भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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मिलती है। अन्यथा मुक्ति के अतिरिक्त स्वर्ग से बड़ा कौन पद है, जो अधिक आनन्द देगा¹ ?" आदि। अन्त में जब स्वयंवर में देवगण प्रसन्न होकर नल-दमयन्ती को वरदान देने लगते हैं, उसी प्रसंग में इन्द्र नल को एक यह भी वरदान देते हैं : 'राजन्, तुम्हारे निवास के लिए वाराणसी के समीप असी नदी के पास तुम्हारे नाम की नगरी होगी । मोक्षाभिलाषी होने पर भी काशी में तुम्हारा निवास इसलिए नहीं बनाया गया कि वहाँ रहकर तुम्हें दमयन्ती के साथ संभोग-सुख भोगने में संकोच करना पड़े²।" "देवों के जितने.वरदानों का नैषध में उल्लेख हुआ है, प्रायः सभी महाभारत में कहे गये हैं। किन्तु वाराणसी के समीप नल के नाम से बसनेवाली नगरी के वरदान का वहाँ कोई उल्लेख नहीं हुआ है। नल की कथा जहाँ-जहाँ मिलती है, कहीं भी इस वरदान की चर्चा नहीं है। अतः यह श्रीहर्ष द्वारा कल्पित ही समझ पड़ता है। अब प्रश्न उठता है कि इस कल्पना का आधार• या मूल क्या है ? कवि ने यह एक नूतन वरदान क्यों दिलवाया ? इसका एकमात्र उत्तर यही समझ पड़ता है कि श्रीहर्ष के समय काशी के समीप, असी के समीप असी के उस पार कोई ऐसा गाँव या नगर रहा होगा, जिसका नाम नल के नाम पर पड़ता था तथा जो बहुत पुराना बसा हुआ बताया जाता था, जिसे देखकर कवि ने यह कल्पना कर डाली। "इस कल्पना से यह भी सहज में अनुमान लगाया जा सकता है कि श्रीहर्ष काशी में रहते समय या तो काशी के पास उसी नल-नामवाले गाँव में रहते थे या उस गाँव से इन का कोई विशेष-सम्बन्ध था। आज भी काशी के समीप असी के पार नरोत्तमपुर, नरियापुर ( नलपुर ) तथा नैषढ़ा (नैषधपुर) तीन गाँव हैं। इन्हींमें से किसी एक के प्रति श्रीहर्ष का यह संकेत ज्ञात होता है।" श्रीशुक्लजी का श्रीहर्ष के स्थानसम्बन्धी यह अनुमान अभी तो अन्वेषकों के लिए अद्यतन और विशेष परिष्कृत मालूम पड़ता है। संभव है, इससे आगे इसके साधक-बाधक और भी प्रमाण प्रकाश में आयें। किन्तु आज इतने से सन्तोष मानने में कोई बाधा नहीं दीखती। कान्यकुब्जेश्वर जयचन्द्र के सम्मानित आश्रित श्रीहर्ष का काशी में रहना इसलिए भी समर्थित हो सकता है कि उक्त नरेश का उन दिनों काशी पर भी शासन था, जो पीछे उद्धृत ११८६ ई० के उनके दानपत्र से स्पष्ट है। बहुत संभव है कि उक्त नरेश ने काशी-निवास के लिए श्रीहर्ष को यह नलपुर गाँव दिया हो, जिनकी कीर्ति-वैजयन्ती फहराने में नैषध के रूप में कवि ने अपनी समस्त कवि-प्रतिभा उड़ेल दी

१. “वाराणसी निविशते न वमुन्धरायां तत्र स्थितिर्मखभुजां भुवने निवासः । तत्तीर्थमुक्तवपुषामत एव मुक्तिः स्वर्गात्परं पदमुदेतु मुदे तु कीदृक् ॥” --( नैषध, ११ । ११६ २. “त्वोपवाराणसि नामचिह्नं वासाय पारेसि पुरं पुराऽस्ति । निर्वातुमिच्छोरपि तन्न भैमीसम्भोगसङ्कोचभियाऽधिकाशि ॥” -(नैषध

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