किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[ १४ ]
भारविको माता उनको भोजन परोस रही थी उस समय उन दोनोंकी बातचीत भारवि सुनने लगे।
भारविकी माता अपने पतिको कहने लगी—
'प्राणनाथ ! आप अपने होनहार पुत्रको क्यों बार-बार पराभूत कर रहे हैं ? जबकि सब लोग उसके प्रशंसक हैं।'
तब भारविके पिताने कहा—'प्रिये ! ज्यादा संमान होनेसे उसकी उन्नतिका मार्ग अभिमानके कारण अवरुद्ध होगा। कालान्तरमें भारवि रविके समान हमारे कुलको प्रकाशपूर्ण कर देगा'।
माता और पिताका ऐसा संवाद सुनकर भारविको पश्चात्ताप हुआ और पिताजीके चरणोंपर गिरकर उन्होंने अपने दुर्भावका प्रायश्चित पूछा। तब उनके दयालु पिताने कहा कि "वत्स ! छः माह तक श्वशुरके गृहमें निवास करना ही तुम्हारे पापका पर्याप्त प्रायश्चित होगा"।
तब भारवि अपनी पत्नीके साथ दूरस्थित श्वशुरके गृहमें पहुँचे। पहले तो उनका खूब सम्मान हुआ, पर बहुत समय तक उनका निवास होनेसे उनका अपमान होने लगा। होते-होते उन्हें मवेशियोंको चराने और उन्हें साना देनेका काम भी सौंपा गया।
भारवि कर्मफलके भोगके लिए दृढसङ्कल्प होकर प्रतिदिन पद्योंकी रचनाकर उन्हें भूर्जपत्रोंमें अङ्कित करने लगे। एक दिन उन्होंने एक पद्यकी रचनाकी जो इस प्रकार है—
"सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् ।
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः" ॥ (२-३०) ।
अर्थात् कोई कर्म सहसा (बिना विचारे) नहीं करना चाहिए, क्योंकि अविवेक विपत्तिका मुख्य स्थान है। विचारपूर्वक काम करनेवालेको सम्पत्ति गुणोंसे लुब्ध होकर स्वयम् वरण करती है।
भारवि जब इस पद्यको ताड़पत्रपर लिख रहे थे तब उनकी पत्नी संक्लेशवश कारण कर अपने और अपने पतिकी दुर्दशापर आंसू गिराने लगीं। तब भारविने "अभिमानी जनको छः महीनेतक इस प्रकार श्वसुरालयमें रहना नित्य-मरणके समान है" ऐसा सोचकर अपनी पत्नीसे कहा—