खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
परिच्छेद ] भेद-खण्डन का अनुवाद ७६ स्तावत् परमार्थसदेवाद्रैतम् । विरोधेन च तस्याः बाध्यता, स च नास्तीति । तस्मात्— 'पारमार्थिकमद्वैतं प्रविश्य शरणं श्रुतिः । बाधनादुपजीव्येन बिभेति न मनागपि ॥' श्रुतिरपि तदाह—'द्वितीयाद्वै भयं भवति' इति । तच्चाद्वैतं 'ब्रह्मैवेदं सर्वमि'ति श्रुत्यर्थेन सहैक्यमापन्नं ब्रह्मैव स्यात्, 'विज्ञान- मानन्दं ब्रह्मे'ति च श्रुत्या ज्ञानानन्दात्मतया व्यवतिष्ठते । तेन यदिदमद्वैतज्ञानं श्रुत्या जनितं तद्विज्ञानाद्वैतात्मन्येव निविशते । भेद-प्रत्यक्ष से उसका बाध क्यों न हो ? उत्तर—अद्वैत-बुद्धि के स्वरूप का बाध अभिप्रेत है या विषय का ? यदि स्वरूप का बाध अभिप्रेत हो, तो उसे हम भी मानते ही हैं। यदि विषय का बाध कहें, तो वह 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इस श्रुति का विरोध होने से असङ्गत है । विषय के विरोध से ही बुद्धि बाध्य होती है । प्रकृत में अद्वैतरूप विषय बाधित नहीं है । अतः अविद्यमान ( स्वरूप से बाधित ) भी अद्वैत-बुद्धि विषय से अबाधित ही है । तस्मात् पारमार्थिक अद्वैतरूप शरण का अवलम्बनकर श्रुति उपजीव्य के बाध से किंचित् भी नहीं डरती; क्योंकि परमार्थतः भेदघटित बाध्य-बाधकभाव है ही नहीं। परमारथ अद्वैत की, शरण पाय श्रुति मान । भेद-बुद्धि उपजीव्य से, तनिक न डरती मान ॥ बृहदारण्यक ( १।४।२ ) श्रुति भी कहती है कि द्वितीय से भय होता है । प्रश्न—'एकमेवाद्वितीयम्' इस श्रुति से अद्वैत, 'ब्रह्मैवेदं सर्वम्' इस श्रुति से ब्रह्म और 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' इस श्रुति से विज्ञान तथा आनन्द ज्ञात होते हैं । इनका परस्पर विरोध होने से कुछ भी सिद्ध नहीं होगा । यदि श्रुति-प्रामाण्य से सभीकी सिद्धि हो, तो अद्वैत की ही हानि हो जायगी ? उत्तर—'एकमेवाद्वितीयम' इस श्रुति से बोधित अद्वैत 'ब्रह्मैवेदं सर्वम्' इस श्रुति के साथ एकवाक्यतापन्न होकर ब्रह्मरूप ही है। इसी तरह 'विज्ञान- मानन्दं ब्रह्म' इस श्रुति की एकवाक्यता से विज्ञान आनन्दरूप ही व्यवस्थित होता है । प्रश्न—श्रुतिजन्य विज्ञान का विषय होने से अद्वैत विज्ञानरूप नहीं है, क्योंकि स्वयं अपना विषय नहीं होता । उत्तर—वृत्तिरूप ज्ञान से भेद इष्ट ही है । अद्वैत वृत्ति-प्रतिबिम्बित आभास का विषय नहीं होता, किन्तु स्वयं आभास अद्वैतरूप :
८० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम ननु कथं तस्य श्रुत्या जन्यत्वमुपपद्यते ? सत्यम् ; एवं स्यात्, यदि तस्य पारमार्थिकी श्रुत्या जन्यताऽपि स्यात् । अविद्याव्यवस्थिता तु तज्जन्यता न पारमार्थिकेनाजन्यत्वेन विरुद्ध्यते । अत एव श्रुत्येदमेकं साध्यते । यत्तु तत्र यद्येकता भेदाभावः, यदि चैकत्व- संख्या, यदि वा ज्ञानात्मकत्वं, यदि वाऽन्य एवैकत्वनामा कश्चिदभेदापरपर्यायो धर्मस्तद्वत्त्वं बोध्यते । तच्चाद्वैतव्याघातकत्वान्न सेद्धुं शक्नोति, तदा तदपि निष्पीडन- मसहमानं तज्ज्ञानं श्रुतिजन्यत्वेन सहैव निवर्त्तताम् । यत्तु तादृशस्याद्वैतस्य धर्मस्य धर्मितया प्रमितं तन्मात्रमबाधादधिगतं परमार्थतो व्यवतिष्ठताम् । न हि परमार्थशुक्तौ रजततया प्रतीयते यदा, तदा बाधात्तत्र रजतत्वे व्यावर्तमाने धर्मिव्यक्तिरपि तदपराधान्निवर्तते । हो जाता है । यदि ऐसा न मानें, तो 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' इत्यादि श्रुति का विरोध हो जायगा । प्रश्न—अद्वैत ( ब्रह्म ) नित्य है और श्रौत-बोध जन्य है । अतः श्रौत-बोध ( विज्ञान ) अद्वैतरूप नहीं है । अन्यथा विज्ञान श्रुतिजन्य नहीं होगा, क्योंकि जन्यत्व-अजन्यत्वरूप दो विरुद्ध धर्मों का एकत्र समावेश अनुचित है ? उत्तर—श्रौत-बोध ( विज्ञान ) जन्य नहीं, नित्य है; अतः अद्वैतरूप है । फिर भी वृत्तिरूप उपाधि के जन्य होने से उसमें जन्यत्व का व्यवहार होता है । जैसे आकाश के नित्य होने पर भी घट, पट आदि उपाधियों के अनित्य होने से घटाद्यव- च्छिन्न आकाश में अनित्यत्व का व्यवहार होता है । प्रश्न—'एकमेवाद्वितीयम्' इत्यादि श्रुतिजन्य बोध में ब्रह्म में विशेषण रूप से एकत्व भी भासता है । अतः ब्रह्म में एकत्व की भी सिद्धि हुई, तब अद्वैत सिद्ध कैसे हुआ ? उत्तर—श्रुति से एकत्वादि धर्मों से शून्य केवल धर्मिरूप अद्वैत ही सिद्ध होता है । यदि उस धर्मी में श्रुति से अभेदापरपर्याय भेदाभाव, एकत्वसंख्या, ज्ञान या कोई ही अन्य एकत्वरूप धर्मवत्त्व बोधित होता हो और वह अद्वैत का व्याघात होने से सिद्ध न हो रहा हो, तो एकत्वादि भी व्याघात न सहते हुए जन्यत्व के साथ ही निवृत्त हो जायँ । जो उस अद्वैत-धर्म ( एकत्व ) का धर्मी रूप से बोधित हो, अबाध से ज्ञात वही परमार्थतः व्यवस्थित हो । जहाँ परमार्थ शुक्ति रजतत्व रूप से ज्ञात होती है, वहाँ
परिच्छेद ] भेद-खण्डन ८१ सेयमद्वैतबुद्धिर्न तर्कशतमवतार्य प्राज्ञैरपनेया । यदाह श्रुतिः—‘नैषा तर्केण मतिरापनेये’ति । तस्मात्— 'धीधनाः ! बाधनायास्यास्तदा प्रज्ञां प्रयच्छथ । क्षेप्तुं चिन्तामणिं पाणिलब्धमब्धौ यदिच्छथ ॥' सेयमद्वैतदृष्टिर्दृष्टार्थाऽपि । यदाहुः—‘स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्’ । तस्मात् — 'ईश्वरानुग्रहादेषा पुंसामद्वैतवासना । महाभयकृतत्राणा द्वित्राणां यदि जायते ॥' तस्मात्— ‘आपाततो यदिदमद्वयवादिनीनामद्वैतमाकलितमर्थतया श्रुतीनाम् । तत् स्वप्रकाशपरमार्थचिदेव भूत्वा निष्पीडितादहह ! निर्वहते विचारात् ॥’ रजतत्व की निवृत्ति होने पर रजतत्वधर्म में आरोपकूप अपराध होने से, परमार्थ शुक्ति भी निवृत्त नहीं होती । तस्मात् प्राज्ञवर्ग ! आप इस अद्वैत-बुद्धि का अनेक कुतर्कों का अवलम्बन कर खण्डन न करें । क्योंकि कठ श्रुति ( २।