किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
DevanagariHindipublished707 पृष्ठ
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श्लोकानुक्रमणिका
४३५
| श्लोक | स० | श्लो० | श्लोक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| च | जलदजालघनैरुसिता | ५ | ४८ | ||
| चञ्चलं वसु नितान्त | १३ | ५३ | जलोवसंमूर्च्छनमूच्छित | १६ | ५९ |
| चतसृष्वपि ते विवेकिनी | २ | ६ | जहातु नैनं कथमर्थ | ३ | १४ |
| चमरीगणगंगबलस्य | १२ | ४७ | जहार चास्मादचिरेण | १७ | ४४ |
| चयानित्वाद्रीनिव | १६ | ५२ | जहिहि कठिनता | १० | ५० |
| चलनेऽवनिञ्चलति | १२ | २८ | जहीहि कोपं दयितो | ८ | ८ |
| चारुचुम्बिशरारेची | १५ | ३८ | जिह्वाशतान्युल्लस | १६ | ३७ |
| चिचीपतां जन्मवतां | ३ | ११ | जोयन्तां दुर्जया देहे | ११ | १२ |
| चित्तनिवृत्तिविधायि | ९ | ७१ | जेतुमेव भवता | १३ | ५४ |
| चित्तवानसि कल्याणी | ११ | १४ | ज्वलत्सुतव जात | २ | २४ |
| चित्रीयमाणानति | १७ | ३१ | ज्वलतोऽनलादनु | १२ | ७ |
| चिरनियमकृशोऽपि | १० | १४ | ज्वलितं न हिरण्य | २ | २० |
| चिरमपि कलितान्य | १० | ४८ | त | ||
| च्युते स तस्मिन्त्रिपुधो | १७ | ३७ | तत उदय इव द्विरदे | १८ | १ |
| छ | ततः किरातस्य वचो | १४ | १ | ||
| छायां विनिर्भूय तमोमयीं | १६ | ३२ | ततः किराताधिपते | १६ | १ |
| ज | ततः प्रनष्टे सममेव | १५ | ५४ | ||
| जगदीशरणे युक्तो | १५ | ४५ | ततः प्रत्यात्यस्तमदा | १७ | १७ |
| जगतप्रसूतिर्जगदेक | ४ | ३२ | ततः शरच्चन्द्रकरा | ३ | १ |
| जटानां कीर्ण्या केशैः | ११ | ३ | ततः सकूजत्कलहंस | ४ | १ |
| जनैरुपग्राममनिन्द्य | ४ | १९ | ततः सदपं प्रतनु | १४ | ३५ |
| जन्येष्वतपसां | १३ | ६४ | ततः स संप्रेक्ष्य शरदगुणं | ४ | २० |
| जन्मिनोऽस्य स्थिति | ११ | ३० | ततः सुपर्णव्रजपक्ष | १६ | ४४ |
| जपतः सदा जपमुपांशु | १२ | ८ | ततस्तपोवीर्यसमुद्धतस्य | १७ | ३५ |
| जयमत्रभवान्नूनं | ११ | १८ | ततोऽप्रभूमि व्यवसाय | १७ | ५५ |
| जयारवक्ष्वेडितनाद | १४ | २९ | ततो धरित्रीधरतुल्य | १६ | ५५ |
| जयेन कश्चिद्धिरमेद्यं | १४ | ६२ | ततोऽनुपूर्वायतवृत्त | १७ | ५० |
| जरतोमपि विद्वाण | ११ | ७ | ततोऽपवादेन पताकिनी | १४ | २७ |
| तत्तदीयविशिखा | १३ | ५७ |