भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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७६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम स्वाश्रयेण च स्वस्मिन्नभेदमयाद्यदि स एवं भेदो निविशते; तदाऽऽत्माश्रयः । अन्यश्चेत्तस्मिन्नेवं तस्मिन्नप्यन्य इत्यनवस्था । क्वचिदपि गत्वा भेदभेदाश्रयोर्भेदस्य अस्वीकारे च तदैक्यद्वारिका मूलपर्यन्तमेकता धावेत् । 'तदद्वैतश्रुतेस्तावद्बाधः प्रत्यक्षतः क्षतः । नानुमानादि तं कर्तुं तवापि क्षमते मते ॥ अद्वैतागमनासीरे साधु सा धुन्वती परान् । सेवामेवार्जयत्यर्थापत्तिपत्तिपरम्परा 11' नन्वद्वैतश्रुतयो वर्ण-पद-विभक्ति-तदर्थादिभेदानुपजीव्य अर्थं प्रतिपादयन्त्यः स्वोपजीव्याभिर्भेदबुद्धिभिर्न कथं बाध्यन्ताम् ? उपजीवकस्य उपजीव्याद्दुर्बलत्वात् । यदि भेद के आश्रय के साथ भेद का भेद न मानें, तो स्वाश्रय से भेद का अभेद हो जायगा । अतः यदि भेद मानें और उसीका स्व में निवेश हो, तो आत्माश्रय हो जायगा । यदि अन्य भेद मानें, तो अनवस्था होगी । यदि कहीं जाकर अन्त में भेद का भेदाश्रय के साथ भेद न मानें, तो उसके ऐक्य द्वारा मूलपर्यन्त ऐक्य हो जायगा । तस्मात् भेद-प्रत्यक्ष का कोई विषय ही न होने के कारण प्रत्यक्ष से अद्वैत-श्रुति का बाध नहीं हो सकता । अनुमानादि तो आगम की अपेक्षा दुर्बल ही हैं; अतः वे तो तुम्हारे मत से भी अद्वैत-श्रुति के बाधक नहीं हो सकते । तथा अद्वैतागमरूप सेना में आगे विद्यमान, अर्थापत्तिरूप पैदलों की टुकड़ी तो पूर्वोक्त प्रकार से प्रतिपक्ष-युक्ति- रूप शत्रुओं का नाश करती हुई अद्वैत के अनुकूल ही है । इस विधि से प्रत्यक्ष से, श्रुतिज बोध नहिं आँच । अनुमानहि से आँच तो, तुम भि न मानो साँच ॥ अद्वैतागम सैन्य के, आगे देक छलांग । अर्थापत्ति पदाति ने भेदवाद दी आग ॥ प्रश्न—नानात्व ( भेद ) के बिना 'नाना पद श्रौत-बुद्धि के कारण हैं' यह कार्यकारणभाव नहीं हो सकता और न कारण के बिना श्रौत-बुद्धि ही हो सकती है । इसलिए बाध्य-बाधकभाव की चिन्ता व्यर्थ है । क्योंकि पद-पदार्थ का नानात्व श्रुति का उपजीव्य (कारण) है और श्रुतिज बुद्धि उसकी उपजीवक (कार्य) है । उपजीवक से उपजीव्य का बाध नहीं हो सकता, क्योंकि वह उपजीव्य से दुर्बल होता है ।