भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] भेद-खण्डन का अनुवाद ७५ यदि च स्वरूपं भेदः स्यात्, तदा धर्मिणि दृष्टे स्वरूपं दृष्टमिति क्वचिश्न संदेहः स्यादिति । यदि चाभिन्ने भेदो निविशेत, तदा याऽप्येका व्यक्तिः प्रतीयते घटादिः, साऽपि तेनैव भेदेनानेका स्यादित्येकाभावे नानेकमपि व्यवतिष्ठेत । एतेन न भेदावच्छिन्ने, न चाऽभेदावच्छिन्ने भेदो विनिविशते, किंतु उदासीने इत्यपि निरस्तम् । अत एव च भेदो नाम स्वरूपान्योन्‍याभाववैधर्म्यानात्मको धर्मान्तरं पृथक्त्वापरनाकमित्यपि परास्तम् । सोऽपि हि स्वाश्रये भिन्ने विनिविशेत अभिन्ने वेत्यादि यथोक्तदोषलङ्घनाजङ्घाल एव स्यात् । व्यावृत्त विशेष रूप से युक्त व्यक्तियों में ही 'स्वरूप' शब्द की शक्ति का सन्निवेश मानते हैं। अर्थात् 'स्वरूप' शब्द का स्वरूपत्वरूप एक अर्थ नहीं, किन्तु नाना व्यक्ति ही अर्थ है । खण्डन - तब तो इसी प्रकार 'गो' शब्द का भी नाना गोव्यक्ति में प्रयोग होगा, फलतः गोत्वादि जाति की सिद्धि की आशा भी जाती रहेगी । फिर, स्वरूप तथा गो आदि व्यक्तियों के अनन्त होने से उनमें स्वरूप तथा गवादि पद के समय (शक्ति) का ज्ञान भी न होगा । यदि स्वरूप ही भेद है, तो धर्मी के प्रत्यक्ष होने पर भेद भी प्रत्यक्ष हुआ । अतः कहीं भी 'स्थाणुः पुरुषो वा' इत्याकारक स्वरूप विशेषविषयक सन्देह नहीं होगा और न 'इदं रजतम्' यह अभेद-भ्रम ही होगा । यदि कहें कि अभिन्न में भेद रहता है, तो जो घटादि व्यक्ति एक प्रतीत होती है, वह भी उसी भेद से भिन्न (अनेक) प्रतीत हो जायगी। अतः कोई भी एक न होगा । फिर प्रतियोगी एक के अलीक होने से अनेकत्व भी व्यवस्थित नहीं होगा । यदि कहें कि भेद की वृत्तित्ता के भेद अथवा अभेद अव- च्छेदक नहीं, किन्तु भेद या अभेद से अवच्छिन्नत्व में उदासीन होकर केवल धर्मी में भेद रहता है ? तब तो स्व में स्व के भेद की आपत्ति हो जायगी । क्योंकि स्व भी भेद-अभेद से अवच्छिन्नत्व में उदासीन है और धर्मी भी है । समर्थन - स्वरूप, अन्योन्याभाव तथा वैधर्म्य से भिन्न पृथक्त्व नामक नैयायिका- भिमत गुण भेद-प्रतीति का विषय है ही, फिर भी अद्वैत नहीं हुआ । खंडन - वह पृथक्त्व भी 'पृथक्त्वरूप भेद से भिन्न या अभिन्न धर्मी में रहता है' इत्यादि विकल्पों से पूर्वोक्त दोषों के लङ्घन में असमर्थ ही है ।