भारतकोश
किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi

महाकवि भारवि द्वारा

स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)

DevanagariHindipublished707 पृष्ठ

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गया है, जैसे काव्यके सर्गान्तमें उन्होंने 'श्री' शब्दका प्रयोग किया है। उसी तरह माघकविने अपने शिशुपालवध महाकाव्यमें 'लक्ष्मी' शब्दका प्रदर्शन किया है और श्रीहर्षने अपने नैषधीयचरितमें 'आनन्द' शब्द प्रयुक्त किया है।

इतना ही क्यों, कलापक्षमें भी उन्होंने असामान्य कौशल दिखाया है, अर्थात् चित्रकाव्यके अनेकानेक प्रयोगोंसे अपनी रचना चित्रित की है। जैसे—एकाक्षर-पद, निरोष्ठ्य, पादान्तादियमक, पादादियमक, गोमूत्रिकाबन्ध, एकाक्षर, समुद्गक, प्रतिलोमानुलोमपाद, प्रतिलोमानुलोमाऽर्द्ध, प्रतिलोमानुलोमसे दो श्लोक, सर्वतोभद्र, अर्धभ्रमिक, निरोष्ठ्य, पादाद्यन्तयमक, त्रिचतुर्थयमक, आद्यन्तयमक, द्व्यक्षर, शृङ्खलायमक, गूढचतुर्थपाद, अर्थत्रयवाची (श्लोक) और महायमक।

भारविके परवर्ती कवि माघने इनका अनुकरण किया। महाकवि रत्नाकरने भी इसका अनुसरण किया है।

इसी प्रकार जैसे महाकवि कालिदास एक पद्यकी विचित्रतासे 'दीपशिखा' विशेषणवाले हुए हैं, वैसे ही महाकवि भारवि भी— 'उत्फुल्लस्थलनलिनीवनादमुष्मादुद्धूतः सरसिजसंभवः परागः । वात्याभिर्विर्यात विवर्त्तितः समन्तादाधत्ते कनकमयातपत्रलक्ष्मीम् ॥ ५-३९ ॥

इस पद्यकी विचित्रतासे 'आतपत्रभारवि' ऐसी प्रसिद्धिसे मण्डित हुए हैं। शारदातनयने अपने 'भावप्रकाशन' में— "अथैनाऽयं 'छत्रम्भारवि' ख्यातिं च गतः ।' तादात्म्यं प्रावरस्योभरिबिः स्पष्टमूहिवान्"। ऐसा निर्देश कर भारविकी प्रशंसा की है। इसी प्रकार भारविके परवर्ती महाकवि माघ भी एक पद्यरचनाकी विचित्रतासे 'घण्टामाघ' ऐसी उक्तिसे अलङ्कृत हुए हैं।

'किरातार्जुनीय' पर १९ टीकाएँ लिखी गयी हैं, पर उन सबमें मल्लिनाथकी घण्टापथटीका श्रेष्ठ है।

भारविका देश और समय

किरातार्जुनीयके कर्त्ता प्रौढकवि भारवि उत्तरदेशीय, दाक्षिणात्य या आन्ध्रदेशीय थे इस विषयमें अनेक मत हैं।