भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 610 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 94

परिच्छेद ] भेद-खण्डन का अनुवाद ७६ स्तावत् परमार्थसदेवाद्रैतम् । विरोधेन च तस्याः बाध्यता, स च नास्तीति । तस्मात्— 'पारमार्थिकमद्वैतं प्रविश्य शरणं श्रुतिः । बाधनादुपजीव्येन बिभेति न मनागपि ॥' श्रुतिरपि तदाह—'द्वितीयाद्वै भयं भवति' इति । तच्चाद्वैतं 'ब्रह्मैवेदं सर्वमि'ति श्रुत्यर्थेन सहैक्यमापन्नं ब्रह्मैव स्यात्, 'विज्ञान- मानन्दं ब्रह्मे'ति च श्रुत्या ज्ञानानन्दात्मतया व्यवतिष्ठते । तेन यदिदमद्वैतज्ञानं श्रुत्या जनितं तद्विज्ञानाद्वैतात्मन्येव निविशते । भेद-प्रत्यक्ष से उसका बाध क्यों न हो ? उत्तर—अद्वैत-बुद्धि के स्वरूप का बाध अभिप्रेत है या विषय का ? यदि स्वरूप का बाध अभिप्रेत हो, तो उसे हम भी मानते ही हैं। यदि विषय का बाध कहें, तो वह 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इस श्रुति का विरोध होने से असङ्गत है । विषय के विरोध से ही बुद्धि बाध्य होती है । प्रकृत में अद्वैतरूप विषय बाधित नहीं है । अतः अविद्यमान ( स्वरूप से बाधित ) भी अद्वैत-बुद्धि विषय से अबाधित ही है । तस्मात् पारमार्थिक अद्वैतरूप शरण का अवलम्बनकर श्रुति उपजीव्य के बाध से किंचित् भी नहीं डरती; क्योंकि परमार्थतः भेदघटित बाध्य-बाधकभाव है ही नहीं। परमारथ अद्वैत की, शरण पाय श्रुति मान । भेद-बुद्धि उपजीव्य से, तनिक न डरती मान ॥ बृहदारण्यक ( १।४।२ ) श्रुति भी कहती है कि द्वितीय से भय होता है । प्रश्न—'एकमेवाद्वितीयम्' इस श्रुति से अद्वैत, 'ब्रह्मैवेदं सर्वम्' इस श्रुति से ब्रह्म और 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' इस श्रुति से विज्ञान तथा आनन्द ज्ञात होते हैं । इनका परस्पर विरोध होने से कुछ भी सिद्ध नहीं होगा । यदि श्रुति-प्रामाण्य से सभीकी सिद्धि हो, तो अद्वैत की ही हानि हो जायगी ? उत्तर—'एकमेवाद्वितीयम' इस श्रुति से बोधित अद्वैत 'ब्रह्मैवेदं सर्वम्' इस श्रुति के साथ एकवाक्यतापन्न होकर ब्रह्मरूप ही है। इसी तरह 'विज्ञान- मानन्दं ब्रह्म' इस श्रुति की एकवाक्यता से विज्ञान आनन्दरूप ही व्यवस्थित होता है । प्रश्न—श्रुतिजन्य विज्ञान का विषय होने से अद्वैत विज्ञानरूप नहीं है, क्योंकि स्वयं अपना विषय नहीं होता । उत्तर—वृत्तिरूप ज्ञान से भेद इष्ट ही है । अद्वैत वृत्ति-प्रतिबिम्बित आभास का विषय नहीं होता, किन्तु स्वयं आभास अद्वैतरूप :