भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] भेद-खण्डन का अनुवाद ६७ 'अभेदं नोल्लिखन्ती धीर्न भेदोल्लेखनक्षमा । तथा चाद्ये प्रमा सा स्यान्नान्त्ये स्वापेक्ष्यवैशसात् ॥' अथ भेदः इत्येतावन्मात्रं पटस्य स्वरूपं घटादिति च तद्घटेन प्रतियोगिना १अन्येनैव निरूप्यते; तदपि नोपपद्यते, निष्प्रतियोगिकस्य भेदस्य प्रमाणागोचरत्वात् । नित्यं प्रतियोगिघटित एव तस्मिन् प्रमाणप्रसरात् । का चेयं वाचो युक्तिर्यदन्या- साकाङ्क्षं पटस्य स्वरूपमन्येन प्रतियोगिना निरूप्यमाणं ततो भेदो भवतीति । न हि यत् स्वरूपेणैव नीलं तत्पीतेन निरूप्यमाणं २नीलं भवति । यदपि चोक्तम्—'प्रतियोगिना घटेन निरूप्यमाणं पटस्य स्वरूपं भेदः' इति । तत्रापि पटं प्रति प्रतियोगित्वं घटस्य किं स्वरूपं किं वा धर्मः कश्चित् ? यदि प्रथमः; तदा पटं प्रति प्रतियोगित्वमित्येतावानेवार्थो घटस्य स्वरूपं भवन् आत्मन्येव पटमपि प्रक्षिपतीति कथं नाद्वैतमेव पर्यवस्यति । बिनु अभेद के भान के, होत न भेद क भान । अत अभेद के भान में, होत प्रतीति प्रमाण ॥ निज उपजीव्य अभेद की, मति बाधन से भीत । भेद-प्रतीति प्रमाण कस, होय सकेगी मीत ॥ समर्थन—केवल भेद ही पट का स्वरूप है और वह स्वरूप में अप्रविष्ट घट से निरूपित होता है । खण्डन—प्रतियोगी से रहित भेद की प्रतीति कहीं भी नहीं होती, नियमतः प्रतियोगी से विशिष्ट ही भेदप्रतीति होती है । अतः घट भी भेद के स्वरूप में हीं अन्तर्भूत है । यह कौन-सी युक्ति है कि जो स्वभावतः अन्य से निराकाङ्क्ष पट का स्वरूप है, वह अन्य ( प्रतियोगी ) से निरूपित होकर घट का भेद हो जाय । स्वभाव से जो नील है, वह पीत से निरूपित होकर उसका भेद है—यह नहीं है । फिर आप जो कहते हैं कि प्रतियोगी ( घट ) से निरूपित पट का स्वरूप भेद है, वहाँ पट के स्वरूपरूपी भेद का जो प्रतियोगित्व है, वह घट का स्वरूप है; या धर्म ? यदि घट का स्वरूप है, तो पटनिष्ठ भेदीय प्रतियोगित्व घट का स्वरूप हुआ; अतः पट भी घट का स्वरूप हुआ । तब अद्वैत में ही भेद-प्रतीति का पर्यवसान क्यों न माना जाय ? १ — 'अन्येन' इससे पीछे 'तत्' यह शेष है । २—'नीलम्' के स्थान में 'ततो भेदः' ऐसा पाठ ठीक ज्ञात होता है ।