किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
DevanagariHindipublished707 पृष्ठ
पृष्ठ 694, कुल 707 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 694
४३६ किराताजुनीयम्
| पाद/श्लोकांश | स० | श्लो० | पाद/श्लोकांश | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| तत्तितिक्षितमिदं | १३ | ६८ | तरसा भुवनानि यो | १८ | १० |
| तत्र कार्मुकभृतं | १४ | ३५ | तरसैव कोऽपि भुवनैक | १२ | २१ |
| तथा न पूर्वं कृतभूषणा | ८ | ४१ | तवोत्तरोयं करिषमं | १८ | ३२ |
| तथापि जिह्यः स | १ | ८ | तस्मै हि भारोद्धरणे | १७ | १८ |
| तथापि विघ्नं नृप | ३ | १२ | तस्यातियत्नादति | १७ | १२ |
| तदनघ धनुरस्तु | १० | ५० | तस्याहवायासविलोल | १७ | ८ |
| तदभूरिवासस्कृतं | ६ | २९ | त शम्भुराक्षिसमहैषु | १७ | ४१ |
| तदलं प्रतिपक्ष | २ | १५ | तान्मूरिधाम्नश्चतुरोऽपि | ३ | ३१ |
| तदा रम्याण्यरम्याणि | ११ | २८ | तापसोपि विभुता | १३ | ३१ |
| तदासु कर्तुं त्वयि | १ | २५ | तामैक्षन्त क्षणं सभ्या | ११ | ५१ |
| तदाशु कुर्वन्वचनं | ३ | ५४ | तावदाश्रियते लक्ष्म्या | ११ | ६१ |
| तदुपैक्ष्य विघ्नयत | ६ | ४३ | तिरोहितश्वभ्रनिकुञ्ज | १४ | ३१ |
| तद्गणा ददृशुर्भीमं | १५ | ३५ | तिरोहितान्यानि नितान्त | ८ | ४७ |
| तनुमवजितलोक | १० | १५ | तिरोहितेन्दोरथ | १६ | १६ |
| तनुवारभसो भास्वान | १५ | २३ | तिष्ठतां तपसि पुण्य | १६ | ४४ |
| तनूरलक्तारुणपाणि | ८ | ५ | तिष्ठद्भिः कथमपि | ७ | १ |
| तपनमण्डलदीपितमेक | ५ | २ | तीरान्तराणि मिथुनानि | ८ | ५१ |
| तपसा कृशं वपुरुवाह | १२ | ६ | तुतोष पश्यन्कलभस्य | ४ | ४ |
| तपसा तथा न मुदमस्य | १८ | १४ | तुल्यरूपमसितोत्पल | ९ | १६ |
| तपसा निपीडितकृश | १२ | ३९ | तुषारलेखाकुलितो | १ | ३१ |
| तपोबलेनैव विधाय | १४ | ६० | तेजः समाश्रित्यपरै | १७ | ३ |
| तप्तानामुपदधिरे विषाण | ७ | १३ | तेन व्यातेनिरे भीमा | १५ | ४६ |
| तमतनुबनराजिश्यामितो | ४ | ३८ | तेन भूरिरुपकारिता | १३ | ४० |
| तमनतिशयनीयं सर्वतः | ५ | ५२ | तेनानिमित्तेन तथा | १७ | ४ |
| तमनिन्यवन्दिन इवेन्द्रः | ६ | २ | तेनानुजसहायेन | ११ | ४८ |
| तमाशुचक्षुःश्रवसां | १६ | ४२ | त्रयीमूतूनामिनिला | १४ | ४८ |
| तमुदीरितारुणजटांशु | १२ | १४ | त्रासजिह्मां यतश्चेष्टा | १५ | ३ |
| त्रिःसप्त कृत्वो जगती | १ | १८ |