किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
DevanagariHindipublished707 पृष्ठ
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श्लोकानुक्रमणिका
| श्लोक-प्रतीक | स० | श्लो० | श्लोक-प्रतीक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| भवद्भिरक्षुण्णाराति | १५ | १० | मया मृगान्धन्तुमनेन | १४ | २५ |
| भवन्तमेतर्हि मनस्वि | १ | ३२ | मरुतः शिव्रा नवतृणा | ६ | ३३ |
| भवन्ति ते सभ्यतमा | १४ | ४ | महतां पतिः स्विद् | १२ | १५ |
| भवभीतये हतवृहत्सम | ६ | ४१ | महते फलाय तदवेक्ष्य | ६ | २८ |
| भवादृशेषु प्रमदा | १ | २८ | महत्त्वयोगाय महा | ३ | २३ |
| भव्यो भवन्नपि मुने | ५ | ४९ | मध्यैर्यभस्कन्धनतून | १४ | ४० |
| भिस्त्वेव भाभिः सवितु | १६ | ५१ | महानले भिन्नसिताम्र | १६ | ५७ |
| भुजगराजसितेन | ५ | ४ | महारथानां प्रतिदन्त्य | १६ | १४ |
| भूभर्तुः समविकमादधे | ७ | २७ | महास्त्रदुर्गे शिथिल | १६ | २६ |
| भूयः समापान | १७ | ७ | महिषक्षतागुरुतमाल | १२ | ५० |
| भूरिप्रभावेण रणामि | १७ | २ | महीभृता पक्षवतेह | १६ | १३ |
| भूरेणुना रासनधूसरेण | १६ | ७ | महीभृतां सच्चरितं | १ | २० |
| भृशकुसुमशरैषु | १० | ६१ | महेपुजङ्घवी शत्रो | १५ | ३२ |
| भ्रूविलाससुभगाननु | ९ | ५६ | महौजसो मानधना | १ | १९ |
| म | मा जपन्मदविमूढ | ९ | ७० | ||
| मग्नां द्विषच्छद्मनि | ३ | ३९ | मा गश्चित्रांयकचरः | ३ | ५३ |
| मणिमयूखजयांशुक | ५ | ५ | मानिनीजनविलोचन | ९ | २६ |
| मतिभेदतमस्तिरो | २ | ३३ | मा भूवन्नपथहृतस्तवे | ५ | ५० |
| मतिमान्निनयप्रमाथि | २ | ५२ | माया स्विद्देशा मति | १६ | १८ |
| मथिताम्भसो रथविकीर्ण | १२ | ५१ | मार्गणैश्च तत्र | १३ | ५९ |
| मदमानसमुद्धतं | २ | ४९ | मा विहासिष्ट समरं | १५ | ८ |
| मदसिक्तमुखंर्मुगा | ७ | १८ | माहेन्द्र नगमभितः | ७ | २० |
| मदसुतिश्यामित | १६ | २ | मित्रमिष्टमुपकारि | १३ | ५१ |
| मधुरैरवशानि | २ | ५५ | मुकुलितमतिशय्य | १० | २७ |
| मध्यमोपलनिश्रे लसदंशा | ९ | २ | मुक्तमूललघुरज्जित | ९ | ५ |
| मनसा जप्यैः प्रणतिभिः | ६ | २२ | मुखैरसौ विद्रुमभङ्ग | ४ | ३६ |
| मनःशिलाभञ्जनिभेन | १६ | ४५ | मुञ्चतीशे शराञ्छिष्णो | १५ | ३४ |
| मनोरमं प्रापितमन्तरं | ४ | ७ | मुमितमधुलिहो वितानो | १८ | २० |
| मन्दमस्यत्रिशुलतां | १५ | १३ |