किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
DevanagariHindipublished707 पृष्ठ
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श्लोकानामकाराद्यनुक्रमणिका
अ
| श्लोक-प्रतीक | स० | श्लो० | श्लोक-प्रतीक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| अकृत्रिमप्रेमरसाभिरामं | ३ | ३७ | अथ शशधरमौलेरस्य | १८ | ४६ |
| अखण्डमाखण्डल | १ | २९ | अथ स्फुरन्मोनविधूत | ८ | २७ |
| अखिलमिदममुष्य | ५ | २१ | अथ स्वमायाकृतमन्दिरो | ८ | ८ |
| अगूढहासस्फुटदन्त | ८ | ३६ | अथ हिमशुचिभस्म | १८ | १५ |
| अग्रमानुषु नितान्त | ९ | ७ | अथाग्रे द्रुनता मार्वि | १५ | ७ |
| अचक्रमत सपह्लवां | १० | ४९ | अथापदामुद्धरणक्षमेषु | १७ | १ |
| अचित्ततायामपि | १७ | ४७ | अथामिपश्यन्निव | ३ | ५६ |
| अचिरेण परस्य | २ | ९ | अथामयस्मिन्मशचिच | ११ | १ |
| अजन्मा पुरुषस्तावत् | ११ | ७० | अथारुवन्नैरासनतः | २ | ५७ |
| अजस्रमोजिह्मममोघ | १४ | ५७ | अथो शरस्तेन मदर्थं | १४ | १७ |
| अणीयसे विश्वविधा | १८ | ४१ | अथोष्णमासेव सुरेह | ३ | ३२ |
| अणुरप्युपहन्ति | २ | ५१ | अशोषितं वैद्युतजातवेदसा | ४ | २१ |
| अतिपातितकाल | २ | ४२ | अथ क्रिया कामदुघाः | ३ | ६ |
| अतिशयितवनान्तर | १० | ८ | अधरीचकार च विवेक | ६ | २१ |
| अतीतसंख्या विहिता | १४ | १० | अधिगक्य गुह्यकादिति | ६ | ३८ |
| अत्यर्थं दुरुपसदानुपेत्य | ५ | ९ | अधिरुह्य पुष्पभरनम्रशिखैः | ६ | १७ |
| अथ कृतकविलोभनं | १० | १७ | अनादरोपात्तघृतैक | १४ | ३६ |
| अथ क्षमामेव | १ | ४४ | अनाप्तपुण्योपचये | ३ | ५ |
| अथ चंदवभिः | २ | १६ | अनामृशन्तावक्वचिदेव | १७ | ३३ |
| अथ जयाय नु प्रेहमयी | ५ | १ | अनायुधे सत्त्वजिघांसिते | १४ | १६ |
| अथ दीपितवारिवाह० | १३ | २० | अनारतं तेन पदेषु | १ | १५ |
| अथ दीर्घतमं तमः | १३ | ३० | अनारतं यो मणिपीठ | १ | ४० |
| अथ भूतभव्यभवदीश | १२ | १९ | अनिर्जयेन द्विषतां | ११ | ७१ |
| अथ भूतानि वार्त्रघ्न | १५ | १ | अनुकूलपातिनमचण्ड | ६ | २५ |
| अथ वासवस्य वचनेन | १२ | १ | अनुकूलमस्य च विचिन्त्य | १२ | ४३ |
| अथ विहितविषेयै | १६ | ६२ | अनुचरेण धनाधिपतेरथ | ५ | १६ |
| अथ वैष कृतज्ञयेव पूर्वं | १३ | ५ | अनुजगु रथ दिव्यं | ३ | १० |
| अनुजानुमण्यमवसक्त | १२ | २२ |