खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] भेद खण्डन का अनुवाद ६६ किञ्च धर्मस्य तस्य धर्मिणा सममसंबन्धेऽतिप्रसङ्गः, सम्बन्धानन्त्येऽनवस्था, प्रथमोतोऽन्ततो गत्वा वा स्वभावसम्बन्धाभ्युपगमे सम्बन्ध्यन्तरस्यापि तत्स्वभाव- प्रवेशादभेद एव पर्यवसानं स्यादिति । एवमन्यस्मिन्नपि धर्मविकल्प इति । तस्मात् स्वरूपभेदे प्रमाणं भवत् प्रत्यक्षमद्वैत एव प्रमाणं भवति । ननु घटादिकमेव यदाऽन्यानपेक्षं वीक्ष्यते, तदा घटादिकमित्येव प्रतीयते । यदा पुनः पटादिना निरूप्यते, तदा ततो भेद इति प्रतीयते । मैवम्; घटादिक- मित्येवंभूतप्रतीतेस्तावद्भेदप्रतीतिर्विलक्षणा, सा च न घटादिमात्रेण स्वविषयेण अन्यथाकारा भवितुमर्हति । न च पटादिकमधिकं तदा प्रकाशत इति विशेषः स्यात् ; घटपटविषय- प्रतीतितोऽपि वैलक्षण्यात् । न हि 'घटः पटश्च' इति 'घटात् पटो भिन्नः' इति प्रतीत्योरेकार्थकत्वं कश्चित् प्रत्येति । तत् कस्य हेतोः ? पञ्चम्या प्रथमया च वैकल्पिकं निर्देशमसहमानयैव प्रतीतिकलहनिरासात् । न हि घटः पटश्चेति फिर उस धर्म का धर्मी के साथ असम्बन्ध मानें, तो सब धर्मों को सर्वत्र रहना चाहिए, क्योंकि सम्बन्ध आदि कोई नियामक है ही नहीं । यदि कोई सम्बन्ध मानें; तो उस सम्बन्ध का सम्बन्ध, पुनः उसका अन्य सम्बन्ध, इस तरह अनवस्था हो जायगी । आरंभ या अन्त में यदि स्वरूपसम्बन्ध मानें, तो एक सम्बन्धी के स्वरूपसम्बन्ध में अन्य सम्बन्धी का प्रवेश होने से दोनों का ऐक्य हो जायगा । इसी रीति से घटत्वादि का भी घट से अभेद हो जायगा । अतः आप स्वरूपरूपी भेद में जो प्रत्यक्ष प्रमाण देते हैं, वह प्रत्यक्ष अद्वैत में ही प्रमाण हो गया । समर्थन—जब अन्य से अनिरूपित केवल घट प्रतीति का विषय होता है, तब 'घटः' इत्याकारक ही प्रतीति होती है । किन्तु जब वह पटादिरूप प्रतियोगी से निरूपित होकर विषय होता है, तब 'पटात् भिन्नो घटः' यह प्रतीति होती है । खण्डन—'घटः' इस प्रतीति से 'पटाद् भिन्नः घटः' यह प्रतीति विलक्षण है, 'घटः' यह प्रतीति केवल घटविषयक होने से विलक्षण नहीं हो सकती । समर्थन—'पटात् भिन्नः घटः' इस प्रतीति में पट अधिक भासता है, यही विशेष है ? खण्डन—घट-पट को विषय करनेवाली प्रतीति से भी 'पटाद् भिन्नः घटः' इस प्रतीति की विलक्षणता है । कोई भी विद्वान् 'घटः पटश्च' और 'घटाद् पटो भिन्नः' इन दो प्रतीतियों का विषय एक नहीं मान सकता; क्योंकि प्रथमा और पञ्चमी का अर्थ अधिक भासता है । 'घटः पटश्च' ऐसे ज्ञान के लिए 'घटाद् पटो भिन्नः' ऐसे वाक्य