खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम ननु कथं तस्य श्रुत्या जन्यत्वमुपपद्यते ? सत्यम् ; एवं स्यात्, यदि तस्य पारमार्थिकी श्रुत्या जन्यताऽपि स्यात् । अविद्याव्यवस्थिता तु तज्जन्यता न पारमार्थिकेनाजन्यत्वेन विरुद्ध्यते । अत एव श्रुत्येदमेकं साध्यते । यत्तु तत्र यद्येकता भेदाभावः, यदि चैकत्व- संख्या, यदि वा ज्ञानात्मकत्वं, यदि वाऽन्य एवैकत्वनामा कश्चिदभेदापरपर्यायो धर्मस्तद्वत्त्वं बोध्यते । तच्चाद्वैतव्याघातकत्वान्न सेद्धुं शक्नोति, तदा तदपि निष्पीडन- मसहमानं तज्ज्ञानं श्रुतिजन्यत्वेन सहैव निवर्त्तताम् । यत्तु तादृशस्याद्वैतस्य धर्मस्य धर्मितया प्रमितं तन्मात्रमबाधादधिगतं परमार्थतो व्यवतिष्ठताम् । न हि परमार्थशुक्तौ रजततया प्रतीयते यदा, तदा बाधात्तत्र रजतत्वे व्यावर्तमाने धर्मिव्यक्तिरपि तदपराधान्निवर्तते । हो जाता है । यदि ऐसा न मानें, तो 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' इत्यादि श्रुति का विरोध हो जायगा । प्रश्न—अद्वैत ( ब्रह्म ) नित्य है और श्रौत-बोध जन्य है । अतः श्रौत-बोध ( विज्ञान ) अद्वैतरूप नहीं है । अन्यथा विज्ञान श्रुतिजन्य नहीं होगा, क्योंकि जन्यत्व-अजन्यत्वरूप दो विरुद्ध धर्मों का एकत्र समावेश अनुचित है ? उत्तर—श्रौत-बोध ( विज्ञान ) जन्य नहीं, नित्य है; अतः अद्वैतरूप है । फिर भी वृत्तिरूप उपाधि के जन्य होने से उसमें जन्यत्व का व्यवहार होता है । जैसे आकाश के नित्य होने पर भी घट, पट आदि उपाधियों के अनित्य होने से घटाद्यव- च्छिन्न आकाश में अनित्यत्व का व्यवहार होता है । प्रश्न—'एकमेवाद्वितीयम्' इत्यादि श्रुतिजन्य बोध में ब्रह्म में विशेषण रूप से एकत्व भी भासता है । अतः ब्रह्म में एकत्व की भी सिद्धि हुई, तब अद्वैत सिद्ध कैसे हुआ ? उत्तर—श्रुति से एकत्वादि धर्मों से शून्य केवल धर्मिरूप अद्वैत ही सिद्ध होता है । यदि उस धर्मी में श्रुति से अभेदापरपर्याय भेदाभाव, एकत्वसंख्या, ज्ञान या कोई ही अन्य एकत्वरूप धर्मवत्त्व बोधित होता हो और वह अद्वैत का व्याघात होने से सिद्ध न हो रहा हो, तो एकत्वादि भी व्याघात न सहते हुए जन्यत्व के साथ ही निवृत्त हो जायँ । जो उस अद्वैत-धर्म ( एकत्व ) का धर्मी रूप से बोधित हो, अबाध से ज्ञात वही परमार्थतः व्यवस्थित हो । जहाँ परमार्थ शुक्ति रजतत्व रूप से ज्ञात होती है, वहाँ