३ ) में लिखा है कि श्रुति से जायमान अद्वैत-बुद्धि तर्क से खण्डनीय नहीं है । इसलिए बुद्धिमानो ! इस अद्वैत-बुद्धि का कुतर्क से बाधन करने की इच्छा तब कीजिये, जब कि हाथ लगे चिन्तामणि को समुद्रमें फेंक देने की इच्छा रखते हों । धीधन ! तब अद्वैत के, बोध चहहु तूं बाध । जब चिन्तामणि रत्न को, गेरन वारिध साध ॥ इस अद्वैत-बुद्धि का मोक्षरूप अदृष्ट फल तो है ही, परन्तु जीवन्मुक्ति में अनुभवनीय आनन्द, शोक-निवृत्ति, अभय, संतोषादि दृष्ट प्रयोजन भी हैं । भगवद्गीता में भी ( २ । ४ ) कहा है कि स्वल्प भी ( आपाततः उत्पन्न ) अद्वैत-बोध महान् भय, शोक आदि दुःखों से रक्षा करता है । यह अद्वैत-बुद्धि दुष्प्राप्य, बहु- विघ्नों से युक्त तथा अतिसूक्ष्म है । अतः परमेश्वर की कृपा से महाभयों से त्राण करनेवाली यह अद्वैत-वासना दो या तीन मनुष्यों के ही हृदय में प्रादुर्भूत होती है । ईश-कृपा से होत है, तीन दोय हिय मांहि । अद्वय की शुभ-वासना, जिसमें भय कुछ नाहिं ॥ हर्ष है कि अतिसूक्ष्म होने से अद्वैत-बोधक श्रुतियों द्वारा परोक्षरूप से ज्ञात ११
८२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तदिदमेताभिरात्ममतसिद्धसद्युक्तिकलक्षणोपपन्नाभिः युक्तिभिरुपनीयमानमद्वैत- मविद्याविलासलालसोऽपि श्रद्दधातु तावद्भवान् । तदनु च अनयैवोपनिषदर्थ- श्रद्धया अध्यात्मं जिज्ञासमानः परमार्थतत्त्वं क्रमात् वृत्तिव्यावृत्तचेताः स्वप्रकाश- सात्त्विकं माक्षिकरसातिशायि स्वात्मनैव साक्षात्करिष्यति । यथा च परिहृतचापलमात्मतत्त्वामृतसरसि निमज्य रञ्जयति निरायासमेव मानसम्, तथाऽहमकथयं नैषधचरितस्य परमपुरुषस्तुतौ सर्ग इत्येषा दिक् । अथ प्रयोजनप्रतिपादनम् 'अभीष्टसिद्धावपि खण्डनानामखण्डिराज्ञामिव नैवमाज्ञा । तत्तानि कस्मान्न यथाऽभिलाषं सैद्धान्तिकेऽप्यध्वनि योजयध्वम् ॥' अद्वयरूप अर्थ शुद्धविचार से स्वप्रकाश आनन्दरूप होकर अपरोक्ष रूप से अपने आप प्रादुर्भूत होता है । जो आपात से होत है; श्रुति से अद्वय-बोध । वह विचार से होत है, सच्चित आत्म बे-रोध ॥ युक्ति परार्थानुमानरूप है । अतः स्वबुद्धिसिद्ध युक्तियों के लक्षणों से युक्त मेरी इन पूर्वोक्त युक्तियों से ज्ञानविषय इस अद्वैत में अविद्याविलास ( भेदवाद ) में लालसावाले भी आप प्रथम श्रद्धा करें । तत्पश्चात् इसी उपनिषदर्थ ( ब्रह्म ) की श्रद्धा तथा आत्मविषयक जिज्ञासा से युक्त एवं धीरे-धीरे विषयों से व्यावृत्तचित्त आप मधु से भी मिष्ट और स्वप्रकाश अद्वैतरूप परमार्थ का स्वयं साक्षात्कार करेंगे । जिन साधनों से चपलता छोड़कर आपका चित्त बिना परिश्रम के आत्मतत्त्वरूप अमृत-सरोवर में निमग्न हो परमानन्द प्राप्त करेगा, भक्ति, अभ्यास, वैराग्य आदि उन साधनों को 'नैषधचरित' के परमपुरुष सर्ग में कहा गया है । यह तो अद्वैतसिद्धि का संकेतमात्र है । प्रयोजन-प्रतिपादन प्रश्न—इस प्रकार द्वैत-निवृत्ति द्वारा अद्वैत की सिद्धिमात्र में खण्डन-युक्तियों की उपकारकता है । इसलिए यह मुमुक्षुमात्र के लिए ग्राह्य है, केवल विजिगीषुओं के के लिए नहीं—यदि ऐसा ही मान लें, तो 'लोकेषु दिग्विजय-कौतुकमातनुध्वम्' इस प्रतिज्ञा के साथ विरोध हो जायगा ।
परिच्छेद ] योजन-प्रतिपादन ८३ तदेतादृशीषु सर्वासपि दर्शनस्थितिषु काममास्माकीनाः खण्डनयुक्तयः प्रगल्भन्ते, यासामीश्वरपरवशां ^१विश्वव्यवस्थामनास्थाय निरसनमशक्यं तासा- मेवावतारणार्थमयं ^२प्रावादुकप्रवादोपन्यासः। तथाहि—यदि शून्यवादानिर्वचनीय- पक्षयोराश्रयणम्, तदा तावदमूषां निराबाधैव सार्वपथीनता। यदि तु प्रमाणादिसत्ताभ्युपगन्तुमतावलम्बनम्, तदाऽपि लक्षणखण्डनयुक्तीनां उत्तर—यथार्थ में हमने अद्वैत-सिद्धि के लिए ही खण्डन-युक्तियाँ कही हैं। फिर भी आप लोगों की अभीष्ट-सिद्धि में (शब्द के नित्यत्व, अनित्यत्वादि के व्यवस्थापन में) भी राजाओं के तुल्य इन खण्डन-युक्तियों की आज्ञा का खण्डन (निवारण) नहीं किया है। अतः आप लोग अपनी-अपनी अभिलाषा के अनुसार तत्-तत् सिद्धान्त की सिद्धि या खण्डन में इन खण्डन-युक्तियों की योजना करें । यद्यपि खण्डन-युक्ति का, अद्वय-सिद्धि-नियोग । तदपि निज सिद्धान्त में, सब कर सकते योग ॥ इन खण्डन-युक्तियों का तत्-तत् सिद्धान्त की सिद्धि के लिए निवारण नहीं किया गया है। अतः सब सिद्धान्त माननेवाले दर्शनों के [ पर-सिद्धान्तों के खण्डन द्वारा ] स्थापन में हमारी खण्डन-युक्तियाँ यथेष्ट समर्थ हैं। जिन खण्डन-युक्तियों का ईश्वर (राजा) के अधीन विश्व-व्यवस्थापक आज्ञा के बिना निवारण नहीं हो सकता, उन्हींके अवतरण के लिए इस उद्धत ग्रन्थ का निर्माण किया गया है। देखिये, यदि आप शून्यवाद या अनिर्वचनीयवाद का आश्रयण करें, तब तो इन खण्डन-युक्तियों का सर्वत्र उपकार निर्बाध ही है। क्योंकि इन मतों में स्वमत का स्थापन तो करना है ही नहीं, केवल परमत का खण्डन ही करना है और परमत के खण्डन में खण्डन- युक्तियाँ सार्वपथीन (बेरोक) हैं । यदि प्रमाण की सत्ता माननेवाले नैयायिक, मीमांसक आदि के मतों का आश्रयण करें, तो लक्षण-विशेष के खण्डन की युक्तियों की लक्षण-विशेष के खण्डन में उपकारकता है और लक्ष्य-विशेष की खण्डन-युक्तियों का तद्विषयक १. विश्वं व्यवस्थाप्यते = नियम्यते, अनया = दण्डधारयेति; राजाधीन-दण्डेनेत्यर्थः । २. प्रावादुकः = उद्धतः, अयम् = खण्डनग्रन्थः, तस्य उपन्यासः = निर्माणम् ।
८४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
लक्षणविशेषखण्डने लक्ष्यखण्डनयुक्तीनां च तद्विषयप्रमाणादिविशेषखण्डने प्रत्येकं तात्पर्यम् । न च सूत्रादिलक्षणखण्डने१ अपसिद्धान्तापत्तिः ; तादृश्याः सूत्रादिव्याख्यायाः खण्ड्यमानत्वात् । न च वाच्यं लक्षणविशेषवस्तुव्यवस्थापकप्रमाणविशेषसूत्रादि- व्याख्याविशेषखण्डनपरत्वेन लक्षणान्तरं प्रमाणान्तरं व्याख्यान्तरं च वाच्यं प्रसज्येत भवतोऽपीति ; वितण्डाकथाम्बालम्ब्य खण्डनानां वक्तव्यत्वात् । तत्र च व्यावृत्य स्वपक्षनिर्वाहं प्रति पर्यनुयोगानवकाशात् । एवं च सति वादिदर्शनमाश्रित्यापि खण्डनप्रयोगो निर्बाध एव, एकदेशिवत्
