खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें“यहाँ नल-दमयन्ती के लिए जिस उपमान की कल्पना की गयी, वह एक प्रकार से असंभव या अज्ञात वस्तु है। कहाँ सागर और कहाँ मध्यदेश ? इतनी कठिन दूरी की उपेक्षा कर कवि ने मध्यदेश की भूमि को सागर की गोद में बैठाकर एक उपमान गढ़ा किया है। जब सागर और नदी के संयोग से भी काम चल सकता था, तब मध्यदेश को बीच में लाने की क्या आवश्यकता थी ? इसका केवल एक ही समाधान है कि वह प्रान्त कवि का अपना जन्मप्रान्त था। ‘जनमनःप्रियम्’ विशेषण इस भाव को और भी पुष्ट करता है।” “इतना ही नहीं, श्रीहर्ष ने उस प्रान्त की राजधानी ‘महोदय’ (कन्नौज) नगरी का भी नामोल्लेख करते हुए वर्णन किया है। वहीं कीर दमयन्ती की प्रशंसा करता हुआ कहता है : ‘सुन्दरी, तुम भगवान् कामदेव की राजनगरी हो और तुम्हारे कुचों पर की गयी यह मकर-रचना उस राजा की मकरांकित पताका है। महोदय (कन्नौज या महान्- अभ्युदय) के महोत्सव से युक्त इस नगरी (तुम) में तुम्हारी भौंहों को कौन कामदेव का तोरण न कहेगा’ ?” “यदि ये वर्णन दमयन्ती के स्वयंवर में आये हुए किसी नरेश के प्रसंग में किये गये होते, तो उनसे कोई अन्य संकेत समझा जाता। किन्तु यहाँ एक नितान्त भिन्न प्रसंग में अलङ्कार के सहारे कवि ने इन स्थानों का जिस भावना के साथ उल्लेख किया है, उससे उसका यही अभिप्राय निकाला जा सकता है कि इन स्थानों से कवि का कोई हार्दिक सम्बन्ध अवश्य था। “बाह्य साक्ष्य से भी श्रीहर्ष का कन्नौज प्रान्त का होना सिद्ध होता है। फर्रुखाबाद जिले में कन्नौज के पास ‘मीरासराय’ नामक एक कस्बा है, जहाँ कन्नौज का रेलवे स्टेशन है। यहाँ विशेष बस्ती कान्यकुब्ज मिश्रों की है। ये लोग स्मार्त और शाक्त हैं और अपने को श्रीहर्ष का वंशज बतलाते हैं। इनका कहना है कि ‘हम लोग पहले त्रिपाठी थे, परन्तु श्रीहर्ष ने एक यज्ञ किया, जिससे हम ‘मिश्र’ कहे जाने लगे। ये लोग श्रीहर्ष का किसी राजा द्वारा सम्मानित होना भी बतलाते हैं। : “इस प्रकार अन्तः तथा बाह्य दोनों साक्ष्यों के आधार पर श्रीहर्ष कन्नौज प्रान्त के ठहरते हैं। साथ ही उन्हें काशी से भी विशेष प्रेम था। चाण्डू पण्डित ने भी उनका काशी में निवास करना बतलाया है। स्वयंवर-सभा में काशिराज का वर्णन करते हुए श्रीहर्ष ने काशी का बड़े अनुराग के साथ वर्णन किया है : ‘वाराणसी भूलोक से परे है, वह साक्षात् देवलोक में वाससम्पन्ना है। अतएव उस तीर्थ में मरनेवालों को मुक्ति ही
१. ‘चेतोभवस्य भवती कुचपत्रराज-थानीयकेतुमकरा ननु राजधानी । अस्या महोदयमहत्सुशि मीनकेतोः के तोरणं तदधि न ब्रुवते भ्रुवौ ते ॥’ (नैषध, २१।१३५) २. ‘...श्रीकाश्यां मुक्तिचेतेन मुक्तरूपस्वरूपो गङ्गादर्शनादिना धर्मकर्म- सम्पादनेन’ इत्यादि। (चाण्डू पण्डित : नैषधदीपिका का प्रारम्भ)।