किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
DevanagariHindipublished707 पृष्ठ
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श्लोकानुक्रमणिका
<div align="right">४३३</div>| श्लोक | स० | श्लो० | श्लोक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| उपजापसहान्बिल | २ | ४७ | कच्छान्ते सुरसरितो | १२ | ५४ |
| उपपत्तिरुदाहृता | २ | २८ | कतिपयसहकारपुष्प | १० | ३० |
| उपलभ्य चञ्चलतरङ्ग | ६ | १४ | कथमिव तव सम्मति | १० | ४६ |
| प्लावितोद्धततरङ्ग | ६ | १० | कथं वादीयतामर्वाङ् | ११ | ७६ |
| उपाघत्त सपत्नेषु | ११ | ५० | कथाप्रसङ्गेन जनैः | १ | २४ |
| उपारताः पश्चिमरात्रि | ४ | १० | कपोलसंश्लेषि विलो | ४ | ९ |
| उपेयुषीणां बृहतीरधि | ८ | १२ | करणस्पृष्टङ्गलनिःसृतयोः | १८ | ११ |
| उपेयुषी बिभ्रतमन्तक | १४ | ३८ | करिष्यसे यत्र सुदुश्च | ३ | २९ |
| उपैति सस्यं परिणाम | ४ | २२ | करुणमभिहितं त्रपा | १० | ५८ |
| उपैत्यनन्तद्युतिरप्य | १६ | ६१ | करोति योऽक्षोपजनाति | ३ | ५१ |
| उपोढकल्याणफलो | १७ | ५४ | करो धुनाना नवपल्लवाकृति-पयस्यगाधे | ८ | ४८ |
| उमापति पाण्डुसुत | १७ | १२ | करो धुनाना नवपल्लवाकृति-वृथा कृता | ८ | ७ |
| उरसि शूलभृतः प्रहिता | १८ | ५ | कलत्रभारेण विलोल | ८ | १० |
| उरु सत्त्वमाहु विदरि | ६ | ३५ | कवचं स बिभ्रदुपवीत | १२ | ९ |
| ऊ | कषणकम्पनि रस्तघटा | ५ | ४७ | ||
| ऊर्ध्वं तिरश्चीनमधश्च | १६ | ५० | कान्तदूत्य इव कुङ्कुम | ९ | ६ |
| ऋ | कान्तवेश्म बहु सन्दिशती | ९ | ३७ | ||
| ऋषिवंशजः स यदि | ६ | ३६ | कान्तमङ्गमपराजित | ९ | ५२ |
| ए | कान्ताजनं सुरतखेद | ९ | ७६ | ||
| एकतामिव गतस्य | ९ | १२ | कान्तानां कृतपुलकः | ७ | ५ |
| एवं प्रतिद्वन्द्विषु तस्य | १७ | १८ | कि गतेन न हि युक्त | ९ | ४० |
| ओ | कि त्यक्तापास्तदेवन्व | १५ | २१ | ||
| ओजसापि खलु नून | ९ | ३३ | किमपेक्ष्य फलं | २ | २१ |
| ओष्ठपल्लवविदंश | ९ | ५७ | किमसामयिकं वित | २ | ४० |
| औ | कि मुपेक्षसे कथय | १२ | ३१ | ||
| औपसत्पमयादव | ९ | ११ | किरातसैन्यादुरुचाप | १४ | ४५ |
| क | |||||
| ककुदे वृषस्य कृत | १२ | २० |
२८ कि०