प्रमाण-विशेष के खण्डन में तात्पर्य है । जैसे भेद के अनिर्वचनीयत्व से बाधितविषयक होने से अनुपलब्धि प्रमाण खण्डित हो जाता है । प्रश्न—गौतमादि के सूत्रों में उक्त लक्षणों का खण्डन करने से अपसिद्धान्त हो जायगा ? उत्तर—सूत्र के व्याख्याविशेष का खण्डन होने पर भी उसकी अन्य व्याख्या की सम्भावना से अपसिद्धान्त नहीं होगा । प्रश्न—लक्षण-विशेष, वस्तु के साधक प्रमाण-विशेष तथा सूत्र के व्याख्या- विशेष के खण्डनपरक अन्य प्रमाण और सूत्र की अन्य व्याख्या तो आपको भी कहनी पड़ेगी ? उत्तर—वितण्डारूप कथा का आश्रयण करके ही खण्डन-युक्तियों का उपन्यास किया गया है । वितण्डा में परमत-खण्डन को छोड़ स्वमत के स्थापन का आग्रह ही नहीं होता । इस प्रकार जब स्वमत-स्थापन में आग्रह है ही नहीं, तब वादी की दर्शन-मीमांसा आदि का आश्रयण करके भी खण्डन-युक्तियों का प्रयोग हो सकता है । क्योंकि मीमांसक- सामान्य मत के एकदेशी ( मीमांसक-विशेष ) प्रभाकर के तुल्य एक दर्शन का आश्रयण करके भी परस्पर खण्डन-प्रयोग हो सकता है । अथवा जैसे सभी वैयाकरण गोशब्द आदि की सिद्धि को तुल्यरूप मानकर भी दूसरे को तत्त्वज्ञान कराने के
१. प्रश्न—गौतमसूत्रस्थ प्रत्यक्षलक्षण के खण्डन से मीमांसकों को अपसिद्धान्त नहीं हो सकता, क्योंकि वे उन्हें प्रमाण नहीं मानते । अन्यथा न्यायाभिमत शब्दानित्यत्व भी न मानने से मीमांसकों को अपसिद्धान्त हो जायगा ? उत्तर—यहाँ इस शङ्का-समाधान का उल्लेख लेखक-प्रमाद से हुआ है । वस्तुतः ग्रन्थकार के अनुसार इसका लेख 'समानपक्षस्थित्याऽपि······ सम्भवात्' इसके आगे होना चाहिए ।
परिच्छेद ] प्रयोजन-प्रतिपादन ८५ प्रत्यवस्थातुं शक्यत्वात् । वैयाकरणानामिव च शब्दसिद्धिप्रश्नस्य परकीयतत्त्वज्ञान- निरूपणार्थं समानपक्षस्थित्याऽपि पर्यनुयोगसांव्यवहारिकतायाः संभवात् । वस्तुस्थितिं कुर्वाणेन च विचारकेणावश्यमेता युक्तय उद्धरणीयाः । अन्यथा वस्तुस्थितेरशक्यत्वादिति वादेऽपि प्रयोगः संभवत्येव खण्डनयुक्तीनाम् । जल्पस्त्वेका कथा न संभवत्येवाऽसामयिकी, वितण्डाद्वयशरीरत्वात् । अन्यथा जल्पद्वयेनापि किमित्येका कथा न कल्प्यते । अवोचाम च जल्पविचारप्रस्तावे विस्तरेणैतदिति । लिए परस्पर प्रश्न किया करते हैं, वैसे ही समान पक्ष में भी प्रश्न तथा खण्डन-युक्तियों का प्रयोग हो सकता है । तत्त्व का निश्चय करनेवाले परीक्षकों को तो अवश्य ही इन खण्डन-युक्तियों का आश्रयण करना चाहिए । क्योंकि जबतक खण्डन-युक्तियों से परमत का खण्डन न हो, तबतक तत्त्व का निश्चय हो ही नहीं सकता । इसलिए वाद में भी खण्डन- युक्तियों का प्रयोग हो सकता है । प्रश्न—जल्प में स्वपक्ष का स्थापन अवश्य करना पड़ता है, किन्तु खण्डन-युक्तियाँ खण्डनमात्र में प्रगल्भ और स्थापन में तो मूक हैं । इसलिए जल्प में इन खण्डन-युक्तियों से उपकार कैसे होगा ? उत्तर—जल्प तो कोई एक अलग कथा है ही नहीं; क्योंकि उसके शरीर में दो वितण्डाएँ प्रविष्ट हैं । अर्थात् एक ने स्वपक्ष का स्थापन किया और अन्य ने उसके पक्ष को दूषित किया, यह एक वितण्डा हुई तथा अन्य ने स्वपक्ष का स्थापन किया और प्रथम ने उसके पक्ष का खण्डन किया, यह दूसरी वितण्डा हुई । इस तरह दो वितण्डाएँ मिलकर एक जल्प होता है, अतः वह कथान्तर ही नहीं है । किञ्च—जल्प सर्वशास्त्रों के सिद्धान्त से सिद्ध भी नहीं है, केवल नैयायिकों के संकेत से ही कल्पित है । अन्यथा यदि दो वितण्डाओं को मिलाकर 'जल्प' नामक अलग कथा मानी जाय, तो दो जल्पों को मिलाकर चौथी भी एक अलग कथा क्यों नहीं मानते । अर्थात् स्वपक्ष-द्वय का स्थापन और परपक्ष-द्वय का खण्डन-स्वरूप एक कथान्तर भी जल्प के तुल्य हो सकता है, फिर वह भी अलग कथा क्यों न मानी जाय ? प्रश्न—यदि जल्प वितण्डा-द्वय-शरीर होने से कथान्तर नहीं है, तो वाद भी वितण्डा-द्वय-शरीर होने से अलग कथा नहीं कहलायेगा । एकमात्र वितण्डा ही कथा कहलायेगी ? उत्तर—वाद और जल्प-वितण्डा में फल-भेद है । अर्थात् वाद का फल
९६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम जल्पकथायाऽपि चाभिधाने स्वपक्षे व्यावर्य्य सदोषस्यापि प्रमाणतया अभिधानं कृत्वा तद्दोषोद्भावनकारी कामपि खण्डनयुक्तिमवतार्य बाधनीय इति जल्पेऽपि नात्यन्तमनवकाशाः खण्डनयुक्तयः । अथ सामान्य-खण्डन-युक्तयः कीदृश्यः पुनस्ताः ? उच्यन्ते । तथाहि—लक्षणाधीना तावल्लक्ष्यव्यवस्थितिः, लक्षणानि चानुपपन्नानि, ज्ञाताधिकरणादिलक्षणनिरूपणद्वारेण चक्राकाद्यापत्तेः । तत्त्व-निर्णय है और जल्प-वितण्डा दोनों का विजयरूप एक फल। अतएव वह अन्य कथा है। किन्तु जल्प और वितण्डा में तो फल-भेद भी नहीं है, अतः जल्प का वितण्डा में अन्तर्भाव हो जाता है—वह अन्य कथा नहीं है। ये सब बातें हम 'ईश्वरमभिसन्धि' नामक ग्रन्थ में जल्प-विचार के प्रस्ताव में कह चुके हैं। प्रश्न—राम-रावण-युद्ध की तरह स्वपक्ष-रक्षण तथा परपक्ष-खण्डनरूप जल्प-कथा भी अनुभवसिद्ध ही है; क्योंकि शास्त्रार्थ भी वाग्युद्ध ही है। अतः उसका वितण्डा में अन्तर्भाव नहीं हो सकता । उस जल्प में खण्डन-युक्तियों की उपकारकता नहीं है, अतः सर्वत्र खण्डन-युक्तियों की उपकारकता सिद्ध नहीं हुई ? उत्तर—जल्प-कथा का पुरस्कारकर अभिधान करें, तो भी स-दोष प्रमाण का भी निर्दुष्टवत् अभिधान करते हुए किसी खण्डन-युक्ति का अवतारणकर स्वपक्ष में दोष के उद्भावनकारी वादी के पक्ष का बाध हो सकता है। तात्पर्य यह है कि प्रतिपक्षी के अपने पक्ष में दूषण देने के बाद अपना पक्ष स्थापन करने के लिए सद्धेतु ध्यान में न आये, तो सदोष भी प्रमाण निर्दुष्टवत् उपस्थितकर वह प्रतिपक्षी द्वारा दिये गये दोषों का निराकरण इन खण्डन-युक्तियों से कर ही सकता है। इस तरह जल्प में भी खण्डन-युक्तियों का अत्यन्त अनवकाश नहीं है। सामान्य-खण्डन की युक्तियाँ निर्वचनकर्ता—वे खण्डन-युक्तियाँ कैसी हैं ? खंडनकर्ता--वे युक्तियाँ कही जाती हैं। सुनिये, लक्ष्य का निश्चय लक्षण के अधीन होता है और लक्षणमात्र ही अनुपपन्न हैं। क्योंकि वे ज्ञान, अधिकरण आदि के लक्षण-निरूपण द्वारा चक्रक आदि दोषों से ग्रस्त हैं। अर्थात् ज्ञात (ज्ञान-विषय) ही लक्षण लक्ष्यव्यवहार तथा इतर-व्यावृत्तिरूप प्रयोजन सिद्ध कर सकते हैं, अज्ञात नहीं। यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि 'वह ज्ञान कौन-सी वस्तु है ?' इस पर यदि यह उत्तर दिया जाय कि ज्ञानत्व-युक्त ज्ञान है;
