किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
DevanagariHindipublished707 पृष्ठ
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४३४ | किरातार्जुनीयम्
| पाद / श्लोकांश | स० | श्लो० | पाद / श्लोकांश | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| कुप्यताशुभ्रवतानत | ९ | ५३ | क्षीणयावकरसोऽप्यति | ९ | ६२ |
| कुररीगणः कृतरवस्तरवः | ५ | २५ | क्षुभितामिनिसुतः | १२ | ४५ |
| कुरु तन्मतिमेव | २ | २२ | क्षोभेण तेनाथ गणा | १७ | २२ |
| कुरु तात तपांस्यमार्ग | ११ | १३ | ख | ||
| कुसुमनगवनान्युपेत | १० | ३१ | खण्डिताशंशया तेषां | १५ | ३ |
| कुसुमितमवलम्ब्य | १० | ५३ | ग | ||
| कृतधृति परिवन्दिते | १८ | २१ | गणाधिपानामविधाय | १४ | ५४ |
| कृतप्रणामस्य महीं | १ | २ | गणयति नखलेखा | ९ | ७८ |
| कृतं पुरुषशब्देन | ११ | ७२ | गतान्पशूनां सहजन्म | ४ | १३ |
| कृतवानन्यदेहेषु | ११ | २६ | गतैः परेषामविभाव | १४ | ५२ |
| कृतानतिर्व्याहतसा | ४ | ४१ | गतैः सहावैः कलहंस | ८ | २९ |
| कृतान्तदुर्वृत्त इवा | १६ | २९ | गन्धमुद्धतरजःकण | ९ | ३१ |
| कृतारिषड्वर्गनयेन | १ | ९ | गभीररन्ध्रेषु भृशं मही | १४ | ४६ |
| कृतावधानं जितबर्हि | ४ | ३३ | गम्यतामुपगते नयनानां | ९ | ४ |
| कृतोर्मिरेखं शिथिलत्व | ४ | ६ | गुणसम्पदा समधिगम्य | ५ | २४ |
| कृष्णद्वैपायनादेशात् | ११ | ४६ | गुणानुरक्तामनुरक्त | १ | ३१ |
| को न्विमं हरितुरङ्ग | १३ | ५० | गुणापनादेन तदन्य | १४ | १२ |
| कोऽपवादः स्तुतिपदे | १२ | २५ | गृहक्रियारम्भफलं | १४ | ४२ |
| क्रान्तानां ग्रहचरितात् | ७ | १२ | गुरुस्थिराणुत्तम | १६ | २८ |
| क्रामद्भिर्धनपदवोमनेक | ५ | ३४ | गुरून्कुर्वन्ति ते वंश्यान् | ११ | ६४ |
| क्रियासुयुक्तैर्नृप | १ | ४ | गूढोऽपि वपुषा राजन् | ११ | ६ |
| क्रोधान्धकारान्तरितो | १७ | ९ | ग्रसमानमिवोजांसि | ११ | ७३ |
| क्लान्तोऽपि त्रिदशवधू | ७ | २१ | ग्रहविमानगणानभितो | ५ | १४ |
| क्व चिराय परिग्रहः | २ | ३९ | घ | ||
| क्षत्रियस्तनयः पाण्डोः | ११ | ४५ | घनपोत्रविदीर्णशाल | १३ | ३ |
| क्षययुक्तमपि स्वभावजं | २ | ११ | घनं विदार्यार्जुन | १४ | ५० |
| क्षितिनभःसुरलोक | ५ | ४ | घनानि कामं कुसुमानि | ८ | ४ |
| क्षिपति योऽनुवनं | ५ | ४५ |