भारतकोश
किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi

महाकवि भारवि द्वारा

स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)

DevanagariHindipublished707 पृष्ठ

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भाग्यहीन पुरुषके कर्मके समान शिवजीने अपने अस्त्रोंसे विफल कर डाला। इस प्रकार अस्त्रप्रयोगोंमें निष्फल होकर भी अर्जुन युद्ध करनेसे विरत नहीं हुए।

सप्तदश सर्ग--'ऐसा युद्ध कभी नहीं हुआ था' ऐसा सोचकर अर्जुन क्रुद्ध होकर, जैसे सर्प विषवमन करता है, उसी तरह आँखोंसे आंसू गिराने लगे, तथाऽपि बाणवृष्टिसे किरातसेनाको पीड़ित करने लगे। किरातपति शिवजीने उनके समस्त बाणोंको नष्ट कर दिया और उनके मर्मस्थलोंको बाणप्रहारसे अत्यन्त पीड़ित कर दिया। उन्होंने अर्जुनके समस्त शरोंको समाप्त कर कवचका भी अपहरण कर डाला। कवच और बाणोंसे रहित होकर भी अर्जुन धैर्यपूर्वक किरातपतिके ऊपर शिलावृष्टि करने लगे। शिवजीके द्वारा उसका निवारण करनेपर अर्जुन मल्लयुद्ध करनेके लिए सन्नद्ध हुए।

अष्टादश सर्ग--तब किरातपति और अर्जुनका भीषण बाहुयुद्ध होने लगा। परस्परके आघातसे दोनों रक्ताक्त हो गये। 'किरातपति कौन है और अर्जुन कौन है' यह पहचानना भी कठिन हुआ। उस समय अन्तरिक्षमें उछले हुए शिवजीके चरणोंको अर्जुनने पकड़ लिया। तब भगवान् शिवजीने विस्मित होकर अर्जुनका हृदयसे आलिङ्गन किया और उन्हें अपने स्वरूपका दर्शन दिया। अर्जुनने अष्टमूर्ति शिवजीकी स्तुति की। शिवजीने उनको पाशुपतास्त्र देकर धनुर्वेद पढ़ाया। इन्द्र आदि देवताओंने भी अपने अस्त्रोंको प्रदान कर अर्जुनको प्रोत्साहित किया। अनन्तर शिवजीकी आज्ञासे सफलमनोरथ अर्जुन द्वैतवनमें अपने भाइयोंके पास पहुँच गये।