[२च्छेद ] प्रमा-लक्षण में तत्त्वपदार्थ-खण्डन ८७ अथ प्रमालक्षणे तत्त्वपदार्थखण्डनम् तेषु तावत् 'तत्त्वानुभूतिः प्रमा' इत्यप्ययुक्तम्; तत्त्वशब्दार्थस्य निर्वक्तुमशक्य- त्वात् । तस्य भावो हि तत्त्वमुच्यते, प्रकृतं च तच्छब्दार्थः । न चात्र प्रकृतं किंचिदस्ति यत् तच्छब्देन परामृश्यते । अथ अनुभूत्या स्वसंबन्धिविषय आक्षेपाद् बुद्धिस्थः कार्यते, स तच्छब्देन परामृश्यते, वक्तृश्रोतृबुद्धिस्थतायामेव प्रकरणपदार्थविश्रामात् । तेन यस्यार्थस्य यो भावः, तत् तस्य तत्त्वमुच्यत इति । तो पूछा जायगा—'वह ज्ञानत्व ही क्या है ?' इसपर यदि 'सुखादि में अवृत्ति और आत्मा के विशेषगुण में वृत्ति जाति-विशेष ज्ञानत्व है' यह उत्तर हो, तो फिर प्रश्न होगा कि 'वह जाति ही क्या है ?' इसपर 'अनुगत-प्रत्यय ( एकाकारक ज्ञान ) का हेतु जाति है' यह उत्तर है । यहाँ ज्ञान की सिद्धि होने पर जाति की सिद्धि, जाति की सिद्धि होने पर ज्ञानत्व की सिद्धि और ज्ञानत्व की सिद्धि होने पर ज्ञान की सिद्धि—इस तरह चक्रक; ज्ञान की सिद्धि होने पर ज्ञानत्व की सिद्धि तथा ज्ञानत्व की सिद्धि होने पर ज्ञान की सिद्धि—इस तरह अन्योन्याश्रय तथा ज्ञान की सिद्धि होने पर ज्ञान की सिद्धि—इस तरह आत्माश्रय, ये तीनों दोष हो जायेंगे । किञ्च—लक्षण लक्ष्यरूपी अधिकरण में ज्ञात होने पर ही व्यवहार का साधक होता है । यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि अधिकरण क्या है ? इसका उत्तर है—"इह' इत्याकारक ज्ञान का विषय अधिकरण है ।" इस उत्तर के अनन्तर 'ज्ञान क्या है ?' इस प्रश्न पर 'ज्ञानत्वयुक्त ज्ञान है' यह उत्तर है । इस उत्तर के अनन्तर 'ज्ञानत्व क्या है ?' इस प्रश्न पर 'सुखादि में अवृत्ति तथा आत्मवृत्ति-विशेषगुणवृत्ति जाति-विशेष ज्ञानत्व है' यह उत्तर है । इस उत्तर के अनन्तर 'आत्मा क्या है ?' इस प्रश्न पर 'ज्ञान का अधिकरण आत्मा है' यह उत्तर होगा । इस रीति से एक लक्षण को दूसरे लक्षण की अपेक्षा होने से चक्रक आदि दोष हो जायेंगे । प्रमा-लक्षण में 'तत्त्व'-पदार्थ-खण्डन उन लक्षणों में प्रथम 'तत्त्वानुभूतिः प्रमा' यह लक्षण 'तत्त्व' शब्द के अर्थ का निर्वचन न हो सकने से अयुक्त है । क्योंकि तत् के भाव को 'तत्त्व' कहते हैं । तत्शब्द का अर्थ 'प्रकृत' है । 'तत्त्वानुभूतिः प्रमा' यह लक्षण न्यायाचार्य शिवादित्य मिश्रकृत 'लक्षण- माला' का प्रथम लक्षण है । अतः यहाँ प्रकृत कोई है नहीं, जो तत्-शब्दसे परामृष्ट हो । निर्वचनकर्ता—अनुभव ( ज्ञान ) नियमतः सविषयक होता है, अतः अनुभव से
८८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम न; अरजतादेरपि रजताद्यात्मना अनुभूतिविषयतासंभवात् असत्यानुभूत्य- व्यवच्छेदात् भवितुरतत्वशब्दार्थत्वप्रसङ्गेन धर्म्यंशे विशिष्टे च प्रमाया अप्रमात्वापातात् । अथोच्यते—अवयवार्थचिन्तया दूषणाभिधानमिदं त्यज्यताम्, यतोऽयं तत्त्वशब्दः स्वरूपमात्रवचन इति । एतदप्ययुक्तम्; स्वरूपत्वस्य जातेरुपाधेर्वा स्वात्मनि वृत्त्यवृत्तिभ्यामनुपपत्तेः, स्वरूपशब्दार्थस्यैकस्यासम्भवेन प्रतिविषयन्या- वृत्त्या लक्षणस्याव्यापकत्वापातात् । कथञ्च तत्त्वेति विपर्यासादेर्निरासः । तथा हि-शुक्तौ यो ‘रजतमि’ति प्रत्ययः, सोऽपि स्वरूपबुद्धिर्भवत्येव । न हि धर्मी वा रजतत्वं वा न स्वरूपम्, नापि तयोः प्रतिभासमानः सम्बन्धो न स्वरूपमिति युक्तम्; समवायो हि तयोः सम्बन्धः प्रतिभाति, स च स्वरूपमेव । विषय का आक्षेप होगा और वही विषय तत्-शब्द से परामृष्ट होगा । वक्ता तथा श्रोता की बुद्धि का विषय ही 'प्रकरण' पद का वाच्य है । अतः जिस अर्थ का जो भाव है, वही उसका तत्त्व है । खण्डनकर्ता—शुक्ति में 'इदं रजतम्' इत्याकारक भ्रम भी रजतत्वरूप तत्त्वविषयक है । अतः वहाँ प्रमा के लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । धर्मी तत्त्व नहीं है, अतः धर्मी-अंश तथा विशिष्ट अंश में ( प्रमा में ) भी प्रमा-लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । निर्वचनकर्ता—'तत्त्व' शब्द स्वरूप में रूढ़ है; अतः अवयवार्थ के अनुरोध से दोष देना अनुचित है । उसे रूढ़ि मानने में धर्म, धर्मी, सम्बन्ध—सभी के स्वरूपरूप होने से धर्मी तथा विशिष्टांश में अव्याप्ति नहीं है । खण्डनकर्ता—स्वरूपत्व में स्वरूपत्व रहता है या नहीं ? यदि रहता है, तो स्व में स्व का वृत्तित्व होने से आत्माश्रय दोष है । यदि नहीं रहता, तो स्वरूपत्व से रहित होने से वह स्वरूप नहीं हुआ, क्योंकि स्वरूपत्वविशिष्ट को ही स्वरूप कहते हैं । अतः स्वरूपत्व-प्रमा में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—तत्त्व-विशेषण से 'इदं रजतम्' इस भ्रम में प्रमा-लक्षण की अतिव्याप्ति का वारण कैसे होगा ? देखिये, शुक्ति में जो रजतत्वबुद्धि है, वह भी स्वरूप की बुद्धि ही है । क्योंकि धर्मी तथा रजतत्व स्वरूप ही हैं और उन दोनों का प्रतिभासमान सम्बन्ध ( समवाय ) भी स्वरूप ही है । निर्वचनकर्ता—रजतत्व-समवाय स्वरूप है सही, किन्तु वह रजत में है, शुक्ति में
