भारतकोश
किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi

महाकवि भारवि द्वारा

स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)

DevanagariHindipublished707 पृष्ठ

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१६८ | किरातार्जुनीयम्

मेव। न तु मध्येमार्गान्निवृत्तमित्यर्थः। तथा हि—मन्मथेन परिलुप्तमतीनां स्खलितं विरुद्धाचरणमपि प्रायश उपकारि भवति।

हिन्दी—रतिक्रीडाके लिए अनेक सन्देशोंको भेजती हुई अप्सराओंने प्रिय-भवनको प्राप्त ही कर लिया, कामदेवसे लुप्त बुद्धिवालोंका विरुद्ध आचरण भी प्रायः उपकार करनेवाला होता है॥ ३७॥

आशु कान्तमभिसारितवत्या योषितः पुलकरुद्धकपोलम्।
निर्जिगाय मुखमिन्दुमखण्डं खण्डपत्रतिलकाकृति कान्त्या॥ ३८॥

मल्लि०—आश्विति॥ आशु कान्तमभिसारितवत्याः अभिगतवत्याः। स्वार्थे णिच्। योषितः सम्बन्धि पुलकै रुद्धावावृतौ कपोलौ यस्य तत्। खण्डा प्रमृष्टा पत्राणां पत्रलेखानां तिलकस्य च आकृतिः सन्निवेशः यस्य तत् व्यक्तं मुखं कान्त्याऽखण्डं पूर्णम्। इन्दुं निर्जिगाय जयति स्मेत्यार्योपमया , जयति द्वेष्टि' इति दण्डिना सादृश्यार्थेषु गणनात्।

हिन्दी—शीघ्र प्रियके पास अभिसार करनेवाली स्त्रीका रोमांचसे आवृत्त कपोलवाले, और मिटी हुई पत्ररेखाओं और तिलकके आकृतिवाले मुखने अपनी कान्तिसे पूर्णचन्द्रको जीत लिया॥ ३८॥

उच्यतां स वचनीयमशेषं नेश्वरे परुषता सखि! साध्वी।
आनयैनमनुनीय कथं वा विप्रियाणि जनयन्ननुनेयः॥ ३९॥

मल्लि०—उच्यतामिति। तत्र नायिकाह—स धूर्तोऽशेषमखिलं वचनीयं वक्तव्यमुच्यताम्। निःशङ्कमपालभ्यतामित्यर्थः। ब्रूञो दुहादित्वादप्रधाने कर्मणि लोट्। अथ सख्याह—हे सखि, ईश्वरे भर्तरि नायके विषये परुषता पारुष्यं न साध्वी न हिता। अथ नायिकाह—तर्हि एनमनुनीय सान्त्वयित्वा, आनय। पुनः सख्याह—विप्रियाणि जनयन् अप्रियाणि कुर्वन् स कथं वाऽनुनेयोऽनुनयार्हः।

हिन्दी—नायिका कहती है—उस धूर्तको सब कुछ कहना चाहिए (उलाहना देना चाहिए)।
सखी कहती है—नायकके विषयमें कठोरता हित करनेवाली नहीं होती है।
नायिका कहती है—तब उनको सान्त्वना देकर ले आओ।
सखी कहती है—अप्रिय करते हुए वे कैसे सान्त्वनाके योग्य होंगे?॥ ३९॥

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