खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
'प्राग्लोपाविनिगम्यत्वप्रमाणापगमैर्भवत् । अनवस्थितिमास्थातुरचिकित्स्या त्रिदोषता ॥' यदि च क्वचिद् गत्वा स्वरूपमेवान्योन्यं व्यावर्तमानं भेद इष्यते ; तदा ययोः स्वरूपं यथैष्टव्यं तयोः निःस्वरूपतापत्तिः । अथ न स्वरूपमात्रं मिथो व्यावर्तते, किं नाम ? स्वरूपविशेष इत्युच्यते, तर्हि स्वरूपविशेषमात्रव्यावृत्त्या स्वरूपमात्रं तयोः स्यादित्येकत्वापत्तिः । अथवा वक्तव्योऽसौ स्वरूपमात्रादन्यो विशेषार्थः । अथ न स्वरूपं नाम किञ्चिद् अनुगतमिष्यते मया, विशेषरूपासु व्यक्तिष्वेव स्वरूपशब्दो नानार्थः सन्निविशते इत्यभिधत्से; तर्हि गतमनेनैव न्यायेन गोत्वादिसिद्धिप्रत्याशया । न च प्रतिव्यक्ति स्वरूपपदसमयग्रहोपपत्तिः । अग्रिम-अग्रिम भेद से ही पूर्व-पूर्व भेद के उपयोग का प्रयोजन ( भेद-व्यवहार ) सिद्ध होने से पूर्व-पूर्व भेद का विलोप ( वैय्यर्थ्य ), 'किस भेद-विशिष्ट में कौन-सा भेद रहता है' इसमें अविनिगम एवं 'एक में बहुत-से भेद हैं' इसमें प्रमाण का अभाव—ये तीन दोष अनवस्था-स्वीकर्ता के लिए अप्रतीकार्य हो जायेंगे । 'कौन भेद किस भेद से, युत में विनिगम नाहिं । एक वस्तु में भेद बहु, या में अनुभव नाहिं ॥ पूर्व-भेद की व्यर्थता, उत्तर भेद से होत । अनवस्था में दोष ये, तीन सबहि जग होत ॥ समर्थन—परस्पर व्यावृत्तस्वरूप रूप भेद से भिन्न में वैधर्म्यरूप भेद रहता है, अतः अनवस्था दोष नहीं है । खण्डन—तब तो जिन दो घट-पटों के स्वरूप परस्पर व्यावृत्त होंगे, वे दोनों स्वरूप से रहित हो जायेंगे । समर्थन—स्वरूपमात्र ( सामान्य स्वरूप ) परस्पर व्यावृत्त नहीं होता, किन्तु स्वरूपविशेष ही व्यावृत्त होता है । खंडन—यदि स्वरूपविशेष व्यावृत्त होता है, तो उन दोनों में स्वरूप-सामान्य होने से ऐक्य हो जायगा । फिर पट का स्वरूप पट ही है, जो सब पटों में रहता है और घट का स्वरूप घट ही है, जो सब घटों में रहता है । उन दोनों स्वरूपों से अन्य किसी विशेष स्वरूप का उनमें अनुभव नहीं होता, जो परस्पर से व्यावृत्त हो । समर्थन—हम घटादि सब वस्तुओ म अनुगत ( एकरूप से विद्यमान ) एक सामान्य रूप ( जिसका नाम स्वरूपत्व है ) को नहीं मानते, किन्तु प्रतिव्यक्ति में