परिच्छेद ] प्रमा-लक्षण में तत्त्वपदार्थ-खण्डन ८६ सत्यम्, समवायः स्वरूपम् । स एव तु शुक्तिव्यक्तौ रजतत्वस्य नास्तीति चेत् । मैवम्; तत्र नास्तित्वेऽपि स्वरूपताया अन्यावृत्तेः । न हि गृहे देवदत्तो नास्तीति स्वरूपं न स्यात् । न स्वरूपमात्रं तत्त्वमुच्यते, किन्तु यद्देशकालसम्बन्धि यत्स्वरूपं प्रतीत तस्य तद्देशकालसम्बन्धि स्वरूपं तत्त्वमुच्यत इति चेत् । मैवम् ; देशकालसम्बन्धांशे प्रमाया अप्रमात्वापातात् तयोः स्वरूपमेव तत्त्वशब्दार्थ इति चेन्न । तत्त्व- पदस्यानेकार्थत्वे लक्षणाव्यापकत्वापत्तेः । अथैवं ब्रूषे—यद्यथाभूतं प्रतीयते तत्तथा परमार्थतो व्यवस्थितं तत्त्वमुच्यते । नैतदपि युक्तम् ; यद्यथाभूतं प्रतीयते, तद्यदि प्रतीतिसमयमपहाय कालान्तरे नहीं, क्योंकि शुक्ति में रजतत्व का सम्बन्ध अविद्यमान है। खंडनकर्ता—शुक्ति में अविद्यमान होने पर भी रजतत्व का समवाय स्वरूप ही है। क्योंकि घर में अविद्यमान भी देवदत्त स्वरूप ही है। अर्थात् स्वरूपत्व में विद्यमानत्व हेतु ( साधक ) नहीं है। यदि विद्यमानत्व को साधक मानें, तो घर में अविद्यमान देवदत्त स्वरूप न कहलायेगा । निर्वचनकर्ता—केवल 'स्वरूप' तत्त्व नहीं है; किन्तु जिस देश तथा काल से सम्बद्ध जो प्रतीत होता हो, उस देश तथा काल से सम्बद्ध स्वरूप ही तत्त्व है। खंडनकर्ता—देश-काल में देश-काल का सम्बन्ध नहीं रहता। अतः देश-काल के स्वरूपों के तत्त्व न होने से देश तथा काल की प्रमा में प्रमा-लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी। निर्वचनकर्ता—अन्यत्र तो देश-काल से सम्बद्ध स्वरूप ही तत्त्व है, तथापि देश- कालस्थलमें केवल स्वरूप ही तत्त्व है। खंडनकर्ता—देश-स्वरूप, काल-स्वरूप तथा देश-कालसम्बद्ध स्वरूप, इनमें प्रत्येक को समुदित रूप से 'तत्त्व'पदवाच्य मानें, तो लक्षण का अनुगम नहीं होगा। यदि प्रत्येक को वाच्य मानें, तो समुदाय में और समुदाय को वाच्य मानें तो प्रत्येक में अव्याप्ति हो जायगी। निर्वचनकर्ता—जो स्वरूप यद्धर्म-विशिष्ट ( जैसा ) प्रतीत होता हो, यदि उस धर्म से विशिष्ट हो, तो वह 'तत्त्व' कहा जाता है। खंडनकर्ता—तद्धर्मवैशिष्ट्य का यह ज्ञान प्रमाण से ही होगा और 'प्रमाण' प्रमिति के करण को कहते हैं। तब तो प्रमा की सिद्धि होने पर प्रमाण की सिद्धि और प्रमाण की सिद्धि होने पर तद्धर्म के निश्चय- द्वारा प्रमा की सिद्धि—इस प्रकार अन्योन्याश्रय आदि दोष हो जायेंगे । १२
६० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तथाभूतं स्यात्तदाऽप्येवं तत्त्वं स्यादेवेति भाविपाकजरागः कुम्भः श्यामदशायामपि रक्तपित्तिना रक्ततयोपलभ्यमानस्तत्त्वं स्यादिति तद्बुद्धेः प्रमात्वापातः । यदा तदेति विशेषणप्रक्षेपेण च कालविशिष्टताप्रतीतेरप्रमात्वापातो न हि कालवैशिष्ट्येऽपि कालान्तरसम्बन्धः सम्भवी । अन्योपाध्यवच्छिन्नः सोऽन्योपाध्यवच्छिन्नेन सम्बन्त्स्यतीति चेत् ; तर्हि दण्ड्यपि देवदत्तः कुण्डलिनं स्वमारोचयत्येव । उपाधिभेदेऽप्युपधेयस्य एकत्वानिवृत्ते- नैवमिति चेत्, तुल्यम् । किञ्च—जो स्वरूप यद्धर्मविशिष्ट प्रतीत होता हो, यदि वह प्रतीति-काल से अन्य काल में भी तद्धर्मविशिष्ट हो, तो वह तत्त्व ही कहा जायगा । तब तो जो अपक्व श्यामघट पाकजन्य रक्तरूप से युक्त होनेवाला है, वह भी रक्त-पित्तरोग से ग्रस्त मनुष्य द्वारा रक्तत्वेन ज्ञात होने से तत्त्व हो जायगा । फलतः श्यामता-दशा में 'रक्तो घटः' यह बुद्धि भी प्रमा हो जायगी । निर्वचनकर्ता—जो यद्धर्मविशिष्ट जिस काल में प्रतीत हो, वह उस काल में यदि तद्धर्म-विशिष्ट हो, तभी 'तत्त्व' है । अतः भावी रक्तता-स्थल में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडनकर्ता—लक्षण में 'यदा', 'तदा' निवेश करने पर काल-अंश तथा काल के सम्बन्धांश में, काल का सम्बन्ध न होने से अव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि काल- सम्बन्ध में कालसम्बन्ध नहीं रहता । निर्वचनकर्ता—यद्यपि काल एक है, तथापि उसकी उपाधि ( सूर्य-क्रिया ) का भेद होने से एक उपाधि से युक्त काल का अन्य उपाधि से युक्त काल के साथ सम्बन्ध हो ही जायगा, जैसे कि संवत्सरावच्छिन्न काल का पक्षावच्छिन्न काल से और पक्षांवच्छिन्न काल का दिवसावच्छिन्न काल से सम्बन्ध होता है । खण्डनकर्ता—एक उपाधि से विशिष्ट काल अन्य उपाधि से विशिष्ट स्वात्मा (काल) से संबद्ध नहीं हो सकता, वस्तु होने से; जैसे देवदत्त अपने से विशिष्ट नहीं होता । अन्यथा दण्डी देवदत्त का कुण्डलीरूप स्व से आधाराधेयभाव सम्बन्ध होने लगेगा । निर्वचनकर्ता—दण्ड, कुण्डल आदि उपाधियों का भेद होने पर भी देवदत्त के एक होने से दण्डी देवदत्त कुण्डली देवदत्त से सम्बद्ध नहीं होता । खण्डनकर्ता—यह बात तो काल-स्थल में भी तुल्य है। अर्थात् सूर्य-क्रियारूप उपाधि का भेद होने पर भी काल एक ही है।
[परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन ६१
एतेन कारणं तत्त्वमित्यपि निरस्तम् । सर्वस्य तथात्वे प्रमित्यभावेन आत्मा- श्रयेण च प्रतिक्षणविशिष्टविश्वावश्यकारणत्वोपगमे दुरपवादार्थक्रियाकारित्वस्वरूप- सत्त्वलक्षणाङ्गीकारिजैनचरणशरणप्रवेशविडम्बनापादिदोषग्रासेन चेति । अनुभूतित्वजातिखण्डनम् किञ्च— इदमनुभूतित्वं नाम ? ज्ञानत्वावान्तरजातिभेदो वा, स्मृतिव्यतिरिक्त- निर्वचनकर्ता— हम कारण को ही 'तत्त्व' कहते हैं । खण्डनकर्ता— स्व में स्व का वृत्तित्व न होने से काल में नियत-प्राक्क्षणवृत्तित्वरूप कारणत्व नहीं है ; अतः काल की प्रमा में अव्याप्ति हो जायगी । निर्वचनकर्ता— यद्यपि अन्यत्र नियत-पूर्वकालवृत्तित्व ही कारणत्व है, तथापि कालस्थल में नियतपूर्वत्वमात्र कारणत्व है ; अतः काल की प्रमा में अव्याप्ति नहीं होगी । खण्डनकर्ता—अन्तिम कार्य तथा पारिमाण्डल्यादि किसीके कारण न होने से 'वस्तुमात्र कारण हैं' इसमें कोई प्रमाण नहीं । फलतः अन्त्य-कार्यादिविषयक प्रमा में अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—'कारणत्व से युक्त' को कारण कहते हैं। फिर यदि कारणत्व में उसी कारणत्व को मानें, तो आत्माश्रय होगा । यदि अन्य कारणत्व मानें, तो उस दूसरे कारणत्व में कौन-सा कारणत्व रहेगा ? यदि प्रथम कारणत्व रहेगा, तो अन्योन्याश्रय और यदि तृतीय कारणत्व मानें, तो उस तृतीय में चतुर्थ, चतुर्थ में पञ्चम एवं उत्तरोत्तर कारणत्व मानने से अनवस्था हो जायगी । यदि किसी कारणत्व में कारणत्व न मानें, तो वह कारण न होगा, अतः तत्कारणत्वविषयक प्रमा में अव्याप्ति सुस्थिर है । निर्वचनकर्ता— सभी भाव प्रतिक्षण परिणामी हैं, अतः पूर्व-क्षणविशिष्ट भाव उत्तरक्षणविशिष्ट भाव का कारण है । इसलिए सभी वस्तुओं के कारण हो जाने से कहीं भी अव्याप्ति नहीं होगी । खंडनकर्ता—क्षणिक विश्वमात्र को अवश्य कारण मानें, तो 'कारणत्व ही सत्त्व ( भाव ) का लक्षण है' ऐसा माननेवाले बौद्ध-मत का स्वीकार करना होगा । फलतः आप नैयायिक के लिए यह अपसिद्धान्त हो जायगा । अनुभूतित्व-जाति का खण्डन किञ्च—'अनुभूतित्व' क्या है ? क्या वह ज्ञानत्व-व्याप्य जाति है, स्मृतिसे भिन्न
