भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 81

६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम यदि तावत् स्वरूपभेदः, १स नाम घटपटयोर्हि स्वरूपं यत् परस्परस्माद् भेदः, तत्परस्परमनन्तर्भाव्य न सम्भवति । भेदो हि भवन् कस्मादपि भवति । अन्यथा स्वरूपं भेद इति पारिभाषिकं नाम स्यात् । यदा च 'घटाद् भेदः पटस्य' इत्येतावानेवार्थः पटादेः स्वरूपं प्रत्यक्षेण गृह्यते, तदा घटोऽपि पटात्मन्येव प्रविष्ट इति पटघटयोरैक्यात्म्यमेव भेदग्राहिणा प्रत्यक्षेणाऽवगाहितमिति विपरीतमपद्यते । ननु यथेयं प्रतीतिरभेदोल्लेखितया व्याख्यायते, तथा भेदोल्लेखित्वेऽपि दीयतामस्यां दृष्टिः । अभेदे हि 'घटः' इत्येव 'पटः' इत्येव वा बुद्धिः स्यात्, न तु 'घटाद्भिन्नः पटः' इति चेत् । स्यादप्येष पर्यनुयोगो यद्यविद्यविद्यमानमार्थं भेदं पारमार्थिकमभेद- मिच्छन्तोऽपि प्रत्यादिशामः । तस्मात्- प्रथम विकल्प-खण्डन—इनमें प्रत्यक्षादि स्वरूप भेद को विषय नहीं करते । क्योंकि घट और पट का स्वरूप है परस्पर से भेद; वह परस्पर के अन्तर्भाव के बिना हो नहीं सकता । किसीसे ही किसीमें भेद होता है । यदि प्रतियोगी से अनिरूपित ही (केवल स्वरूप) को भेद कहें, तो वह भेद की केवल परिभाषा (संकेत) हुई, शब्दार्थ नहीं । यदि घटप्रतियोगिक भेद पट का स्वरूप है और वह प्रत्यक्ष का विषय है, तो घट भी पट के स्वरूप में ही प्रविष्ट हुआ । इस रीति से भेदग्राही प्रत्यक्ष घट-पट के ऐक्य को ही विषय करेगा; इसलिए विपरीत ही हुआ । समर्थन—आपने इस प्रतीति का जैसे अभेद-विषयकत्वरूप से कथन किया है, वैसे ही इस प्रतीति के भेद के उल्लेख पर भी दृष्टि दीजिये । अभेद के उल्लेख में 'घटः', 'पटः' ऐसा ही आकार होता, 'घटात् भिन्नः पटः' ऐसा नहीं । खण्डन—हम परमार्थ में ही भेद नहीं मानते, व्यवहार में तो भेद मानते ही हैं । अतः व्यावहारिक भेद से इस प्रतीति का निर्वाह हो जायगा । प्रश्न—परमार्थ में भेद नहीं, अभेद ही है, इसमें क्या प्रमाण ? उत्तर—अभेद (स्वरूप) के उल्लेख (अवगाहन) बिना घट-पट के भेद का उल्लेख नहीं होता और भेद के उल्लेख के बिना भी अभेद का उल्लेख हो जाता है । अतः उपजीव्य होने से अभेद में उक्त प्रतीति प्रमा है, भेद नहीं । . १ 'स नाम' यह पाठ अधिक ज्ञात होता है । विद्यासागरी में 'स न' ऐसा पाठ है ।