भारतकोश
किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi

महाकवि भारवि द्वारा

स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)

DevanagariHindipublished707 पृष्ठ

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महाकवि भारविके विषयमें किंवदन्तियाँ

महाकवि भारविके विषयमें दो किंवदन्तियाँ प्रचलित हैं। उनका ऐतिहासिक महत्व न होने पर भी "न ह्यमूला जनश्रुतिः" इस उक्ति के अनुसार मनोरञ्जनके लिए भी यहाँ दी जाती हैं।

एक किंवदन्ती इस प्रकारकी है—

भारतवर्षकी उत्तरदिशामें अवस्थित हिमालय पर्वत और उसका एक विशेष इन्द्रकील शैलका किरातार्जुनीयमें विशद वर्णन देखनेसे महाकवि भारवि हिमालय-के किसी प्रदेशके निवासी थे कुछ विद्वान् ऐसा अनुमान करते हैं।

अध्ययनके लिए गुरुकुलमें निवास करते हुए भारविको हिमालय पर्वत और इन्द्रकील शैलकी अधित्यका और उपत्यकामें गायोंको चरानेके अवसरपर वहाँके निवासी वनेचरोंको देखनेका अवसर मिला। अनन्तर अर्जुनके इन्द्रकील पर्वतमें तपश्चरण और किरातपतिका रूप लिये हुए शिवजीसे और किरातोंसे युद्धका वर्णन समाविष्ट कर उन्होंने मनोरम दृश्योंके वर्णनसे परिपूर्ण किरातार्जुनीय महा-काव्यकी रचना की।

दूसरी किंवदन्ती पूर्वोक्त किंवदन्तीसे अधिक प्रसिद्ध और प्रचलित है, वह यों दी जाती है। भारवि स्वल्प अठ्ठारह वर्षकी उम्रमें ही व्याकरण, काव्य और कोष आदिका अध्ययन कर कुछ पद्योंकी भी रचना कर सामाजिक बन्धुवर्गका मनोरञ्जन करने लग गये थे।

एकबार भारविके पिताके बन्धुगण उनके पास आकर "आप भाग्यवान् हैं जो कि अल्पवयमें ही आपका पुत्र भारवि प्रतिभाशाली होकर काव्यरचना करने लगा है" ऐसा कहने लगे। तब भारविके पिताने कहा कि 'आप लोगोंको उसकी इस तरह प्रशंसा करना उचित नहीं है। वह क्या जानता है? अभी वह पढ़ रहा है।' इतना ही नहीं, भारविके पिता उसका तिरोभाव भी करते थे। तब भारवि अपने पिताको अपनी यशःप्राप्तिमें बाधक समझकर उनपर प्रस्तर-प्रहार करनेके लिए तत्पर हुए। एक बार रातको जब भारविके पिता केवल भारविकी ही प्रशंसा