भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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६८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम

तत्रापि यदि प्रतियोगित्वमात्रं घटस्याऽऽत्मा, 'पटं प्रति' इति च पटापेक्षित्वा- मन्यदेव । तदप्यनुपपन्नम्; अकिञ्चिदपेक्षस्य प्रतियोगित्वस्य प्रमाणाविषयत्वात् । 'पटं प्रति' इत्यत्रापि च स्वरूपतदन्यविकल्पे दोष एव । नापि द्वितीयः; योऽसौ धर्मः पटं प्रति प्रतियोगित्वं तस्याऽऽत्मनि पटोऽपि प्रविशतीति तेन सह पटस्याद्वैतं स्यात् । यदा च पटो घटस्य धर्मतामापन्नस्तदा घटोऽपि पटस्य धर्मतामनेनैव न्यायेन गच्छेत् । न हि पटप्रतियोगित्वस्य घटेन प्रतियोगिना निरूप्यमाणत्वे घटस्याऽन्या गतिरस्तीति परस्परमाश्रितत्वमाश्रयत्वं च स्यात् । न च कस्यचित् प्रमाणस्य विषयो घटारूढः पटस्तत्पटारूढश्च स एव घट इति । समर्थन—केवल प्रतियोगित्व घट का स्वरूप है । वह स्वरूप में अप्रविष्ट जो पट का स्वरूपरूपी भेद है, उससे निरूपित होता है । खण्डन—यह ठीक नहीं है, क्योंकि केवल प्रतियोगित्व की कभी प्रतीति नहीं होती, नियमतः भेदनिरूपित ही प्रतियोगित्व की प्रतीति होती है । अतः भेद-विशिष्ट प्रतियोगित्व के घटस्वरूप होने से पट भी घट का स्वरूप हुआ । प्रतियोगित्व के घटरूप होने से प्रतियोगित्व में वर्तमान पटनिरूपितत्व भी घट में ही है । वह पटनिरूपितत्व भी घट का स्वरूप है या धर्म ? ऐसा विकल्प करने पर उक्त और वक्ष्यमाण रीति से दोष ही है । पट के स्वरूप-रूप भेद से निरूपित प्रतियोगित्व घट का धर्म है—यह द्वितीय पक्ष भी उचित नहीं है । क्योंकि पट का स्वरूप जो भेद, उसके प्रतियोगित्व के स्वरूप में पट का प्रवेश होने से प्रतियोगित्व के साथ पट का अभेद हो जायगा । तब जैसे प्रतियोगित्व घट का धर्म है, वैसे ही पट भी घट का धर्म हो जायगा; क्योंकि दोनों का अभेद है । जब उक्त रीति से पट घट का धर्म हुआ, तब उसी रीति से घट भी पट का धर्म हुआ । क्योंकि 'पटात् घटो भिन्नः' इत्याकारक प्रतीतिसिद्ध प्रतियोगित्व का घट से निरूपण करने पर घट की अन्य गति नहीं है । अतः घट पट का आश्रय और धर्म होगा तथा पट भी घट का धर्म और आश्रय होगा किन्तु इस तरह घट पर आरूढ पट तथा उसी पट पर आरूढ वही घट—किसी प्रमाण का विषय नहीं होता ।