६२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम ज्ञानत्वं वा, स्मृतिलक्षणरहितज्ञानत्वं वा, तदविदूरप्राक्कालोत्पत्तिनियतासाधारण- कारणकबुद्धित्वं वा ? न तावदाद्यः। तथाहि—अनुभूतित्वं नाम जातिरेकाऽभ्युपगम्येति कुतः ? 'अनुभवामी'ति प्रत्ययानुगमवशादिति चेन्न । माघमासीय निशावसाने सिता- सितसरित्सम्मेदस्नायिनः सत्यपि शब्दबलाद् भाविस्वकीयस्वर्गसुखसम्प्रत्यये 'सुखमनुभवामी'ति प्रतीत्यनुदयात्, प्रत्युत शीतसम्भूतवेदनासंवेदनादेव परस्त्रियञ्च सम्भुञ्जानस्य आस्तिककामुकस्य शब्दाधीने सत्यपि भाविनरकगमनानुभवनीय- यातनाधिगमे 'दुःखमनुभवामी'ति मतेरनुत्पत्तेः । प्रत्युत 'अमन्दमानन्दं संविदन् साम्प्रतमस्मी'ति प्रत्ययात् । ज्ञानत्व है या स्मृतित्वाभाववत् ज्ञानत्व है अथवा स्व से 'अव्यवहित पूर्वक्षण में होनेवाली उत्पत्ति से नियत (व्यापक) है असाधारण कारण जिसका, ऐसा बुद्धित्व है ? इनमें प्रथम पक्ष (ज्ञानत्व-व्याप्य जाति) युक्त नहीं; क्योंकि अनुभूतित्व-जाति में कोई प्रमाण नहीं है । निर्वचनकर्ता—प्रत्यक्ष, अनुमिति, उपमिति और शाब्द, इन चार प्रकार के ज्ञानों में 'अनुभवामि' इत्याकारक जो अनुगत प्रतीति होती है, वही अनुभूतित्वजाति में प्रमाण है । खण्डनकर्ता—माघमास में प्रातःकाल सिता (गङ्गा) और असिता (यमुना) इन दो नदियों के सङ्गम में स्नानकर्ता पुरुष को 'सिताऽसिते सरिते यत्र सङ्गते, तत्राऽऽप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति' इत्यादि श्रुति-शब्दों से भाविस्वर्ग-सुखविषयक शाब्दज्ञान होने पर भी उस ज्ञान में 'स्वर्गसुखमनुभवामि' ऐसी प्रतीति नहीं होती । प्रत्युत शीतस्पर्श के त्वाच-प्रत्यक्ष से जन्य दुःखानुभव का 'दुःखमनुभवामि' इत्याकारक अनुव्यवसाय ही होता है । इसी तरह परस्त्री के उपभोगकाल में आस्तिक कामुक को 'न परस्त्रियं गच्छेत्' इस आप्त-वाक्य से भावी दुःख का शाब्दज्ञान होने पर भी उसे 'दुःखमनुभवामि' ऐसा अनुभव नहीं होता, किन्तु 'पूर्ण सुख का अनुभव करता हूँ' ऐसा ही अनुव्यवसाय होता है । अतः प्रत्यक्षादि में अनुगत अनुभवत्व- जाति में कुछ प्रमाण नहीं है । १. प्रत्यक्ष, अनुमिति, उपमिति और शाब्दबोध के असाधारण कारण सन्निकर्ष, व्याप्ति- ज्ञान आदि अपने-अपने कार्य से अव्यवहित पूर्वक्षण में उत्पन्न होते हैं । पर स्मृति का असाधारण कारण संस्कार अपने कार्य (स्मृति) के अव्यवहित पूर्वक्षण में उत्पन्न नहीं होता ।
परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन ६३ यदि तु शब्दोपदर्शितव्याप्तिजमनुमानमनुभव एव स्यात्, तर्हि ‘सुखं दुःखं वाऽनुभवामी’ति तयोः प्रत्ययः स्यात् । अथ मन्यसे—साक्षात्कारमनुभवार्थमनुरुध्य तयोर्नैवमभिमन्यवहारौ शब्दजानुमानापेक्षौ तु विमर्शकस्य स्यातामेव ताविति । तर्हि साक्षात्कारिणि निर्वचनकर्ता—‘सिताऽसिते सरिते यत्र’ इत्यादि श्रुतिवाक्य से सितासिता-स्नान में सुख-साधनता का ही शाब्दबोध होता है । साधनता में सुख विशेषणरूप से भासता है । फलतः जैसे ‘पर्वतमनुभवामि’ ऐसा अनुव्यवसाय नहीं होता, वैसे ही प्रकृत में भी ‘सुखमनुभवामि’ ऐसा अनुव्यवसाय नहीं होता । किन्तु ‘सुखसाधनतामनुभवामि’ ऐसा ही अनुव्यवसाय होता है । अतः प्रकृत स्थल में ‘अनुभवामि’ इस ज्ञान के न होने पर भी अन्यत्र सभी शाब्दस्थलों में ‘अनुभवामि’ ऐसा ज्ञान होने के कारण अनुभूतित्वजाति में कोई बाधक नहीं है । खंडनकर्ता—उक्त श्रुतिवाक्य से ‘यत्र यत्र सितासिता-सम्भेदस्नानं, तत्र तत्र भावि सुखम्’ ऐसा व्याप्तिज्ञान होकर ‘अहं स्वर्गी भविष्यामि, सिताऽसिता-सम्भेद- स्नायित्वात्, इन्द्रादिवत्’ इत्यादि अनुमिति होने पर भी ‘अनुभवामि’ ऐसी प्रतीति नहीं होती । किन्तु स्नान-काल में ‘शीतदुःखमनुभवामि’ ऐसी ही प्रतीति होती है । हाँ, ‘भावि- सुखं शाब्दयामि या अनुमिनोमि’ ऐसा अनुव्यवसाय अवश्य होता है । यदि शाब्द-बोध या अनुमिति भी अनुभव है, तो ‘अनुभवामि’ इत्याकारक प्रत्यय अवश्य होना चाहिए । किन्तु होता नहीं, अतः अनुमान करना चाहिए कि शाब्द तथा अनुमिति अनुभूति नहीं हैं । निर्वचनकर्ता—उक्त स्थल में ‘अनुभव’ शब्द का अर्थ साक्षात्त्व-जाति ही मानते हैं । अतः शाब्द या अनुमिति में अनुभवत्वव्यवहार नहीं होता । यदि विचार किया जाय, तो प्रत्यक्ष, अनुमिति, उपमिति और शाब्दज्ञान में अनुभवत्वजाति होने से शाब्द तथा अनुमिति में भी अनुभवत्वव्यवहार होता ही है । खंडनकर्ता—यदि साक्षात्त्व को ज्ञान में अनुभव-शब्द के प्रयोग का कारण मानें, तो प्रत्यक्ष में अनुभवत्वजाति की सिद्धि नहीं होगी, क्योंकि वहाँ अनुभवत्वव्यवहार तो प्रत्यक्षत्व से ही हो जाता है । फिर प्रत्यक्ष में अनुभवत्व जाति रहती है, इसमें कोई प्रमाण नहीं । किञ्च—ऐसा मानने पर अनुभूतिशब्द के दो अर्थ हो जाने से अननुगम
