किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
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सन् ६३४ ई० के ऐहोलस्थानस्थित शिलालेखके 'स विजयतां रविकीर्त्तिः कविताश्रितकालिदासभारविकीर्त्तिः' इस पद्यार्धके अनुसार सन् ६३४ ई० से पूर्ववर्ती भारवि थे ऐसा ज्ञात होता है ।
भारविकी कुछ प्रशंसा और नीतिविषयक सूक्तियाँ
महाकवि क्षेमेन्द्रने भारविके वंशस्थवृत्तकी अतिशय प्रशंसा की है, जैसे— वृत्तस्फुरणस्य सा काऽपि वंशस्थस्य विचित्रता । प्रतिभा भारवेर्येन सच्छायेनाऽधिकीकृता ॥
कितनी मर्मस्पर्शिनी उक्तियां उनकी रचनामें मिलती हैं, जैसे— 'विविक्तिसङ्कथसेतुमधितताम्' । 'वसन्ति हि प्रेम्णि गुणा न वस्तुनि' ।
एकावली अलङ्कारमे अलङ्कृत यह पद्य कितना मनोहर है— 'हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः' । ( १-४ ) 'शुचि भूषयति श्रुतं वपुः प्रशमस्तस्य भवत्यलङ्क्रिया । प्रशमाभरणं पराक्रमः, स नयापादितसिद्धिमुद्वहन्' । ( २-३२ )
इसी तरह यह पद्य भी कैसा हृदयस्पर्शी है— जीर्यन्तो दुर्जया देहे रिपवश्चक्षुरादयः । जितेषु तनु लोकोऽयं तेषु क्रान्तस्तथा जितः ॥ ( ११-३२ )
किरातार्जुनीयका कथासार
द्यूतक्रीडामें पराजित होकर युधिष्ठिरके अपने भाइयों और द्रौपदीके साथ द्वैतवनमें निवासकालमें व्यासके उपदेशसे अर्जुन इन्द्रकील पर्वतपर तपस्या कर आराधनासे प्रसन्न शिवजीसे पाशुपत अस्त्र और इन्द्र आदि देवताओंसे अनेकानेक अस्त्र प्राप्तकर द्वैतवनमें अपने भाइयोंके पास आते हैं, इतनी छोटीसी घटनाका अवलम्बक कर भारविने १८ सर्गोंके किरातार्जुनीय महाकाव्यकी रचना कर अपनी अद्भुत कल्पना-कुशलता दरसाई है । किरातार्जुनीय शब्दकी व्युत्पत्ति है—किरातश्च अर्जुनश्च किरातार्जुनौ (द्वन्द्वसमास) । किरातार्जुनौ अधिकृत्य कृतो ग्रन्थः किरातार्जुनीयम् । किरातार्जुन शब्दसे 'शिशुक्रन्दयमसभाद्वन्द्वेन्द्राज्जननादिभ्यश्च' इस सूत्रसे छ (-ईय) प्रत्ययसे किरातार्जुनीयः शब्द