भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 85

७८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्यं [ प्रथम प्रत्येतव्ये कश्चित् घटात् पटो भिन्न इति प्रत्येति । तस्माद् घटस्य न स्वरूप- निरूपणे पटप्रतीत्यपेक्षा । न च यत्प्रतीतिर्यत्प्रतीतेः कारणं स्यात्, तत्र तस्याः कारणभूतायाः प्रतीतेर्योऽर्थः तस्मात् 'अयम्' इति कृत्वा कार्यभूतायाः प्रतीतेरर्थः प्रतीयते । मा भून्निर्विकल्पकार्थादेवं सविकल्पकार्थस्य प्रतीतिः । मा च सादृश्यादेरेवं स्मर्यमाणादेः स्यात् । तस्मात् 'पटो घटाद्भिन्नः' इत्याद्याकारेण घटादेर्भेद एव भेदावधिभूतपटादिसंघटितः स्फुटं सर्वलोकसाक्षिकः प्रतीयमानो नैकप्रतीतेरन्य- प्रतीत्यपेक्षामान्रेण समर्थयितुं शक्योऽतिप्रसङ्गादिति । अत एवान्योन्याभावं भेदमवगाहमानं प्रत्यक्षमाद्वैतश्रुतिबाधकमित्यपि निरस्तम् । अन्योन्याभावोऽपि यस्माद्भेद एष्टव्यस्तमात्मन्येवान्तर्भावयेदुक्त- युक्तिभिः । किञ्च घटपटयोस्तद्वद्वन्द्योश्च तादात्म्यमन्योन्याभावस्य प्रतियोगि मन्तव्यम् । तद्यदि सर्वथा नेष्यते, तदा तद्विशिष्टस्तदुपलक्षितो वाऽन्योन्याभावोऽपि न प्रमाणेन प्रत्येतुं शक्यः । न हि शशविषाणविशिष्टस्तदुपलक्षितो वा कश्चित् का प्रयोग कोई भी नहीं करता । अतः घट के स्वरूप के निरूपण में पटप्रतीति की अपेक्षा ही नहीं है । समर्थन—घट-स्वरूप के भान में कदाचित् प्रतियोगी पट की प्रतीति अपेक्षित है। अतः ज्ञाननिष्ठ हेतुत्व का विषय में आरोपकर 'पटाद् भिन्नः घटः' यह प्रयोग होता है, जैसे धूम-ज्ञाननिष्ठ हेतुत्व का धूम में आरोपकर 'वह्निमान् धूमात्' यह प्रयोग होता है । खंडन—निर्विकल्पक ज्ञान सविकल्पक ज्ञान का तथा सादृश्य-ज्ञान स्मरण का हेतु है । फलतः आरोप से 'गोत्वात् गौः' और 'सादृश्यात् स्मरणम्' यह प्रयोग हो जायगा । अतः 'पटः घटाद् भिन्नः' इस आकार से पटनिष्ठ सर्व-लोक-साक्षिक और स्फुट प्रतीयमान घट के भेद का समर्थन, अन्य प्रतीति के एक प्रतीति का कारण होने मात्र से, नहीं हो सकता । समर्थन—भेद-प्रतीति अन्योन्याभाव को विषय करती है। खंडन—अन्योन्याभाव भी जिसका होगा, उसको अपने स्वरूप में ही उक्त रीति से अन्तर्भूत करेगा । किञ्च—घट-पट के तादात्म्य को अन्योन्याभाव का प्रतियोगी मानेंगे और वह (घट-पट का तादात्म्य) यदि सर्वथा असत् है, तो उससे उपलक्षित या विशिष्ट अन्यो-