह पर पुरुष चित्त में कुछ चिन्तन करता है या कुछ कहना चाहता है' ऐसी सामान्यतः प्रतीति होती है, वहाँ उसकी चिन्ता या विवक्षा का विषय प्रमाण के बिना विशेष रूप से ज्ञात नहीं होता । उस सामान्य रूप से ज्ञात वस्तु द्वारा अन्तिम बुद्धि के भेद की प्रमा (यथार्थ ज्ञान) आपको अशक्य है, अर्थात् नहीं हो सकती । क्योंकि संभव है कि परपुरुष अन्त्यबुद्धि का ही चिन्तन करता हो और अन्त्य-बुद्धि का स्व में भेद नहीं हो सकता । उस सामान्यतः चिन्तित से अन्तिम बुद्धि के अभेद-बोधन में आप अद्वैत- श्रुति के पद (प्राप्ति) का रोध (बाधं) नहीं कर सकते । अतः उस * स्थल में अवकाश पाकर श्रुति सर्वाद्वैत में पर्यवसित हो जायगी ।