भारतकोश
किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi

महाकवि भारवि द्वारा

स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)

DevanagariHindipublished707 पृष्ठ

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बनता है। अर्थात् किरातपतिके वेषधारी शिवजी और अर्जुनके युद्धको अधिकार कर किये गये ग्रन्थको 'किरातार्जुनीय' कहते हैं।

किरातार्जुनीयके प्रत्येक सर्गका संक्षिप्त विवरण

प्रथमसर्ग—कौरवोंसे द्यूतक्रीडामें पराजित होकर युधिष्ठिर अपने भाइयों और द्रौपदीके साथ द्वैतवनमें निवास करते थे। उस समय दुर्योधनकी शासन-पद्धतिके परिज्ञानके लिए उनसे प्रेषित ब्रह्मचारिवेषधारी वनेचर आकर दुर्योधन-की नीतिकुशलताका सविस्तर वर्णन करता है। उसके जानेके बाद शत्रुके उत्कर्षसे पीडित द्रौपदी युद्ध करनेके लिए अनेक उत्तेजक वाक्योंसे युधिष्ठिरको उपालम्भ करती है।

द्वितीय सर्ग—भीमसेन द्रौपदीके वचन सुनकर उनका प्रशंसापूर्वक अनु-मोदन कर युद्धके लिए युधिष्ठिरको प्रेरणा देते हैं। तब युधिष्ठिर नीतिमार्गका अवलम्बन कर शान्तिपूर्ण वचनोंसे उनको समझाते हैं। इसी बीच वेदव्यास वहाँ आते हैं और पाण्डवलोग उनका स्वागत-सत्कार करते हैं।

तृतीय सर्ग—व्यासजी अपने आगमनसे कृतार्थ युधिष्ठिरको कहते हैं 'हे राजन् ! मेरे लिए कौरव और पाण्डवोंमें समभाव उचित होनेपर भी भरी सभामें कौरवोंके धर्ममार्गसे च्युत होनेपर भी तुम्हारे धैर्य और तितिक्षासे 'भवन्ति भव्येषु हि पक्षपाताः' अर्थात् सभीको सज्जनोंमें पक्षपात होता है। इस न्यायसे मैं तुम्हें उपदेश देता हूँ कि तुम पराक्रमसे ही अपना राज्य प्राप्त करोगे। परन्तु तुम्हारा शत्रु वीर्य, अस्त्र और सैन्योंसे तुमसे जबर्दस्त है, इस कारण तुम्हें जयके लिए उत्कर्ष प्राप्त करना है। कहा भी गया है—'प्रकर्षतन्त्रा हि रणे जयश्रीः' अर्थात् युद्धमें विजयलक्ष्मी उत्कर्षके अधीन है। परन्तु अपने गुरु परशुराम को निष्फल बनानेवाले इच्छामरण भीष्म पितामह, अयत्क्षको हव्य करनेके लिए तत्पर अग्निके समान तेजस्वी द्रोणाचार्य और क्रोधसे सबके धैर्यको च्युत करनेवाले परशुरामके उपासक कर्ण ये सब शत्रुके पक्षमें हैं। हे धर्मराज ! जिस विद्यासे इन्द्रकील पर्वतपर तपस्या कर अर्जुन दुर्लभ अस्त्रप्राप्तिसे विक्रमसंपन्न होकर इन सब विरोधियोंको उन्मूलित कर सकेंगे, मैं उस विद्याको देनेके लिए आया हूँ। ऐसा कहकर व्यासजीने विधिपूर्वक उस विद्याको अर्जुनको प्रदान किया,