किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
DevanagariHindipublished707 पृष्ठ
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श्लोकानुक्रमणिका
४३१
| श्लोक-प्रतीक | स० | श्लो० | श्लोक-प्रतीक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| अवलीढसनाभिरश्वसेनः | १३ | ११ | अंसस्थले केचिद् | १६ | ३० |
| अवहितहृदयो विधाय | २ | ५८ | अंसाववहृद्वनतो | १६ | २१ |
| अविप्रहृष्याप्यनुलेन | १८ | ३३ | आ | ||
| अविज्ञातप्रबन्धस्य | ११ | ४३ | आकारमाशंसितभूरि | ३ | २७ |
| अवितृप्ततया तथापि | २ | २९ | आकीर्णं बलरजसा | ७ | ३६ |
| अविभावितनिष्क्रमं | १३ | २७ | आकीर्णा मुखनलिनेः | ७ | १८ |
| अविमृष्यमेतदभिलष्यति | ६ | ४४ | आकुमारमुपदेष्टु | १३ | ४३ |
| अविरतोजितवारि | ५ | ६ | आकुलभ्रलतस्त्रि | ९ | ८ |
| अविरलफलिनीवनं | १० | २८ | आसिसचापावरणेपु | १७ | ५९ |
| अविरलमलसेषु | १० | ४३ | आसिप्तसम्पातमपेत | १६ | ४१ |
| अविलङ्घ्यविकंपणम् | ३ | ५७ | आक्षिप्यमाणं रिपुभिः | ३ | ५० |
| अविवेकवृथाश्रमा | १३ | २९ | आघट्टयामास गता | १७ | ३८ |
| असकलनयनेक्षितानि | १० | ५९ | आघ्राय सद्यमतिवृप्य | ७ | ३४ |
| असजमाराधयतो | १ | ११ | आतपे धृतिमतो | ९ | ३० |
| असमापितकृत्य | २ | ४८ | आतिथेयीमथासाद्य | ११ | ९ |
| असावनास्थापरया | ४ | ३४ | आत्मनोनमुपतिष्ठते | १३ | ६९ |
| असिः शरा वर्म धनुश्च | १४ | २० | आत्मलामपरिणाम | १८ | ३४ |
| असङ्कदीनामपुत्रीप | १६ | १० | आदृता नलपदैः | ९ | ४१ |
| असंविदानस्य ममेश | १८ | ४२ | आत्राधामरणभया | १८ | ३९ |
| असंशयं न्यस्तमृषान्त | ८ | २८ | आपत्तभ्रमरकुला | ७ | १० |
| असंशयालोचितकार्य | ३ | ३३ | आमोदवासितचला | ९ | ७७ |
| असहायोत्साहं जयिनं | १८ | ४७ | आयस्तः सुरसरिदोध | ७ | ३२ |
| अस्त्रवेदमधिगम्य तत्त्वतः | १३ | ६२ | आरोढुः समवनतस्य | ७ | १३ |
| अस्त्रवेदविद्यं महो | १३ | ६७ | आशंसितापचिति | ६ | ४६ |
| अस्त्रैः समानामपि | १७ | ३६ | आशु कान्तमभिसारित | ९ | ३८ |
| अस्मिनगुह्यात् पिनाक | ५ | ३१ | आसक्तभरनीकाशै | ११ | ५ |
| अस्मिन्यशः पौरुष | १६ | ९ | आसक्ता धूरियं | ११ | ७७ |
| अंशुपाणिभिरतीव | ९ | ३ | आसन्नद्विपपदवीमदा | ७ | ३४ |