किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
DevanagariHindipublished707 पृष्ठ
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४३२ | किरातार्जुनीयम्
| श्लोकांश | स० | श्लो० | श्लोकांश | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| आसादिता तत्प्रथमं | १६ | २७ | इदमीदृग्गुणोपेतं | ११ | ४१ |
| आसुरं लोकविश्राम | १५ | २८ | इमान्यमूनीत्यपवर्जिते | ८ | १० |
| आसेदुषां गोत्रभिदो | १८ | १८ | इमामदं वेद न तावकीं | १ | ३७ |
| आस्निग्व्यशब्दनभसः | १८ | ४३ | इयमिष्टगुणाय रोचतां | २ | ५ |
| आश्यामालाभ्य नीतेषु | १५ | ४ | इयं च दुर्वारमहारथानां | १६ | १७ |
| आस्थितः स्थगित | ९ | ९ | इयं शिवाया नियते | ४ | २१ |
| आहिते नु मधुना | ९ | ६६ | इह दुरधिगमः किञ्चिदेवा | ५ | १८ |
| इ | इह वीतभयास्तपोऽनुभावा | १३ | ४ | ||
| इच्छतां सह वधूभिः | ९ | १३ | इह सनियमयोः सुराप | ५ | ४० |
| इतरेतरानभिभवेन | ६ | ३४ | ई | ||
| इति कथयति तत्र | ४ | १७ | ईशार्थमम्भसि चिराप | ५ | १९ |
| इति गां विधाय विरतषु | १२ | ३२ | उ | ||
| इति चालयन्नचलसानु | १२ | ५२ | उच्चतां स वचनीय | १ | ३९ |
| इति तानुदारमनुनीय | १२ | ४० | उज्झतीशुचमिवाशु | ९ | १८ |
| इति तेन विचिन्त्य चाप | १३ | १८ | उज्झत्सु संहार इवा | १६ | १६ |
| इति दर्शितविक्रियं | २ | २५ | उत्फुल्लस्थलनालिनी | ५ | ३९ |
| इति निगदितवन्तं | १८ | ४४ | उत्सङ्गे मणिविषमे ममं | ७ | २१ |
| इति ब्रूवाणेन महेन्द्र | ३ | २० | उत्सृष्टवज्रकुशकङ्कटा | ७ | ३० |
| इति विविधमुदासे | १६ | ६३ | उदस्य धैर्यं दयितेन | ८ | ५० |
| इति विषमिवचक्षुषा | १० | ५६ | उदारकीर्तेरुदयं | १ | १८ |
| इति शासति सेनान्या | १५ | २९ | उदाहरणमाशीःषु | ११ | ६५ |
| इतीरयित्वा गिरमात्त | १ | २६ | उदितोपलस्खलन | ६ | ४ |
| इतीरिताकूतमनील | १४ | २४ | उदीरितां तामिति | ३ | ५५ |
| इत्थं विहृत्य वनिताभि | ८ | ५५ | उदूढवक्षःस्थगितैक | १४ | ११ |
| इत्युक्तवन्तं परिरम्य | ११ | ८० | उद्गतेन्दुमविभिन्न | ९ | २४ |
| इत्युक्तवन्तं व्रज साधये | ३ | २४ | उन्मज्जन्मकर इवा | १७ | ६३ |
| इत्युक्तवामुषितविशेष | ३ | १० | उपकार इवासति | १३ | ३३ |
| इत्युक्त्वा सपदि द्वितं | ५ | ५१ | उपकारकमाहते | २ | ४४ |