६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम ज्ञानेऽनुभवप्रत्ययव्यवहारौ साक्षात्त्वनिबन्धनाविति तत्रानुभवत्वजातिकल्पनायां न प्रयोजनप्रमाणे इत्यनुभूत्यर्थभेदान्ल्लक्षणाननुगमो दोषः । अथ स्मृतिव्यावृत्तेन रूपेण यः प्रत्यक्षादिष्वनुभव इत्यनुगतावगमः, स साक्षात्कारित्त्वादनुपपन्नः । ततश्च साक्षात्कार्यसात्कारिविशेषसाधारणमनु- भूतित्वमन्यदेष्टव्यमित्युच्यते । तदपि न युक्तम्; पदार्थान्तरव्यावृत्तेन रूपेण यस्तदितरेष्वनुगतप्रत्ययस्तद्व्यवहारो वा, तत्र तदेव रूपं निमित्तम्, न तु जातिः काचित्तदनुरोधात्कल्प्यते । तथा सति अनक्षपदार्थेभ्यो घटादिभ्यो व्यावृत्तेन रूपेण विभीतकादिषु साम्यावगमादक्षत्त्वादिजातिः कल्प्या प्रसज्येत । इतोऽपि नानुभूतित्वं नाम स्मृतिव्यावृत्ता जातिः । तथाहि—'घटः स एवायम्'ति तावत्प्रत्यभिज्ञा जायते, सा किं स्मृत्यनुभवरूपं ज्ञानद्वयम्, एकमेव वा विज्ञानमंशे स्मृतिरंशे चानुभवः, उत स्मृतिरेव, आहोस्विद् अनुभव एव ? हो जायगा । प्रत्येक को अर्थ मानने पर समुदाय में और समुदाय को अर्थ मानने पर प्रत्येक में अव्याप्ति हो जायगी । निर्वचनकर्ता—प्रत्यक्षादि-चतुष्टय में होनेवाली 'स्मृतिभिन्नं ज्ञानम्' इत्याकारक अनुगतप्रतीति साक्षात्त्व-जाति से नहीं हो सकती । अतः उसके अनुरोध से अनुभूतित्व जाति माननी ही पड़ेगी । खंडनकर्ता—प्रत्यक्षादि-चतुष्टय में 'स्मृति-भिन्नम्' यह जो अनुगत प्रतीति होती है, उसमें स्मृतिभिन्न-ज्ञानत्व ही निमित्त है । अतः उसके अनुरोध से अनुभूतित्व जाति की कल्पना उचित नहीं । अन्यथा पाश्रा, विभीतक तथा इन्द्रिय आदि में भी 'अनक्ष-पदार्थभिन्नम्' इत्याकारक अनुगत प्रतीत होती है । इसलिए उसके अनुरोध से अक्षत्व-जाति भी मान ली जायगी । किञ्च—स्मृतित्व अनुभूतित्व को छोड़कर स्मृति में है, अनुभूतित्व स्मृतित्वको त्यागकर प्रत्यक्षादि चार में है और दोनों प्रत्यभिज्ञा में हैं, इस तरह सङ्कर-दोष होने से भी अनुभूतित्व जाति हो ही नहीं सकती । समर्थनकर्ता—प्रत्यभिज्ञा में अनुभूतित्व तथा स्मृतित्व दोनों हैं, इसमें प्रमाण न होने से सङ्कर नहीं है । फलतः अनुभूतित्व जाति हो ही सकती है । खंडनकर्ता—श्रवण कीजिये, 'स एव अयं घटः' यह जो प्रत्यभिज्ञा 'होती है, क्या वह स्मृति और अनुभव दो ज्ञान हैं अथवा एक ही ज्ञान ? या एक अंश में स्मृति और एक अंश में अनुभव है ? अथवा स्मृति ही है किंवा अनुभव ही ?
परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन ६५ आद्ये य एष प्रत्यभिज्ञायां प्रागवस्थाविशिष्टादिदन्ताविशिष्टस्याभेदः प्रकाशते, स स्मृतावन्तर्भावयितुमशक्यः, अननुभूतवस्त्वेन संस्कारानुपनेयत्वात् । अत एव न तृतीयोऽपि । नाप्यनुभवेऽन्तर्भावयितुमसौ शक्यः, प्रत्यभिज्ञान- कालेऽनुभवेन प्रागवस्थाया असंवेदनात् । संवेदने वाऽनुभव एवेति शेषपक्षेऽन्तर्भावः स्यात्, स चाग्रे दूषयिष्यते । अत एव न द्वितीयः । प्रागवस्थाविशिष्टाभिन्नत्वांशे अनुभवस्वीकारश्चेत् प्रागवस्थावैशिष्ट्यमप्यनुभवविषय एव निविष्टमिति चरमपक्षप्रवेशः । अथ प्रागवस्थाविशिष्टादभिन्न इत्ययमर्थोऽप्यनेकांशः, तत्र प्रागवस्थाविशिष्ट इत्यत्रांशे स्मृतित्वम्, अभिन्न इत्यत्रांशे चानुभवत्वमित्युच्यते । एवं तर्हि प्रागवस्था- विशिष्टः स इदन्ताविशिष्टोऽभिन्नश्चायमिति स्मृत्यनुभूतिभ्यामावेदितं भवति, यदि प्रत्यभिज्ञा को स्मृति और अनुभव उभयरूप मानें, तो उसमें प्राग- वस्थाविशिष्ट से इदन्ता-विशिष्ट का जो अभेद भासता है, उसका अन्तर्भाव कहाँ होगा ? स्मृति में तो हो नहीं सकता, क्योंकि वह अंश पूर्वकाल में अनुभूत न होने से उसका संस्कार ही नहीं है । अतएव 'प्रत्यभिज्ञा स्मृति है' यह तृतीय पक्ष भी असङ्गत है । फिर अनुभव में भी अभेद के भान का अन्तर्भाव नहीं हो सकता, क्योंकि प्रत्यभिज्ञाकाल में चक्षुःसन्निकर्ष न होने से प्रागवस्था अनुभव का विषय नहीं रहती । यदि प्रागवस्था को अनुभव का विषय मानें, तो 'प्रत्यभिज्ञा अनुभव ही है' इस चतुर्थ पक्ष में प्रवेश हो जायगा । उस पक्ष का खण्डन आगे करेंगे । अतएव 'प्रत्यभिज्ञा के एक अंश में अनुभूति तथा दूसरे अंश में स्मृति है' यह द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं, क्योंकि यदि प्रागवस्थाविशिष्ट के साथ इदन्ताविशिष्ट के अभेद को अनुभव का विषय मानें, तो विशेषण में प्रविष्ट प्रागवस्था का वैशिष्ट्य भी अनुभव का ही विषय हो जायगा । अतः उसका अन्तिम पक्ष में अन्तर्भाव हो जायगा । निर्वचनकर्ता—'प्रागवस्थाविशिष्ट से अभिन्न यह है' यह भी दो अंशों से युक्त है । उनमें 'प्रागवस्थाविशिष्ट' यह अंश स्मृति है और 'अभेद' एवं इदन्तावैशिष्ट्य ये अंश अनुभव हैं । खंडनकर्ता—यदि ऐसा है, तो 'प्रागवस्था से विशिष्ट वह' इतना अर्थ स्मृति-अंश का विषय है तथा 'इदन्ता-विशिष्ट से अभिन्न यह' इतना अर्थ अनुभव-अंश का विषय है, 'प्रागवस्था से विशिष्ट के साथ अभेद' किसी अंश का
६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम प्रागवस्थाविशिष्टाश्रयतया त्वभेदः केनापि न प्रकाशित इति य एव प्रागवस्था- विशिष्टः स एवायमिति प्रत्यभिज्ञायाः शरीरं न स्यात् । अथानुभवेन योऽसौ अनुभूयमानधर्म्याश्रयतया अभेदो बोधितः, स कोट्य- न्तरमनालम्ब्य न पर्यवस्यतीति केनचित् खलु कस्यचिदभेदो भवति । ततः स्मृत्यंशोपनीतमेव सन्निधानात् कोट्यन्तरं प्रागवस्थाविशिष्टरूपमालम्बत इत्यभेदस्य प्रागवस्थाविशिष्टाश्रयतासिद्धिरिति । तदेतत्तुल्योत्तरम् । 'कोट्यन्तरमालम्बते' इति किं कोट्यन्तराश्रितो भवति, उत् कोट्यन्तराश्रिततया ज्ञायत इति ? नाद्यः; अभेदस्येदानीं प्रागवस्थाविशिष्ट- धर्म्याश्रयेणोत्पत्तौ पूर्वं प्रागवस्थाविशिष्टेदन्ताविशिष्टयोर्भेदः स्यात् । द्वितीये तु यदेव कोट्यन्तराश्रिततया इदन्तावच्छिन्नधर्म्यभेदस्य ज्ञानं तत्स्मृतौ नान्तर्भावयितुं शक्यम्, नाऽप्यनुभवांश इत्युक्त एव दोषः । विषय नहीं । अतः 'जो प्रागवस्था से विशिष्ट है, वही इदन्ता-विशिष्ट है,' यह प्रत्यभिज्ञा का स्वरूप नहीं हो सकता । निर्वचनकर्ता—अनुभव-अंश का विषय जो अभेद है, वह अन्य कोटि ( प्रतियोगी ) के अवलम्बन के बिना उसका विषय हो नहीं सकता; क्योंकि किसीसे ही किसीका अभेद होता है । तब तो वह सन्निधान होने से स्मृति-अंश का विषय प्रागवस्था-विशिष्ट का ही प्रतियोगिरूप से आलम्बन करेगा । इस तरह अभेद प्रागवस्था- विशिष्टप्रतियोगिक सिद्ध हो ही जाता है । खण्डनकर्ता—'कोट्यन्तर का आलम्बन करता है' इस पंक्ति का अर्थ क्या है— 'क्या वह अभेद इस समय प्रागवस्था-विशिष्ट का प्रतियोगिरूप से आश्रयण करता है' अथवा 'इदानीं प्रागवस्था-विशिष्ट के प्रतियोगित्व-रूप से ज्ञात होता है'? यदि प्रथम पक्ष मानें, अर्थात् अभेद यदि इदानीं प्रागवस्था- विशिष्ट-प्रतियोगितया उत्पन्न होता है, तो इससे पूर्व प्रागवस्था-विशिष्ट से इदन्ता- विशिष्ट का भेद सिद्ध होगा । यदि द्वितीय पक्ष मानें, तो जो प्रागवस्था-विशिष्ट के साथ इदन्ता-विशिष्ट के अभेद का जो ज्ञान होता है, वह स्मृति या अनुभव में पूर्वोक्त प्रकार से अन्तर्भाव नहीं हो सकता । अतः उक्त दोष होगा ।
परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन ६३ किञ्च—यदा प्रत्यभिज्ञानं ‘सः’ इत्यंशे स्मृतिः ‘अयमि’त्यंशे चानुभव इत्येकं ज्ञान- मभ्युपेयते, तदा धर्मिणमादायापि स्मृत्यनुभवसङ्करो दुर्वारः। तथा हि-संस्कारेण तत्तामात्रं वाऽपनीयेत, तत्ताविशिष्टो वा धर्मी ? आद्ये स इति प्रत्यभिज्ञायाः शरीरं न स्यात्, तत्तायाः केवलायाः संस्कारेणोपनीतत्वात्। नापि द्वितीयः, तथा सति ‘अयम्’ इत्यनुभवांशेऽपि धर्मिप्रकाशो वक्तव्य एव। अन्यथा इदन्तामात्र- प्रकाशेऽयमिति तच्छरीरं न स्यात्। एवञ्च संस्कारस्य चेन्द्रियस्य च धर्मिप्रतीतिहेतोरुभयस्योपनिपाते किं विशेष्यांशे भिन्नाभ्यां ज्ञानाभ्यामुत्पत्तव्यम्, उत कारणद्वयसम्मेदादभेदभाजा ज्ञानेन ? प्रथमे प्रत्यभिज्ञानस्य एकज्ञानव्यक्तिताभ्युपगमव्याघातः, भेदपक्षोक्तदूषणापातश्च। द्वितीये धर्म्यंशे प्रत्यभिज्ञायाः स्मृतित्वमप्यनुभवत्वमपीति अनुभूतिस्मरणसङ्कर इति विषयव्यवस्थयाऽपि नियमो भग्नः। किञ्च--जब प्रत्यभिज्ञा को ‘सः’ इस अंश में स्मृति तथा ‘अयम्’ इस अंश में अनुभव मानें, तो धर्मी को भी लेकर स्मृतित्व और अनुभवत्व का संकर होगा। देखिये, संस्कार से केवल तत्ता उपनीत होती है अथवा तत्ता-विशिष्ट धर्मी ? यदि तत्तामात्र उपनीत होता है, तो प्रत्यभिज्ञा का आकार ‘सः’ न होना चाहिए, क्योंकि केवल तत्ता ही संस्कार से उपनीत होती है। यदि तत्ता-विशिष्ट धर्मी उपनीत होता हो, तो ‘अयम्’ इस अनुभव-अंश में भी धर्मी का भान मानना ही पड़ेगा। अन्यथा इदन्ता-मात्र का प्रकाश होने पर ‘अयम्’ यह प्रत्यभिज्ञा का आकार ही नहीं होगा। यदि धर्मी की प्रतीति का हेतु संस्कार तथा इन्द्रियसन्निकर्ष दोनों को मानें, तो क्या उनसे विशेष्यांश में स्मृति और अनुभव दो ज्ञान उत्पन्न होंगे अथवा दो कारणों के मेल से एक ही ज्ञान ? प्रथम पक्ष में ‘प्रत्यभिज्ञा एक ज्ञान है’ इस कथन से व्याघात (विरोध) हो जायगा। साथ ही तत्ता-विशिष्ट के साथ इदन्ता-विशिष्ट का अभेद किस ज्ञान का विषय हो, इसमें कोई प्रमाण न होने से वह किसी का भी विषय न होगा। यदि द्वितीय पक्ष मानें, तो प्रत्यभिज्ञा में धर्मी-अंश में स्मृतित्व और अनुभवत्व दोनों होने से स्मृति और अनुभव का संकर हो जायगा। फलतः तत्ता-इदन्तारूप विषय की व्यवस्था (भेद) से भी स्मृतित्व और अनुभवत्व के असङ्कर का नियम भग्न ही है। अर्थात् केवल एक अधिकरण में समावेश होने से संकर नहीं होता, किन्तु एक अवच्छेद से समावेश होने से ही सङ्कर होता है—यह भी आप नहीं कह सकते। क्योंकि उक्त प्रकार से धर्मीरूप एक ही अवच्छेद से समावेश है। अतः अनुभूतित्व जाति नहीं है। १३
६८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अथोच्यते—मा भूद्विषयोपाधिभेदाद् व्यवस्थानम्, उपाध्यन्तरात्तु भविष्यति । तद्यथा संस्कारजत्वमादाय स्मृतित्वव्यवस्थितिः, इन्द्रियसन्निकर्षजत्वमादाय चानुभवत्वव्यवस्थानमिति विरोधपरिहारोऽस्तु । न ; प्रमात्वसामान्यानङ्गीकारे प्रमाणरूपताया विषयव्यवस्थित्यैवोपगमेन उपाध्यन्तरोपन्यासेऽपि स्मृतित्वानुभूति- त्वयोरेकस्मिन्नेव धर्मिण्यर्धे निवेशात् प्रमात्वाप्रमात्वयोरेकविषयतैव । किञ्च—ज्ञानविकल्पानामध्यात्मं भावाभावसंवेदनात् स्मृतित्वानुभूतित्वयो- र्द्वयोरपि प्रत्यभिज्ञायां स्वतः प्रतिभानेन विषयनिरूपणव्यवस्थित्यनङ्गीकारे स्मृति- त्वादेरिदन्तायामपि स्मृत्यवगमप्रसङ्गात् । यदि च संस्कारजत्वमेव स्मृतित्वम्, तदा तस्यैव विरोधेऽभिधीयमाने स एव विरोधसामञ्जस्याय उपाधिरुपन्यस्यत इति नान्यस्य चेतसि निविशते । निर्वचनकर्ता—प्रत्यभिज्ञा में विषय-भेदरूप हेतु से भले ही स्मृतित्व तथा अनुभवत्व की व्यवस्था न हो, अन्य-उपाधि ( निमित्त ) से तो होगी ही । अर्थात् संस्कारजत्व अवच्छेद से स्मृतित्व की तथा इन्द्रिय-सन्निकर्षजत्व अवच्छेद से अनुभवत्व की व्यवस्था होगी । इस तरह स्मृतित्व तथा अनुभवत्व का सङ्कर नहीं होगा । अर्थात् एक ही अवच्छेद से एक अधिकरण में स्थिति के होने पर सङ्कर होता है। यहाँ यद्यपि दोनों एक ही अधिकरण में हैं, परन्तु अवच्छेदक भिन्न हैं, अतः संकर नहीं होगा । खण्डनकर्ता—आप प्रत्यक्षत्व के साथ सङ्कर होने से प्रमात्व को जातिरूप नहीं मानते, किन्तु तत्त्वानुभूतित्वादि रूप ही मानते हैं । अतः यदि संस्कारजत्व, इन्द्रियजत्व आदि उपाधियों को स्मृतित्व और अनुभवत्व का अवच्छेदक मानें, तो प्रत्यभिज्ञा में एक ही धर्मी-अंश में स्मृतित्व और अनुभूतित्व दोनों का सन्निवेश होने से प्रत्यभिज्ञा के एक ही धर्मी-अंश में प्रमात्व और अप्रमात्व का भी सन्निवेश हो जायगा, क्योंकि अनुभव प्रमा है तथा स्मृति अप्रमा । किञ्च—ज्ञान-भेदों के भाव ( अनुभूतित्व आदि धर्म ) और अभाव, दोनों ही मानस-प्रत्यक्ष के विषय होने से यदि स्मृतित्वादि की व्यवस्था विषय के अधीन न मानें, तो इदन्त्व-अंश में भी स्मृतित्व का और तत्ता-अंश में भी अनुभवत्व का भान हो जायगा । किञ्च—प्रत्यभिज्ञा के संस्कारजत्व-अंश में स्मृतित्व तथा इन्द्रियजत्व-अंश में अनुभवत्व दोनों धर्म रहते हैं, यह कथन भी उचित नहीं; क्योंकि संस्कारजत्व ही